LGBTQ
समलैंगिता! भारत में काग़ज़ों तक ही सीमित है, सोच में नहीं…

हमको कई प्रकार के मौलिक अधिकार प्राप्त हैं, इनमें से एक है समानता का अधिकार, मुझे इस समानता का अर्थ तो बखूबी पता है, मगर मैं इसको कहाँ ढूँढूँ?

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क्या हमारी पहचान हमारे नाम या जेंडर तक ही सीमित रहनी चाहिए?

बहुत से लोग अब अपने आप को नॉन बाइनरी के रूप में चिन्हित करना ज्यादा उचित समझते हैं, वे कहते हैं कि उनकी पहचान सिर्फ़ उनके शारीरिक अंगों से नहीं हो सकती।

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वाराणसी में एक लेस्बियन जोड़े ने मंदिर में शादी करके बता दिया कि ‘लव इज़ लव’

वाराणसी में दो लड़कियों ने अपने में एक क्रन्तिकारी कदम उठाते हुए एक दुसरे से की शादी और बता दिया कि प्यार का कोई जेंडर नहीं होता।

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धारा 377: इस बदलाव को स्वीकारना होगा

धारा 377- जिस समाज में लोग आज भी इस विषय पर बात करने से हिचकिचाते हैं, क्या इसे वहाँ सामाजिक स्वीकृति मिलेगी? मन में उठते हैं ऐसे कई सवाल। 

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