फेमिनिस्ट
क्यूंकि डर के आगे वो हैं-उनके इस जज़्बे को मेरा सलाम

ये कौम अलग ही मिट्टी की बनी हुई है, इसलिए डर के आगे है, साहस, सहनशीलता, गर्व और आत्मविश्वास के साथ इस डर से लड़ता हुआ इनका व्यक्तित्व।

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मैं एक गृहस्वामिनी हूँ – हाँ, मैं ही इस घर की बॉस हूँ

मैं इस घर की बॉस हूँ, मुझे सब देखना होता है। केवल बॉस ही नहीं, पियोन से क्लर्क तक मैं ही हूँ। सारे डिपार्टमेंट मुझे अकेले ही सम्भालने होते हैं। 

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मेरा पति ‘परमेश्वर’ नहीं – सावित्री बनने की उम्मीद सिर्फ औरत से ही क्यों

जो पति अपनी पत्नी को उचित सम्मान और प्यार ना दे, वो उसी दंड का पात्र हो, उसी अवहेलना का पात्र हो, जिसकी खरा ना उतारने पर, औरत होती है। 

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समय से उठना, टाइम-टेबल से काम का हिसाब करना – माफ़ कीजिए मैं नहीं हूँ कुशल गृहणी

सिर्फ समय से उठना, टाइम-टेबल से काम का हिसाब करना और बस रोबोट की तरह चलते रहना, क्या यही पैमाना है एक पत्नी, माँ या गृहणी को आँकने का? 

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भगवान् का होना, एक ज़रुरत या एक खुदगर्ज़ी, एक साज़िश

"भगवान् का होना तो ज़रूरी है, भगवान् न हो तो इंसानियत कैसे बिकवा पाएँगे?" प्रश्न है, 'क्या भगवान् का जन्म एक खुदगर्ज़ी, एक साज़िश है?'

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चुप थी तब, चुप हूँ आज-पर, लड़की हूँ बोझ नहीं

मैं चुप थी तब, मैं चुप हूँ आज-काश न होती, और बोल पड़ती, मेरे हक़ की बात-"लड़की हूँ, बोझ नहीं, इंसान हूँ, कठपुतली नहीं।"  

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