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बहु, तुम्हारे हिस्से की रोटी हम क्यूँ बनाएँ…

अब यहां कोई नौकर तो लगा नहीं है, जो तुम्हारे लिए रोटी सेक रखेगा। हमने रोटी सेककर खा ली है। तुम अपने लिए रोटी सेक लेना।”

अब यहां कोई नौकर तो लगा नहीं है, जो तुम्हारे लिए रोटी सेक रखेगा। हमने रोटी सेककर खा ली है। तुम अपने लिए रोटी सेक लेना।

रितु जल्दी जल्दी घर की तरफ कदम बढ़ा रही थी। उसे पक्का विश्वास था कि आज तो उसे डांट पड़ेगी ही पड़ेगी, क्योंकि ट्रैफिक के कारण आज वह लेट हो गई थी। साथ ही सिर भी दर्द से फटा जा रहा था।

ऑफिस से घर आई तो देखा सुजय और देवर अतिश टीवी देख रहे हैं। सासू जी और ननद नेहा बड़बड़ करती हुई खाना खा रही है। उन्होंने ऋतु की तरफ ऐसे घूर कर देखा जैसे ना जाने घर में कौन घुस आया हो।

रितु ने चुपचाप बैग कमरे में ले जाकर रखा, हाथ मुंह धोया, कपड़े बदले और किचन में खुद के लिए खाना लेने गई तो देखा उसके लिए तो रोटी थी ही नहीं।

इतने में सासू मां की आवाज आई, “क्या ढूंढ रही है महारानी? रोज का तमाशा हो गया है तुम्हारा लेट आने का। अब यहां कोई नौकर तो लगा नहीं है, जो तुम्हारे लिए रोटी सेक रखेगा। हमने रोटी सेककर खा ली है। तुम अपने लिए रोटी सेक लेना।”

यह सुनकर रितु की आंखों में आंसू आ गए पर उसने कुछ नहीं कहा। चुपचाप अपने लिए दो रोटी सेकी। सब्जी भी थोड़ी सी बची थी उसी के साथ रोटी खाकर पानी पी कर अपने कमरे में चली गई।

इतने में नेहा कमरे में आई और जोर जोर से चिल्लाने लगी, “भाभी, बर्तनों का जो ढेर लगा हुआ है उन्हें धो कर रखो। खाना तो हमने बना दिया, कम से कम आप किचन के साथ बर्तन तो साफ कर ही सकती हो।”

रितु चुपचाप उठी और किचन में जाकर साफ सफाई कर बर्तन धो करके आई।

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रितु को बुरा तो बहुत लगता पर कहती भी क्या? पति माँ के डर से साथ देता नहीं। माता-पिता ने भी यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि बहू को तो घर का काम करना ही पड़ता है।

कई बार सोचती कि जॉब छोड़ दूं। पर उसके बाद क्या?

छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी उसे अपने पति सुजय पर निर्भर होना पड़ता, और अगर सासूमाँ को पता चल जाता तो वह दिन रात, “पैसे क्या पेड़ पर लगते हैं?” का ताना मारती रहती।

अक्सर ऐसा ही होता था उसके साथ। जब भी कभी वह ऑफिस से आने में लेट हो जाती थी तो सब खुद के लिए रोटी बना कर खा लेते थे, पर रितु के लिए कभी रोटी नहीं बनाते। रितु को अपनी रोटी खुद ही सेकनी पड़ती थी।

एक बार उसने कह भी दिया कि मेरे लिए भी एक दो रोटी सेक कर रख दिया करो तो उस पर तानों की जो बौछार हुई सो हुई, उसके माता-पिता को भी ससुराल बुला लिया गया। उसके बाद से रितु ने तो कान ही पकड़ लिये।

एक साल की शादी में ही उसे इतना परेशान कर दिया गया। कई बार सोचती कि सब कुछ छोड़ छाड़ के कहीं चली जाए, पर एक औरत इतनी कमजोर नहीं हो सकती।

एक दिन ऋतु की मौसी सास कुछ दिन रुकने के लिए उनके घर पर आई। दो-तीन दिन तो ठीक रहे लेकिन चौथे दिन रितु को आने में फिर लेट हो गया। पीछे से सासूजी का बड़बड़ाना शुरू हो गया।

उस दिन ऋतु के मौसी सास ने गौर किया कि उसकी बहन अपनी बहू के साथ किस तरह से व्यवहार करती है और रितु अपनी रोटी खुद बनाती है।

जब दूसरे दिन रितु किचन में काम कर रही थी, उस समय मौसी जी उसके आई, “मैं तुमसे बात करना चाहती हूं। तुम ये सब क्यों बर्दाश्त करती हो।”

“मैं समझी नहीं मौसी जी, आप क्या कहना चाहती हो”

“देखो बेटा, तुम आज के जमाने की नारी हो। अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। कब तक बर्दाश्त करती रहोगी। जब तुमको ये लोग घर का सदस्य ही नहीं मानते तो तुम किसके लिए यह सब करती हो? अपने आप से चैलेंज क्यों नहीं लेती? बाकी तुम खुद समझदार हो”, रितु को मौसी जी की बात समझ में आ गई।

सुजय और अतिश नाश्ता करके टिफिन लेकर ऑफिस जा चुके थे तो उसने खुद का टिफिन बनाया और ऑफिस चलती बनी। ऋतु के ऑफिस जाने के बाद जब सासू मां और नेहा किचन में आई तो देखा खाना तो तैयार ही नहीं है।

दोनों मां बेटी ने बड़बड़ करते हुए अपने लिए पोहे तैयार किए और  मौसी जी के साथ नाश्ता करने बैठी, “देखा तुमने, कैसे अपना टिफिन बना कर चलती बनी। जैसे घर में पीछे कोई रहता ही नहीं। किस्मत ही खराब है मेरी तो”

“हाँ मौसी देखो, शर्म भी नहीं आती। यहां सास और ननद भूखी बैठी है और वह टिफिन लेके चलती बनी।”

“अरे, तो अपने पति और देवर को तो बनाकर खिला गई ना और खुद का खाना भी खुद ही बना कर गई है। फिर क्यों परेशानी हो रही है तुम दोनों को?”

“क्या हम लोग उसके कुछ नहीं लगते? बहू है आखिर वो हमारी।”

“अच्छा, वही बहू जिसके लिए दो रोटी सेकने में भी तो तुम लोगों को शर्म आती है?”

“अरे वो तो जानबूझकर लेट आती है, ताकि घर का काम ना करना पड़े।”

“अच्छा तो तुम लोग भी तो जानबूझकर उसकी दो रोटी नहीं सेकते। आज शायद बहू को समझ में आ गया कि जब मेरे हिस्से की रोटी मुझे ही सेकनी है तो मैं दूसरों की रोटी क्यों सेकूँ। जो तुम लोग कर रहे हो, वह भी तो वही दे रही है गलत क्या है।”

मौसी जी की बात सुनकर नेहा और सासु माँ दोनों चुप हो गई।

शाम को जब रितु घर देर से आई तो देखा कि उसके लिए भी खाना तैयार था। और मौसी जी उसको देख कर मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

वाकई मौसी जी ने सच ही कहा था जब तक खुद से चैलेंज नहीं लोगे, दुनिया से लड़ नहीं पाओगे।

मूल चित्र: All Out Ad via YouTube

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