रिश्ते
अपने जीवन में विशेष रिश्तों के बारे में भारतीय महिलाओं की सच्ची कहानियाँ
‘घर की बात घर में ही रहे’ के चलते अपने रिश्तों की बलि न चढ़ाएं

मुझे लगा वो मेरे पीछे आएंगे इसलिए मैंने मोबाइल कैमरा छुपा कर चला दिया, इतने दिनों से मेरे पास सबूत नहीं था इसलिए मैं बता भी नहीं रही थी।

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मेरे हक़ तुम्हारे हक़ से टकराते क्यों हैं?

सच कहूँ तो तुम्हारी पूरी जमात डरती है स्त्री से, जो अपने निर्णय स्वयं लेती है और अपनी ग़लतियों को सहेज कर, उनका श्रृंगार करती हैं।

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पत्नी के अधिकार इतनी आसानी से कैसे भूल सकते हैं आप?

क्या हुआ जो तू पैसे नहीं कमाती? तू बाकि काम संभालती है ना? तेरे पति के पैसे पर, उनकी कमाई पर तेरा क़ानूनी हक़ है। वे तुझे घर छोड़ने के लिए नहीं कह सकते।

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मेरे मायके जाने पर पतिदेवजी बड़े खुश हुए थे, लेकिन फ़िर…

"क्या हुआ? आज आ गई मेरी याद आपको? इतने दिन बाद? और कैसे चल रही आप दोस्तों की पार्टीज, बहुत मज़े कर रहे हो हमारे बिना...."

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मेरे जज़्बात – कुछ दबे, कुछ सहमे, कुछ टुकड़ों में बंटे जज़्बात

मोहब्बत के वादे, सतरंगी ख्वाब और अधिकार की हकीकत, मेरा तिरस्कार, तुम्हारा परिवार, तुम्हारा समाज, तुम्हारी बातें, तुम, तुम बस तुम।

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एक और एक ग्यारह – एक कहानी एक रिश्ते की ज़ुबानी

सास-बहु के रिश्ते को महामाया जी ने बहुत ही ख़ूबसूरती से इस सुंदर कहानी में पिरोया है, " यह क्या कह रही है तम्मना! सपने में अपनी दिल की बात कह रही है?"

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