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shalini verma

I am Shalini Verma ,first of all My identity is that I am a strong woman ,by profession I am a teacher and by hobbies I am a fashion designer,blogger ,poetess and Writer . मैं सोचती बहुत हूँ , विचारों का एक बवंडर सा मेरे दिमाग में हर समय चलता है और जैसे बादल पूरे भर जाते हैं तो फिर बरस जाते हैं मेरे साथ भी बिलकुल वैसा ही होता है ।अपने विचारों को ,उस अंतर्द्वंद्व को अपनी लेखनी से काग़ज़ पर उकेरने लगती हूँ । समाज के हर दबे तबके के बारे में लिखना चाहती हूँ ,फिर वह चाहे सदियों से दबे कुचले कोई भी वर्ग हों मेरी लेखनी के माध्यम से विचारधारा में परिवर्तन लाना चाहती हूँ l दिखाई देते या अनदेखे भेदभाव हों ,कहीं न कहीं मेरे मन में एक क्षुब्ध भाव भर देते हैं धन्यवाद मेरी विचार यात्रा के साथी बनने के लिए l

Voice of shalini verma

मुझे रेस्तरां में सिर्फ इसलिए एंट्री नहीं मिली क्योंकि मैंने साड़ी पहन रखी थी…

"साड़ी स्मार्ट ड्रेस नहीं" मानने वाले इस रेस्तरां ने इनकी एंट्री रोकी! प्रश्न है कि महिलाओं के परिधान को कब तक निशाना बनाया जाएगा?

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एक खत जिसने रचा इतिहास और प्रिया झिंगन बनीं कैडेट 001

एक ख़त जिसने महिलाओं का भारतीय सेना में प्रवेश कराया वो था प्रिया झिंगन का, जो कैडेट 001 से एनरोल हुईं और उन्होंने अपने सपने को पूरा किया!  

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हिन्दी भाषा की वर्तमान स्थिति और भविष्य के लिए सरलता है ज़रूरी

हिन्दी भाषा की वर्तमान स्थिति और भविष्य के लिए भाषा में परिवर्तन कीजिये अन्यथा इतने विशाल साहित्य भंडार को पढ़ने वाला कोई रहेगा ही नहीं।

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लड़का उम्र में बड़ा है तो क्या हुआ, कमाता बहुत है…

शादी के एक साल तो प्रीति और चिराग के बीच फिर भी सब कुछ सही रहा पर दोनों की उम्र का अंतर उनकी विचारधारा में टकराता ही रहा।

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कब तक इंतज़ार करोगी, बताओ जीना कब शुरू करोगी?

सभी महिलाओं से मेरा एक सवाल है, ताउम्र हम सब के मन का करते हैं पर अपने मन का कुछ करने की हिम्मत क्या हमारे अंदर है?

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कुछ आशाओं के पेड़ भी हैं तो जिम्मेदारियों के पहाड़ भी तो हैं

अब भी मुझे जगना है उम्मीदों की मिटटी में कुछ इच्छाओं के बीज भी बोने हैं कुछ उनके फूल तोड़ने हैं फिर उनके फल भी लेने हैं।

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तुम क्यों अपने दिल की नहीं कहतीं?

कैसे स्त्रियाँ बस अपने लिए नहीं पर अपनों के लिए जीती चली जाती हैं, क्यों ये कभी अपने मन की नहीं करतीं, क्यों कभी अपने दिल की नहीं कहतीं?

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क्या मीराबाई चानू की जीत के बाद भी लोग उन्हें याद रखेंगे?

क्या मीराबाई चानू की जीत से लड़कियों को न सिर्फ़ सम्मान बल्कि अनेक राज्यों से आई इन बच्चियों के प्रति लोगों की मानसिकता में बदलाव आएगा?

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भारत रत्न श्री अब्दुल कलाम जी की पुण्यतिथि पर समर्पित एक लेख

देश को इतना महान वैज्ञानिक राष्ट्रपति केरूप में मिला था।देश को शक्तिशाली बनाकर सबके दिलों में घर उनने किया था।

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न आपको कमाने वाली पसंद है और न घर सजाने वाली

"चार पैसे कमाती हो तो क्या घर पर ध्यान ही नहीं दोगी? अपने आप को ज्यादा मत समझो समझी? चार पैसे कमाने लगी तो अपने को बहुत समझने लगी हो।"

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क्या महिला क्रिकेट टीम का कम वेतन सिर्फ बहस का एक और मुद्दा है?

महिला क्रिकेट टीम का कम वेतन अपने कौशल को विकसित करने के लिए वो सुविधाएँ नहीं दिला पता क्यूंकि उनको मिलने वाली राशि बहुत कम होती है।

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शादी के बाद मैं ऑफिस और घर के काम कैसे करुँगी?

कुछ ऐसे कदम उठाना ज़रूरी है जिनसे महिलाओं का पारिवारिक और कामकाजी जीवन प्रभावित ना हो और खुशी-खुशी दोनों जगह वे संतुलन बिठा लें।

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अशोक चक्र से सम्मानित प्रथम भारतीय महिला नीरजा भनोट कौन थीं?

इतिहास के पृष्ठों में नीरजा भनोट का नाम सदा के लिए अमर हो गया है। जब भी वीरता की बात चलेगी नीरजा का नाम उसमें अवश्य रहेगा।

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क्या गर्मी सिर्फ़ आपको लगती है, घर की बहू को नहीं?

सीरियल में अगर बहू कुछ गलत करती तो उस दिन वही चर्चा का विषय होता और रीमा को सुन सुन कर ऐसा लगता जैसे उसे ही सुनाया जा रहा हो।

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इन लोगों को मंदिरा बेदी का दुःख नहीं, सिर्फ़ उनके कपड़े दिखे…

मंदिरा बेदी के दुःख को समझने से अधिक उसके कपड़ों से लोगों को परेशानी हैl क्या जींस पहनने वाली महिलाओं को दुःख नहीं होता?

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ऐसी फ़ालतू बातें करने वाले लोग कैसे होंगे, ये सब जानते हैं…

समय बदल गया पर लोगों की सोच आज भी नहीं बदली। आज भी स्त्री भोग की वस्तु है, उसे उनके शरीर से ही तौला जाता है।

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क्या पत्नी या माँ होने का मतलब ये है कि मैं अपना ध्यान न रखूं?

"अपने आप को फ़िट रखने के लिए शादीशुदा या कुँवारी होने से क्या मतलब है? मुझे किसी को दिखाने के लिए नहीं स्वयं को स्वस्थ रखने फ़िट रहना है।"

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दिल्ली खेल विश्वविद्यालय की पहली कुलपति बनीं कर्णम मल्लेश्वरी

एक बड़ी खुशखबरी -  दिल्ली खेल विश्वविद्यालय कुलपति पद पर भारत की पहली महिला ओलंपिक पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी जी की नियुक्ति हुई हैं। 

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पता नहीं क्यों मैं सोचती बहुत हूँ…

सासु माँ से लेकर नाते रिश्तेदारों तक, भाई भतीजों से लेकर अपनी मित्रों तक, सबकी दिक़्क़त क्यों मुझे मेरी सी लगती हैं।

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मेरे बाबा, अब तुम नहीं मिलते…

उस गली के नुक्कड़ पर खड़े अब तुम नहीं मिलते। मेरे लिए अलग से चीजें लाने वाले और मुझे आँखों से ही समझाने वाले,अब तुम नहीं दिखते।

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चंद सवाल गंगा में बहती हुयी गंगा की ओर से…

ये सारे सवाल हैं ददरी घाट पर गंगा किनारे एक लकड़ी के बक्से के अन्दर से मिली गंगा के, जो एक महिला होने के नाते मैं आपसे पूछना चाहती हूँ। 

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मिडिया के सामने फफक फफक कर रो पड़ीं अभिनेत्री निशा रावल

महिलाएँ कब तक घरेलू हिंसा का शिकार होती रहेंगी? घरों के अंदर छिपी ऐसी कितनी ही कहानियाँ हैं जो सामने ही नहीं आ पाती।

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इस अकेली लड़की से पूरी सोसाइटी को परेशानी क्यों है?

“ये देखो शर्मा जी ने अपने फ्लेट को एक अकेली लड़की को किराये पर दे दिया है, बुढ़ऊ का दिमाग ख़राब हो गया है।" लीना ताई ने मुँह बिचकाते हुए कहा।

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त्योहार तो अपनो के साथ ही मनाए जाते है

बंद कमरे में अकेले बैठे-बैठे उनका जी उकताने लगा। बाहर झाँक कर देखा तो शांति थी। होली का हुडदंग ख़तम हो गया था।

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सुष्मिता सेन – 27 वर्ष पहले मिस यूनिवर्स बनने वाली पहली भारतीय महिला

भारतीय महिला सुन्दरता में किसी देश की नारी से कम नहीं है, यह बात पहली बार सुष्मिता सेन ने मिस यूनिवर्स बनकर पूरे विश्व के सामने रखी।

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इस बार की ईद कुछ ऐसी हो…

इस ईद कुछ तो चमत्कार सा हो, ये बेबसी ये बैचेनी अब दूर तो हो, साँसों पर अब कोई उधार ना हो, इन साँसों में फिर से बहार सी हो...

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माँ तुम कितना झूठ बोलती हो…

अपने हिस्से का खाना भी बच्चों को खिलाकर, मेरी भूख मर गयी कहती हो। बच्चों को खाते देख कितनी तुम खुश होती हो, माँ तुम कितना झूठ बोलती हो।

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इस रिश्ते में मेरी सहमति कुछ मायने रखती है या नहीं…

और वो सोचने लगी कि क्या इस रिश्ते में पत्नी की सहमति भी कुछ मायने रखती है या ये रिश्ता सिर्फ पति की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया? 

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अब मैं नहीं आप अपनी औकात में रहेंगे…

अभी तक वह सोचती आज सोम का दिन अच्छा नहीं निकला होगा उसे ऑफिस में काम बहुत है, तो वो कहाँ अपनी भड़ास निकालेगा? 

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इंतज़ार

उस लड़की का चेहरा तो नहीं दिखा, पर सफ़ेद सलवार सूट में खुले लंबे बालों में खड़ी वह उसका ध्यान खींचती रही।

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हिंदी साहित्य के साथ मेरा अनुभव…

लॉक डाउन के दौरान मैं बहुत से साहित्य प्रेमी जनों के संपर्क में आई और अनेक हिंदी लेखकों, कवियों व साहित्यकारों को जानने का अवसर मिला। 

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मैं आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ!

माँ को देखा हर बात में सर झुका कर, ग़लत को भी सही बताते, यही शिक्षा पाई उनसे, ‘आत्मसम्मान चाहे ना रहे, पर परिवार को तुम बचाना...'

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