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कथा और कविता
अपनी किस्मत के साथ ऐसा समझौता मुझे मंज़ूर था…

पिता का भी अभी पंद्रह दिन पहले देहांत हुआ था, कार एक्सीडेंट में। जिस कार से एक्सीडेंट हुआ वो सेठ रत्नदास की थी जो कि आज निशा के ससुर थे। 

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मैं अपनी क़िस्मत से भी लड़ जाऊँगी…

होती हैं ये सब किस्मत की बातें,मैं भी यही सोचा करती थी। है अगर यही मेरी क़िस्मत तो, मैं किस्मत से भी लड़ जाऊंगी।

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क्या बड़े महलों में बंद रहेगी असली महारानी?

बड़े बड़े इन महलों में बंद, बुलबुलें झटपटाती हैं, क्या किसी के लिए लड़ेंगी, आपबीति नहीं कह पाती हैं, आपबीति नहीं कह पाती हैं...

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अपने बीते कल को देख कर मुस्कुराना ज़रूर…

कभी किसी वक्त उस पन्ने को पलट के देखना ज़रूर, अपने बीते हुए कल को निहारना ज़रूर, फिर एक बार तुम मुस्कुराना ज़रूर...

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कल की पीछे छोड़ मैं आज कुछ करना चाहती हूँ…

नहीं थूक पाई, भीड़ भरी बस में उस आदमी पर, जिसके हाथ लगातार उसके आगे खड़ी औरत के जिस्म को छू रहे थे, तब बोलना चाहिए था, कुछ करना चाहिये था...

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मुझे दिखावे वाला आराम नहीं चाहिए…

अपनी माँ को हमेशा अभाव में देखा था अवि ने इसलिए नौकरी मिलते ही इ.एम.आई ले कर घर में सुख सुविधा की चीज़ें जुटाने लगा। 

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