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माँ की जुबानी
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं एक अच्छी माँ कैसे बन सकती हूँ…

जब मेरी गलती से मेरी बेटी रोती थी तो सच मे बहुत दुःख होता था, मुझे...मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं अच्छी माँ नहीं हूँ। लेकिन एक अच्छी माँ कौन होती है?

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मैं से मां तक का सफर : एक हसीन अहसास या कुछ और?

झुंझलाहट उस वक़्त होती,जब सारा काम खत्म करने के बाद खाना खाने बैठो तो पता नहीं बच्चों को कैसे पता चल जाता है। उसी वक़्त नैपी गंदी करके रोना शुरू!

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इस मदर्स डे सोचिये कि आप एक मां के लिए क्या करते हैं…उनके गुणगान के अलावा!

इस मदर्स डे मां के लिए ये भी सोचें! मातृत्व की स्तुति हमारे दिमाग में इतनी समाई हुई है कि हम 'महानता और निस्वार्थता' से परे उनके बारे में सोच भी नहीं सकते।

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इस मदर्स डे मुझे सिर्फ़ एक दिन की छुट्टी चाहिए और कुछ नहीं!

इस मदर्स डे मुझे अपनी कभी भी ना ख़त्म होने वाली ड्यूटीज़ से सिर्फ़ एक दिन की छुट्टी चाहिए सिर्फ़ एक दिन...बस इतना ही चाहिए मुझे इस मदर्स डे!

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‘माँ’ के साथ-साथ अपने ‘मैं’ को ज़िंदा रखने का हुनर मैंने आशा से सीखा

आशा का 'माँ' से 'मैं' तक का सफ़र छोटा नहीं था। पूरी ज़िंदगी बीत गयी थी खुद के अन्दर के 'मैं' को पहचान दिलवाने में, अपने अस्तित्व को तलाशने में।

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ये रोटी बनाना नहीं आसां गालिब, बस यूं समझिए आग का दरिया है

पहले प्रयास के अगर मार्क्स मिलते तो मेरे नंबर नेगेटिव में आते। भगवान जी ने कोई ऐसी संरचना और इंसान ने कोई ऐसा नक्शा नहीं बनाया जैसा मेरी रोटी का आकार।

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