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Laxmi Kumawat

मैं एक ब्लॉगर हूँ, मुझे ब्लॉग्स के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करना अच्छा लगता है।

Voice of Laxmi Kumawat

माँ, जीतने के चक्कर में आपने अपना घर तोड़ दिया…

"शर्म आनी चाहिए मां। झगड़े आप करा रही थीं। जीतने के चक्कर में आपने अपना घर तोड़ दिया और फिर भी इल्जाम अपनी बहुओं को दे रही हो?"

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सास की मदद करना फ़र्ज़ तो बहु की मदद अहसान क्यों…

जब उन्हें मदद की जरूरत पड़ती है तब वह बच्चों को उनका फर्ज याद दिलातीं, लेकिन जब सुमन काम करती है तो उन्हें बच्चों का मदद कराना रास नहीं आता।

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ननद रानी, जिनके घर शीशे के होते हैं वो…

संचिता जब भी किसी बात के लिए पूछती, तो सास का जवाब यही होता कि मेरी बेटी की तो जिंदगी बर्बाद हो रही है और इसे अपनी ही पड़ी है।

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बहुत दिन से लड़ रही थी अपनों से, अपने लिए…

कुछ लोग यह भी कहेंगे कि लड़ना चाहिए था, पर एक बात बताइए, बहुत दिन से लड़ ही तो रही थी अपनों से अपने लिए, पर जीत नहीं पा रही थी...

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बहू तो मेहमान की तरह आती है…

सुधा जी ने कहा, “बहू कहां जा रही हो तुम? सभी की बहुएँ यहां रुकी हुई है और तुम्हें घर जाने की लगी है। अब कल तो बारात ही है, यहीं रुक जाओ।"

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मैं एक आदर्श बहू तो नहीं बन पाई लेकिन…

"एक बात बताइए मुझे, कहां से लाते हो आप आदर्श बहू का तराजू? और उस तराजू में हमेशा पलड़ा आपकी बहू का ही क्यों हल्का होता है?"

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बहु, एक टुकड़ा आलू का पराँठा खिला दो

जिन पोते-पोतियों को इतना लाड लड़ाया, वो भी अम्मा से मिलने नहीं आते। और जिससे हमेशा गुस्सा रहे, आज वही बुरे वक्त में उनके साथ खड़े हुए हैं।

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बहु, जो भी करना मेरे मरने के बाद करना…

“देख लो बेटा, मुझे तो यह सब पसंद नहीं है। अभी से अपनी मनमर्जी चला रही है। बड़ों का तो कोई लिहाज ही नहीं है।”

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माँजी, आपकी बहु बेटा पैदा करने वाली मशीन नहीं है…

किसने कहा वंश बेटे चलाते हैं? वंश तो बहू चलाती है, जो अपने गर्भ में एक नये जीवन को संचारित करती है वो भी अपने शरीर की सुधबुध खोकर।

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भाभी, साड़ी में आपके स्ट्रेच मार्क्स नज़र आते हैं…

एक औरत जब मां बनती है तो उसमें शारीरिक बदलाव होना बहुत ही नॉर्मल सी बात है और यह कोई शर्म की बात नहीं है

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बहु, तुम्हारे हिस्से की रोटी हम क्यूँ बनाएँ…

अब यहां कोई नौकर तो लगा नहीं है, जो तुम्हारे लिए रोटी सेक रखेगा। हमने रोटी सेककर खा ली है। तुम अपने लिए रोटी सेक लेना।”

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आजकल बहु को भी बेटी बना कर रखना पड़ता है…

सही कहा तुमने, बहुओं का हक कल भी एहसान था, आज भी एहसान है और ना जाने, आने वाले कल में भी शायद एहसान ही होगा।

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मुझे घर से रिटायरमेंट चाहिए…

विभा ने कई बार दबी जबान से कहने की कोशिश भी की थी कि अब तो आप लोग घर संभाल सकते हो, तो क्यों ना मैं एक-दो दिन के लिए...

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हम अपने बेटे की शादी धूमधाम से करेंगे लेकिन अपने पैसों से…

मम्मी कह रही थी कि अनन्या उनकी इकलौती बेटी है तो वह कार भी तो देंगे ही अपनी बेटी को। इसी बात को लेकर मेरी और पापा की मम्मी से बहस हो गई।

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दीदी, आज से मेरी बेटी भी घी वाली रोटी खायेगी!

“अगर जिंदगी मुझे दोबारा मौका दे रही है तो मैं क्यों घर में बैठूँ। मेरी बच्ची को भी घी वाली रोटी खाने का हक है और उसके लिए ऐसी रोटी मैं कमाऊंगी।”

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आखिर मैं भी कब तक चुप रहती?

चलते-फिरते मुझे ससुर जी, कभी मेरे देवर, तो कभी मेरे पति याद दिला दिया करते थे कि मैं इस घर में उनकी पसंद नहीं हूँ।

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कम से कम ससुराल वाले तुम्हें भूखा तो नहीं मार रहे…

तेरे कारण मेरी दोनों छोटी बेटियों की शादी नहीं हो पाएगी। लोग कहेंगे कि बड़ी बहन तो खुद पीहर आकर बैठी हुई है, पता नहीं छोटी कैसी होगी।

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हाय राम! तुम्हारी दूसरी शादी भी टूट गई?

"सुना है आजकल मैं आप लोगों के मनोरंजन का साधन बनी हुई हूं। जहां भी आप लोग इकट्ठे होते हैं, सब लोग मेरे ही बारे में तो बात करते हैं।"

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समाज के नाम पर कितना ध्यान रखोगे तुम…

समाज के नाम पर, हे भगवान! कितना ध्यान रखोगे तुम, इतनी परवाह कि हमें आदत नहीं, इतनी परवाह करते रहे तुम, तो हो जाएगी हमारी भी आदत खराब।

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हर त्यौहार पर सामान नानी के घर से ही क्यों आता है?

पापा हर त्यौहार पर सबके कपड़े और मिठाई नानी के घर से आते हैं। इसका मतलब है कि हमारे पास कपड़े और मिठाई खरीदने के पैसे नहीं है।

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एक विधवा का दुःख उसके चेहरे से दिखना चाहिए…

याद है जब तुम्हारे जेठ जी की मृत्यु हुयी, लोग मेरे चेहरे को घूर-घूर कर देखते थे कि मैं रो रही हूं या नहीं, मुझे कितना दु:ख हुआ है।

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बहु अपने दोस्तों से कहो तुम्हें ससुराल में मिलने ना आएं …

जब से सुना कि अरविंद घर आने वाला है, तब से अनुज ढंग से बात नहीं कर रहा। आखिर मेरे दोस्त के घर आने से क्या समस्या हो सकती है?

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मैं कुछ नहीं करती क्योंकि…

सुबह से रात तक पूरे घर में चक्कर घिन्नी की तरह घूम जाती हूँ, सब को गर्म खाना खिला कर, खुद ठंडा खाती हूँ, पर मैं कुछ नहीं करती।

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