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कथा और कविता
अंदर से बिखरी लेकिन बाहर से हमेशा संवरी क्यों नज़र आती हैं कुछ औरतें?

मुझे वो चिड़िया हम औरतों की तरह लगी, अंदर से कितना भी बिखरी हों, मगर बाहर से सवरीं ही नज़र आती हैं। सब कुछ नज़र अंदाज कर के लगी रहती हैं ना?

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मानते हो तुम शिक्षित नारी को एक अभिशाप अपने समाज में क्यूँकि…

इक शिक्षित नारी अभिशाप है इस समाज में क्योंकि वो नहीं मानती तुम्हारी दकियानूसी सोच को, ललकारती है तुम्हारे पुरूषत्व को, जो नारी और वस्तु में भेद नहीं समझता। 

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मर्द के दिल की, मैं बात सुनाऊं जो…औरत हो ऐसी कि…

ये नहीं कहूँगी कि ये बात सब पर लागू होती है - बंद कमरे में, तकिए सी लगें जो, और उफ़ भी न करें जो, अक्सर मर्दों को ऐसी औरतें, बहुत हसीन लगती हैं।

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क्या सीमा की सास का रज्जो के लिया ऐसा कहना सही था?

हमारे घरों में काम करने वालों को समाज के लोग हीन दृष्टि से ही देखते हैं। बहुत कम ही परिवारों में उनका सम्मान किया जाता है। उन्हें उचित दर्जा दिया जाता है।

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उन पर्दों के पीछे ऐसा क्या चल रहा था जो रिया को ये कदम उठाना पड़ा?

आखिर रिया को हो क्या गया है? लगभग एक महीने से उसके व्यवहार में बहुत परिवर्तन आया है, सुबह शाम पुरे घर के परदे, खिड़की, दरवाजे बंद कर देती है।

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खुद से खुद करती प्रश्न, कौन हूँ मैं…कौन हूँ मैं?

नहीं था कोई जवाब खुद के ही सवालों का खुद के पास, बस एक ही आवाज़ आ रही थी, कौन हूँ मैं? आखिर कौन हूँ मैं?

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