सामाजिक मुद्दे
घरेलु हिंसा – रिश्ते की ऊँच-नीच, एक ढका-छुपा सच

घरेलु हिंसा एक सच है, और आश्चर्य यह कि हिंसा करने वाला दोषी तक नहीं समझा जाता और सहने वाला शर्मिंदगी में घुलता चला जाता है। 

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बांझपन के लिए केवल औरत ही दोषी है ?

इस समाज में बांझपन के लिए क्या अकेली औरत ही दोषी है? साथ ही साथ यह भी सोचा जाना चाहिए कि क्या औरत ही औरत की दुश्मन हो सकती है?

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घरेलू हिंसा : पितृसत्तात्मक समाज का प्रभाव? एक हिस्सा?

घरेलु हिंसा के ज़्यादातर मामले घर की चारदीवारी से बाहर नहीं आते। जब घरेलू मामले घरेलू बनकर अपना गला घोंट दें, तो कानून सिर्फ कानून बनकर रह जाते हैं। 

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अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना आवश्यक

अन्याय सहना भी एक घनघोर अपराध है, जिससे हमें ही बाहर निकलना होगा, प्रकाश रूपी इस शक्ति को हमें ही अपनी पूरी ताकत से, सब जगह जगमगाते हुए फैलाना होगा।

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बलात्कारी संस्कृति – ‘लड़के तो ऐसे ही होते हैं’, ‘ओहो! ये सिर्फ मज़ाक था’, ‘कुछ तो व्यंग्य समझो’

अगर समाज में बलात्कार को, 'बदला लेना', 'नीचा दिखाना', 'सज़ा देना' या सेक्स को विकृत रूप में देखने की प्रवृति है, तो ये निश्चित ही रेप कल्चर है।

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दोनों लड़कियाँ! ओह! ऑपरेशन तो नहीं करवाया ना

जिन्हें हमारी चिता की अग्नि की चिंता है तो वो भी हमारी बेटियां कर लेंगी। केवल दो बेटियों के परिवारों को परेशान करना छोड़ दिजिए।

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