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कथा और कविता
क्या दीदी ने जीजाजी को डंडे मार कर भगा दिया?

"यह मेरा घर है, मैं यही रहूंगी, कहीं नहीं जाऊंगी, समझी? तुम्हारे जीजा जी को भगा दूंगी, नहीं जाएंगे तो डंडे मार के भगाऊंगी।"

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हाँ, अब मैं खुद को तराश रही हूँ!

हाँ मैं हूँ आधुनिक नारी, किरदार बहुत हैं मेरे लेकिन अब मैं खुद को भी तराश रही हूँ, हाँ मैं अपना अस्तित्व बना रही हूँ।  

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आप घर की लक्ष्मी को दुर्गा बनने के लिए मजबूर कर रहे हैं…

"क्या कहा आप ने? आप थप्पड़ मार कर मेरा दिमाग ठिकाने लगाओगे? अगर पलट कर मैं भी आपको थप्पड़ लगा दूं तो आपको कैसा लगेगा?"

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थोड़े संस्कार आप अपने लिए भी तो बचा कर रखें…

उम्र चाहे मेरी कुछ भी, बचपन का या पचप्पन का, शर्म का घूँघट मैं ही रख लेती हूँ, क्योंकि जनाब नारी हुँ मैं? सिर्फ इसलिए कि नारी हूँ मैं...

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मेरी सास की सास आयी, तो मुझे सांस आयी…

छः महीने हुए थे शादी को नई-नई शादी में मनु के भी अरमान थे, लेकिन मम्मीजी ने उन्हें अकेले नहीं छोड़ा था, हर जगह साथ लग जाती।

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आजकल बहु को भी बेटी बना कर रखना पड़ता है…

सही कहा तुमने, बहुओं का हक कल भी एहसान था, आज भी एहसान है और ना जाने, आने वाले कल में भी शायद एहसान ही होगा।

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