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Ekta Rishabh

एक कोशिश अपने विचारों को पंख देने की...... !

Voice of Ekta Rishabh

ये मम्मियों वाले काम मेरे से नहीं होते…

जब से सोहम हुआ था निधि का अकेले अपने दोस्तों के साथ कहीं आना जाना बंद हो गया था, जबकि नीलाभ अपने दोस्तों के साथ घूमने निकल जाता।

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सीरीज़ दिल्ली क्राइम के एमी अवॉर्ड जीतने पर शेफाली शाह ने ट्विटर पर यूँ ज़ाहिर की अपनी ख़ुशी!

शेफाली शाह स्टार्रर नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज दिल्ली क्राइम ने प्रतिष्ठित एमी अवॉर्ड को अपने नाम कर पुरे विश्व में भारत का नाम रोशन किया है।

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मेरी बहु मेरे लिए हमेशा चाँद का टुकड़ा रहेगी…

बहु के रूप में एक बेटी क्या मिली, निर्मला के सपनों को पँख लग गए। साथ में चाय पीने से ले कर बाजार में सेल और साथ में फिल्मे देखने जाना। 

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मोना सिंह ने शादी से कुछ साल पहले ही अपने एग्स फ्रीज़ करा दिए थे!

मोना सिंह ने शादी से करीब पांच साल पहले ही अपने एग फ्रीज़ करवा दिये थे और ये जानकारी बहुत सी महिलाओं के लिये लाभदायक रहेगी। 

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मैं सिर्फ आपका दामाद नहीं बेटा भी हूँ सासू माँ…

आपका हक़ है मुझपे। जब मेरी इतनी चिंता कर सकती हैं,  मेरे लिये प्रार्थना कर सकती हैं, तो मुझे मेरी गलती पे डाँट क्यों नहीं सकतीं?

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बिग बॉस का विवादों से रिश्ता और भी गहरा होता जा रहा है…

बिग बॉस में पूरे एक घंटे में सितारे सिर्फ एक दूसरे को नीचा दिखाने और इमोशनल कार्ड खेलने में निकाल देते हैं। तब इसे मनोरंजन कैसे कहा जा सकता है?

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ये आपका ही घर है और मैं आपकी बीवी…

गाड़ी के अंदर रिया अपने फ़ोन में बिजी थी कि तभी किसी ने गाड़ी की खिड़की पे ठक-ठक की। जैसे ही रिया ने नज़रें उठाईं,  उसे तो वहीं काठ मार गया।

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मैं सिर्फ आपकी बहु नहीं, बेटी भी हूँ माँ…

दस साल की बच्ची के मुँह से ये सुन रूपा को बहुत गुस्सा आया, "बिहेव योर सेल्फ सलोनी। वो दादी हैं तुम्हारी और जरुरी नहीं जो नानी करें वही दादी भी करें तुम्हें।"

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मोलकी सीरियल अपनी कहानी की वजह से चर्चा का विषय बन चुका है!

एक नये अनूठे और बिलकुल अलग विषय पर आधारित है ये बालाजी टेलीफिल्मस का कलर्स चैनल पर 16 नवंबर 2020 से एयर होना वाला सीरियल मोलकी...

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आज रिश्ता पक्का करने लड़के वाले आ रहे थे लेकिन…

थोड़ी सी पैरों की खराबी के लिए अपनी बेटी के भविष्य को दांव पर नहीं लगने देंगें। मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा तू एक बार फिर से जांच पड़ताल कर...

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और एक मां को उसका सबसे बेहतरीन तोहफा मिल गया था…

रूपा को डर था कि राघव के हर डिमांड को बिना सोचे पूरा कर देते हैं ऐसे तो चीज़ों की वैल्यू उसे कभी समझ नहीं आयेगी लेकिन आज...

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और उस दिन सच में मेरी खुशियां दुगनी हो गयीं थीं…

जब भी कोई त्यौहार आता सुगंधा बहुत उदास हो जाती, सब कुछ होते हुए भी एक अजीब सी ख़ामोशी और खालीपन भरा था उसके जीवन में। 

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कुछ तो अलग बात है अनुपमा सीरियल की अनुपमा में…

अनुपमा सीरियल एक सवाल पूछता है, क्या हमारा समाज विवाह निभाने की जिम्मेदारी स्त्रियों पे डाल पुरुषों को इस जिम्मेदारी से आज़ाद कर देता है?

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अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर देना…

खूब समझ रहा था अपनी कमी को विनोद, लेकिन स्वीकार करना उसके पुरुष के अहं पे ऊँगली उठने के बराबर होता और ऐसा कहाँ होता है...

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आपका मायका हमेशा बना रहेगा, ये मेरा वादा है…

उम्मीद थी अशोक भैया शायद भाभी को कुछ कहें, पर बड़े घर की बीवी और दहेज के सामान ने उनकी बुद्धि बदल दी थी।

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हमारा न सही लेकिन नेग का तो मान रखें ननद जी…

रिया का दिल धक् धक् करने लगा। आज तक ऐसे किसी को ज़वाब नहीं दिया था लेकिन खुद पर गर्व भी हुआ कि खुद को दब्बूपन से आजाद किया उसने...

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अब बस! उन निशानों से मुक्ति मिल गयी थी…

अब नील के निशान नहीं दिखते थे भाभी के बदन पर,  दिखती थी तो वही सौम्य मुस्कुराहट जो पाँच साल पहले देखी थी मैंने उनके चेहरे पर...

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मैं मेरी मम्मी को तो नहीं बचा सकी इन मारपीट से लेकिन आज…

रोज़ रोज़ आती आवाज़ों में नेहा को अपनी माँ की सिसकियाँ दिखती और उसकी आत्मा तड़प उठती। लेकिन अब बस हो चुका था...

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बेटी से अपनी बहु की बुराई नहीं करते माँ…

धीरे धीरे माँ की बातों ने मोहनी की खूबसूरती की जगह उसकी बुराइयों ने लेना शुरू कर दिया। रूचि कुछ ज़वाब नहीं देती सिर्फ हाँ हूं कर फ़ोन रख देती।

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व्रत न रखने पर तुम्हें कुछ हो गया तो…

नैना मॉल जा कर मेहंदी लगवा आना और अच्छे से तैयार हो पूजा करना और कुछ भी खाना पीना मत नहीं तो नमन के ऊपर परेशानी आयेंगी।

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और उसने जल्दी से कहा, “हस्बैंड जी स्पीक इन हिन्दी प्लीज़…”

शादी पास आती है तो लड़कियाँ पार्लर भागती है और ये रिद्धि ऊपर छत पर क्या पढ़ती रहती है। इतनी पढ़ाई तो इसने दसवीं और बारहवीं में भी नहीं करी।

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एक बुरे बाप से कहीं बेहतर है एक अकेली माँ…

अपने घर में नेहा ने ना कभी ऐसा देखा, ना सुना। पापा और भाई दोनों कितने सलीके से पेश आते माँ और भाभी के साथ। लेकिन यहां तो...

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मेरे सिरदर्द को बीमारी नहीं नौटंकी कहते हैं…

खुद की बेटी आने की इतनी ख़ुशी है कि व्यंजनो की लिस्ट पकड़ा दी, लेकिन कभी मेरे मायके से कोई आये तो डर-डर के दो सब्ज़ी बनाती हूँ। 

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अब बहु भी खायेगी गरमा-गरम रोटियां…

पापाजी ने प्लेट उठाई और रसोई की और चल दिए। उनके पीछे डरी सहमी सुम्मी भागी। पता नहीं क्या होगा आज, सोच-सोच के सुम्मी की जान निकली जा रही थी।

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काश उस दिन किसी ने उसे भी पनाह दी होती…

उसने दृढ़ निश्चय कर लिया, कि जो उसके साथ हुआ था, वह किसी के साथ वैसा नहीं होने देगी। और उस दिन...तो आखिर ऐसा हुआ क्या?

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एक दामाद होने के नाते तुम्हारे भी तो कुछ फ़र्ज़ हैं…

कहाँ था अमन का वो उत्साह जो उसके खुद के मम्मी-पापा आये थे तब था। खुद रिया ने कितने खुले दिल से उनका स्वागत किया था। तो अब ऐसा व्यवहार क्यूँ?

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सही मायनों में तो आज ही आयी थी इनके मिलन की बेला…

पिक्चर देकते हुए जब सुमित ने गुड्डन के हाथ को धीरे से छुआ तो गुड्डन ने अपना हाथ झटक दिया सुमित को बुरा तो लगा पर उसने कुछ कहा नहीं।

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और वो एक दुल्हन बनी उसके सामने खड़ी थी…

सीमा आज शाम को मैं तुम्हे दुल्हन की तरह सजा देखना चाहता हूँ। तुम वही लाल बनारसी साड़ी पहनना जो शादी के दिन पहनी थी और सोलह सिंगार भी करना।

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अपनी इज़्ज़त के साथ अब मैं कोई समझौता नहीं करुँगी…

अब तो जब मौका मिलता विनय ऋतू को इधर-उधर हाथ लगा देता। विनय की नज़रे ऋतू पर हीं  टिकी रहतीं, रिश्तों का लिहाज कर ऋतू चुप रह जाती।

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आपको सिर्फ अपने बेटे की थकान दिखती है मेरी नहीं…

शेखर काम करते हैं, तो मैं भी करती हूँ बल्कि उनसे ज्यादा करती हूँ। पर माँजी आपको सिर्फ शेखर का काम, उनकी थकान दिखती है, मेरी नहीं?

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जैसे ही सब ठीक होगा तुम्हारी लाडो घर आ जाएगी माँ…

तुमसे पूछ-पूछ कर मसाले तो डाले और खुशबू भी बिलकुल वैसी ही आ रही है, लेकिन वो प्यार कैसी डालूँ माँ जो तुम डालती हो इन अचार की बरियों में...

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उसके गुस्से ने घर को जेल बना दिया था लेकिन फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ…

उसने दरवाजा खोलते ही एक करारा थप्पड़ जड़ दिया पलक के गाल पे और लगे डांटने! डर से कांपती पलक के गाल रवि के उंगलियों के निशान से लाल हो चुके थे। 

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सेकंड चांस!

जो सपने सोम के अधूरे रह गए थे वो उसने दूसरे बच्चों के पूरे करने में लगा दिया। सोम ने एक बार फिर से जिंदगी को जीना सीख लिया था।

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कर्तव्य और फ़र्ज के डोर में बंधी बहु…

पिताजी के कमरे में गए तो एक जीर्ण शीर्ण काया बिस्तर पर पड़ी थी। एक समय के रौबदार व्यक्तित्व के मालिक अपने पिता को इस तरह असहाय देख बिलख उठी सुधा।

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आज इतने सालों बाद जब दोनों ने एक दूसरे को देखा तो…

दोनों प्यार के पंछी अपनी-अपनी ज़िम्मेदारीयों को पूरा करने निकल पड़े और आज इतने सालों बाद इस तरह दोनों फिर से मिल रहे थे...

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आज एक रोटी के लिए इस घर की अन्नपूर्णा तरस रही थी!

आज एक फैसला ले लिया था नीला जी ने कि अब अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करेंगी चाहे उन्हें वृद्धाश्रम ही क्यूँ ना जाना पड़े।

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जब सास ने निभाया अपने माँ होने का एक और फ़र्ज़…

निशा के लिए तो सौम्या अब मुफ़्त की नौकरानी बन गई थी! किसी काम में हाथ ना बांटती, जब रमा जी मदद करती तो हॅंस कर सौम्या उन्हें मना कर देती। 

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और यूँ हुई एक बहु की विदाई अपने ससुराल से…

विदाई के वक़्त जी भर के रोई शगुन अपने जन्म दाता के नहीं, अपने भाग्य विधाता के गले लग। कौन थे उसके भाग्य विधाता? और ऐसा क्या हुआ था उसके साथ?

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कब होगी वो पहली बारिश…

इंद्र लोग में बैठे स्वामी अब सुन भी लो ये अरज हमारी, अब भेज भी दो मेघदूतो को बरसाओ इस वसुधा पे पानी।

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Women In Corporate Allies 2020

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