कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

Imran Khan

I am imran and I am passionate about grooming children and Women in areas where they may weak this includes underprivileged children or women.In addition to general subject I am particularly keen on teaching Hindi since I feel very few of us appreciate Hindi as a language. In terms of my personal liking I am fond of cooking and I am a nature lover. Love nurturing plants and as much as I like nurturing kids.And if I may add some more I have the privileged of animals birds and plants communicating with me as we generat mutual happiness... I am a feminist because every cell of my body says that the marginalization, violence, insult, degradation, and servitude to which women have been subjected for at least eight thousand years is wrong and evil and must stop.

Voice of Imran Khan

बेसिक कुकिंग टिप्स जो बनाएंगे रसोई में आपकी ज़िंदगी आसान

लॉक डाउन हो चाहे ना हो, कभी न कभी हम सभी को अपना खाना खुद बनाना पड़ सकता है और इसलिए हम यहां बात करने जा रहे हैं कुछ बेसिक कुकिंग टिप्स की। 

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कोरोना लॉकडाउन में ट्रांसजेंडर्स – क्या है इनकी सबसे बड़ी समस्या और क्या है इसका हल?

Covid - 19 की महामारी और लॉकडाउन के समय कई ट्रांसजेंडर्स की हालत और बदतर हो गयी है और इनके कमाई के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। 

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लॉकडाउन के बीच निर्मला सीतारमण द्वारा घोषित वित्त योजना सभी वर्गों के लिए नियोजित

कोरोना लॉकडाउन के बीच निर्मला सीतारमण द्वारा बनाई गई वित्त योजना गरीब और असहाय लोगों, खासतौर पर महिलाओं के लिए, एक सहारा है। 

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लॉक डाउन के लंबे दिन, यानि आपका आराम… लेकिन आपके घर की औरतों के आराम का क्या?

Covid - 19 लॉक डाउन, मतलब कई लोगों के लिए घर पर आराम, मगर ऐसे में क्या हम सुनिश्चित कर रहे हैं कि हमारे घर की महिलाओं को भी आराम मिले?

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विश्व टीबी दिवस 2020 – महिलाओं में टीबी का खतरा और उससे जुड़ी चुनौतियों

आज वर्ल्ड टीबी डे है और हम बात करने जा रहे हैं उन महिलाओं के बारे में, जो इस बीमारी से पीड़ित हैं और उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। 

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ताराबाई शिंदे हैं पहले आधुनिक भारतीय नारीवादी पाठ की लेखिका

ताराबाई शिंदे के विचार आज के समाज के लिए, जहाँ महिलाओं को नीचा समझा जाता है, एक तलवार का प्रहार हैं, जो पितृसत्ता की सोच को छिन्न भिन्न कर देता है। 

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लॉक डाउन – महिलाओं का सदियों से पुरुषवाद ने लॉक डाउन ही तो किया हुआ है

महिलाएं इस लॉक डाउन की कब से साक्षी रहीं हैं क्यूंकि पुरुषवाद इस लॉक डाउन को महिलाओं पर कई सदियों से चलाता आ रहा है, क्या इसे पुरुषों ने कभी महसूस किया?

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ये हैं नवरात्रि व्रत के 7 व्यंजन, आपके पेट की पूजा के लिए!

नवरात्रि व्रत के व्यंजन ख़ास आपके लिए, क्यूंकि हमें ख्याल है आपकी हेल्थ और आपके स्वाद का, और अगर ये दोनों चीज़ें एक साथ मिल जाएं तो क्या कहने!

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निर्भया के दरिन्दों को फाँसी तक पहुंचाने वाली वकील हैं सीमा समृद्धि कुशवाहा

सीमा समृद्धि कुशवाहा चट्टान की भाँति निर्भया के लिए खड़ी रहीं और कितने ही तूफानों को पार करती हुई वह बस आगे बढ़ती गईं।

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आख़िर इंसाफ की सुबह आ गयी और निर्भया तुम जीत गईं!

आज की सुबह न्याय ले कर आयी और निर्भया की माँ ने अपनी बेटी की तस्वीर गले से लगाया और कहा, "आखिरकार तुम्हें इंसाफ मिल गया।" 

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दुआ-ए-रीम कुछ ही पलों में महिलाओं की असल स्तिथि को उजागर करती है

दुआ-ए-रीम जो पंक्ति मुझे तोड़ गई और कोरी सच्चाई भी बता गई समाज की, वह है, "धमकियां दें तो तसल्ली हो के थप्पड़ न पड़ा, पड़े थप्पड़ तो करूँ शुक्र के जूता न पड़ा।"

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रिश्तों में हिंसा की कोई जगह नहीं, मानती हैं एम टीवी रोडीज़ की नेहा धूपिया

क्या नेहा धूपिया का रोडीज़ शो में ये कहना कि कोई भी व्यवहार, चाहे आपकी नज़र में वो कितना भी गलत हो, उसका जवाब हिंसा नहीं हो सकता, गलत है?   

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तू नारी है फुलकारी है, शोषण के खिलाफ एक चिंगारी है

तू फूल है, तू आग तो है शोला भी है, शोषण के खिलाफ चिंगारी है, तू सब की पायेदारी है, धरती हो या आकाश कहीं, तेरे ही लिए सरदारी है।

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क्यों समाज में पुरुषों की नारीवादी सोच ज़रूरी है

एक दिन पुरुष द्वारा तिरस्कृत नारी लावा की भाँति फट भी सकती है और, उस दिन हम इस असमानता के तांडव को देख कर असहज ना हों, क्योंकि यह आग हमने ही लगायी है।

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तापसी की फ़िल्म का ये ‘थप्पड़’ सिर्फ उनके चेहरे पर ही नहीं बल्कि आपके आत्मसम्मान पर भी लगता है

अक्सर देखा जाता है, पुरूष कहीं से भी, किसी से भी क्रोधित होकर घर आते हैं, तो सीधा इसका गुस्सा वे अपनी पत्नी, माँ, या बहन पर दिखाते हैं।

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क्या आज भी औरतें का काम सिर्फ़ दूसरों की ज़रूरतें पूरा करना है?

पुरूष केवल एक भूमिका निभाते हुए, कर्मठ, मज़बूत साबित होता है और महिलायें न जाने कितनी भूमिकाओं में लिप्त हैं और फिर भी अबला और कमज़ोर कहलाती हैं। 

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अगर अपने समाज में बदलाव देखना है तो…प्यार बाँटते चलो!

मेरी यह बात कई लोगों को बहुत बुरी लगेगी, मगर वास्तव में अगर सोचा जाए कि इतने सारे त्यौहारों के बीच यदि एक दिन सिर्फ प्यार के नाम है भी तो इसे रहने दें।

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समलैंगिता! भारत में काग़ज़ों तक ही सीमित है, सोच में नहीं…

हमको कई प्रकार के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं, इनमें से एक है समानता का अधिकार, मुझे इस समानता का अर्थ तो बखूबी पता है, मगर मैं इसको कहाँ ढूँढूँ?

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पुरुषों की सोच को सशक्तिकरण की आवश्यकता है, महिलाओं को नहीं

मेरा मानना है कि महिलाओं को अगर प्रेरित किया जाए तो अवश्य एक सकारात्मक बदलाव आएगा, समाज में क्रांति का श्रेय महिलाओं की भूमिका पर निर्भर करता है। 

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क्या आज भी हमारे समाज को कबीर सिंह जैसी फिल्मों की ज़रुरत है?

हमारे देश के वर्तमान में महिलाओं की स्थिति कोई खास अच्छी नहीं है, ऐसे में कबीर सिंह जैसी फ़िल्में आग में घी डालने के जैसी हैं।

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