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हाँ, मैं अपनी कमाई के कुछ पैसे माँ को भेजती हूँ…

दीदी, सुरेश क्या बोलेंगे? मैं उनसे तो पैसे लेती नहीं हूं। मैं अपनी कमाई के कुछ पैसे अपनी मां को भेजती हूं। वह चाहकर भी मुझे मना नहीं कर पाते।

दीदी, सुरेश क्या बोलेंगे? मैं उनसे तो पैसे लेती नहीं हूं। मैं अपनी कमाई के कुछ पैसे अपनी मां को भेजती हूं। वह चाहकर भी मुझे मना नहीं कर पाते।

रिद्धिमा चाची को मैंने बैंक में अपनी मां के इलाज के लिए पैसे भेजते हुए  देखा। मैं मम्मी के साथ बैंक गई थी।

मैंने चाची से पुछा, “आप बैंक में क्या कर रही हैं?”

“बेटा मैं अपनी मां के इलाज के लिए पैसे भेजने आई हूं।”

चाची गांव में ही शिक्षिका थीं।

“अच्छा! क्यों आपकी मां बीमार हैं क्या?”

“हाँ बेटा हॉस्पिटल में हैं। मैं जॉब के कारण देखने तो नहीं जा सकती। लेकिन इलाज के लिए जो पैसे की जरूरत है, वह तो भेज सकती हूं।”

“आपको भाई  नहीं है क्या?”

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“हाँ… हाँ मुझे तीन भाई हैं।”

“तो फिर आप क्यों पैसा भेज रही हैं? ईलाज के लिए?”

“क्योंकि मैं उसकी बेटी हूं। मां बीमार है, खर्चे होंगे, मुझे तो पैसे भेजने ही चाहिए।”

“लेकिन चाची जब मेरी नानी बीमार थीं तो मेरी मम्मी ने तो पैसे नहीं भेजे थे! मम्मी कहने लगी कि मैं कैसे भेज सकती हूं? यह हमारे पति को अच्छा नहीं लगता। और मैं उनसे अपनी मां के लिए पैसे माँगू यह मुझे भी अच्छा नहीं लगता।”

मैं उन लोगों की बातें सुन रही थी।

चाची कहने लगीं, “इसलिए दीदी हर लड़की को नौकरी जरूर करनी चाहिए। ताकि अपने पैसे से वह अपने पति और अपने माँ दोनों का सम्मान रख सके। बचपन से ही मैं अपनी मां को अपने पापा के गलत-सही हर बात पर हाजिर जवाब या स्वीकृति देखती थी। और वो दादी की जली-कटी बातों को सुनते हुए भी किसी बात का दुःख नहीं मानती थीं। नानी से मिलने भी, जब पापा का मन हो तभी जा पाती थीं।

इसलिए बचपन से ही मैंने अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान दिया। और हमेशा मेरी सोच रहती थी कि मैं खुद कमाऊं और अपनी मां, अपने पिता को यह अहसास करा पाऊँ कि बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं होता है। बेटी हमारा बहुत ही ख्याल रखती है। बस हमें अपनी बेटी का बचपन में ख्याल रखना होता है। उसकी परवरिश  उसकी पढ़ाई उसकी शिक्षा, उसकी समानता पर ध्यान देना होता है।” चाची भावनाओं में सब बातें कहती जा रही थीं।

मेरी मम्मी ने पुछा, “सुरेश कुछ नहीं बोलता है?”

“दीदी, सुरेश क्या बोलेंगे? मैं उनसे तो पैसे लेती नहीं हूं। मैं अपनी कमाई के कुछ पैसे अपनी मां को भेजती हूं। वह चाहकर भी मुझे मना नहीं कर पाते। मैं उनका घर संभालती हूं, मैं काम करके आती हूं उनकी हर इच्छा का ख्याल रखती हूं। मैं उनकी पत्नी हूं तो किसी की बेटी भी हूँ।”

चाची ने आगे कहा, “बस शनिवार रविवार को माँ से मिलने भी चली जाऊँगी दीदी। शादी के बाद जरूरी नहीं कि पुराने रिश्ते टूट जाते हैं।  पुराने रिश्तों में और मजबूती आती है।”

मैंने चाची से सवाल किया, “चाची आज आप नौकरी न करतीं तो अपनी माँ की मदद या बेटी होने का फर्ज कैसे अदा करतीं?”

चाची ने तुरंत कहा, “बेटा मैं उसके पास होती। मैं माँ के हर जरूरत में उसके साथ सशरीर खड़ी  होती। मुझे समझ आने लगा कि अपने विश्वास से बेटी और पत्नी दोनों रिश्तों के साथ न्याय किया जा सकता है।”

तब-तक चाची का काम बैंक में हो चुका था।

“निकलती हूँ दीदी। पर आप बैंक क्यों आई हैं?” चाची ने पूछा।

“मैं गुड़िया का इग्नू में मास्टर्स का एडमिशन के लिए ड्राफ्ट बनवाने आई हूं। ताकि यह भी तुम्हारे तरह स्वाभिमान से ज़िंदगी के हर रिश्तों के साथ जी सके। सही कह रही हो रिधिमा, मैं भी अपनी गुड़िया को अपने पैरों पर खड़ा करूंगी। ताकि यह भी अपने  रिश्तों के प्रति सारे कर्तव्य को उचित तरीके से निभा सके”, मम्मी ने कहा।

मैं अपनी भविष्य की योजनाओं को लेकर खुश हो रही थी। मम्मी का मेरे प्रति विश्वास से मैं मजबूत हो रही थी। वहीं चाची मुझे ऑल द बेस्ट बोलकर बैंक से चली गईं।

इस तरह चाची के उस बातों ने मुझे एहसास कराया को कैसे अपने हौसले, अपने विश्वास, अपने ज्ञान से ससुराल और मायके के रिश्तों को संजो कर प्यार बनाये रखना होता है। मजबूती से हर रिश्तों का सम्मान करना होता है। जो मैं जरूर करूँगी।

इसी प्रतिज्ञा के साथ मैंने फॉर्म पर सिंगनेचर किया।

इमेज सोर्स: Still from Short Film Sleeveless, Pocket Films/YouTube

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