कथा और कविता
ठहराव की तलाश में हम भटकते रहे

इरादे मुक़म्मल करने को अक्सर रूह के कुछ हिस्से सिसकते रहे, ठहराव की तलाश में हम भटकते रहे।

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सर्दी की वो धूप कभी भुला ना पाऊँगी

कभी सूरज की कड़कन से आँख-मिचोली खेलते, पढ़ाई में ध्यान लग भी जाता था, शॉल को टेंट बनाते-बनाते सारा समय निकल जाता था। 

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मेरे घर की तरफ मुड़ती, वो गली

छूटे अपने, छूटा मोहल्ला, छूटे खिलौने, छूटा घरौंदा। याद रह गया तो ये आँगन, और मेरे घर की तरफ मुड़ती, वो गली।

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नारी हूँ नारी मैं-किस्मत की मारी नहीं

बीता वो पतझड़, मैं बसंत बन खिल आई हूँ, रूबरू रोशनी नई, आज ख़ुद चाँद बन, बादलों को चीर निकल आई हूँ।

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यह इक्कीसवीं सदी, है ना? अब तो मैं बोलूँगी

क्या होगा? अगर मैं कह दूँ, "मैं खुद गयी थी लंका। उस भले आदमी के साथ।"

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थेरी गाथा-हमारे लिए कोई धर्म नहीं बना

भिक्षुओं से चौरासी नियम अधिक हमारे लिए रच कर, हे मर्द महाबोधि, आप ने भी साबित कर दिया, औरतों के लिए कभी कोई धर्म नहीं बना। 

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