कथा और कविता
क्या सिर्फ़ मेरा पहनावा मेरी आधुनिक सोच की निशानी है?

कहाँ तो केतकी सोच रही थी कि गुलाबी शिफ़ॉन की साड़ी में देख, रोहन उसे निहारता रह जायेगा और उसकी तारीफ़ों के पुल बाँध देगा परन्तु रोहन...

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पायल, चुनरी, चूड़ी को तू अब अपनी आवाज़ बना!

मत देख उन उँगलियों को जो उठती तेरी तरफ हैं, पायल को तू अपना श्रृंगार बना, चूड़ी को तू अपनी आवाज़ बना, न बनने दे बंधन उसे क्योंकि नारी तू बस नारी नहीं। 

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बस बहुत हुआ दहेज दो या रहने दो का नाटक, अब तुम रहने ही दो!

पैसे की चाह और एक गाड़ी आलीशान, इतने की ख्वाहिश की दंभ में चूर, उछाल कर पगड़ी धमकी स्वरूप 'दो या रहने दो' के भेड़ियों पर आज है समाज शर्मसार!

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कुछ लोग और उनकी यादें हमेशा हमारे साथ रहती हैं, और आखिरी दम तक साथ निभाती हैं!

क्यों मेरे हृदय पर अपने वर्चस्व का परचम फैलाना चाहती हो, क्यों तुम्हारी वह मुस्कुराहट मेरा पीछा नहीं छोड़ती, जो मेरी हर दर्द की दवा थी?

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माँ-बाप बनने के लिए सिर्फ अपना बच्चा ही क्यों, बच्चा गोद लेना भी तो एक विकल्प है!

छवि और अनंत की शादी को पांच साल हो गए थे, पर वो माँ नहीं बन पा रही थी और जब डॉक्टर ने दोनों की जांच कराई तो पता चला कि अनंत कभी पिता नहीं बन सकता।

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आस्था और तर्क के बीच ताल-मेल बनाए रखना कितना ज़रूरी है?

निराहार से दादी की तबियत गड़बड़ होने लगी, पर बिना कलश स्थापना किए खाने को तैयार ही नहीं थीं इससे घर के सभी सदस्य परेशान होने लगे।

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