फेमिनिस्ट
खनक – एक नई जगती उम्मीद!

"कितने नादान हो कि जानते भी नहीं कि लांघ कर तुम्हारी सारी लक्ष्मण रेखाओं को...ध्वस्त कर तुम्हारे अहं की लंका, कब से घुल चुका है वो उल्लास इन हवाओं में..."

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सुनो मैं भारत की बेटी बोल रही हूँ क्यूंकि अब तो मेरा ज़माना है…

किसी राजनीतिक विषय पर जब औरतें बात करती हैं तो यही कहा जाता है, "तुम्हें क्या? तुम अपना घर-बार सँभालो और अपने काम से काम रखो।"

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हम चाहें तो इस नए साल में बहुत कुछ बदल सकते हैं, ज़रुरत है वो पहला कदम उठाने की!

तो नए साल से मिली इसी ढांढस की बंधी हुई पोटली खोलिए और निकाल लीजिए पिछले बरस के फटे, पुराने, उधड़े और बेरंग सपने और कीजिए उनकी छंटाई, रंगाई!

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वो खुद को अपने ही नज़रिये से आंकती! क्या ये आप हैं?

सबसे खूबसूरत लड़की, मुस्कुराकर नज़रअंदाज़ करती है उम्र की निशानियों को! सबसे निडर लड़की, पंजा लड़ाती है दुनिया के लांछनों से! क्या ये आप हैं?

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अपनी प्रदर्शनकारी बेटी को एक माँ का खुला पत्र

मैं एक अभिभावक हूँ और मेरी बेटी अभी व्यस्क नहीं है, ये खुला पत्र मैंने खुद को और अपनी बेटी को उन तमाम युवाओं खासकर युवा महिलाओं और उनके अभिभावकों की जगह रख कर लिखा है।

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मैं नारी हूँ कोई अबला नहीं

नारी की शक्ति पहचानें और उसको अब अबला कहना छोड़ दें क्यूंकि जब तक सब उसे अबला कहेंगे, तब उसको कमज़ोर समझ कर उस पर अत्याचार होते रहेंगे। 

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