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कथा और कविता
आज ज़िन्दगी को फिर से ढूंढते हैं…

चलो हंसने की वजह ढूंढते हैं, जिधर ना हो कोई गम ऐसी जगह ढूंढते हैं! बहुत भटक लिए ज़िन्दगी के दौड़ में, कहीं सुकून से बैठने की जगह ढूंढते हैं!

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आज जब आँख खुली तो एक नयी सुबह मेरा इंतज़ार कर रही थी…

देखो अब ज्यादा बहाने न बनाओ, जरा बाहर तो देखो, ऐसी सुबह तो आज पहली बार दिल्ली जैसे बड़े शहर में देखने को मिली है।

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कभी तो स्वयं को भी भूल जाती हैं ये लड़कियां!

घर की देहरी भी लांघती हैं तो दूसरे की खातिर। स्वयं में स्वयं को तलाशना भी भूल जाती हैं...ऐसी भावुक भी होती हैं ये लड़कियाँ...

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सही मायनों में तो आज ही आयी थी इनके मिलन की बेला…

पिक्चर देकते हुए जब सुमित ने गुड्डन के हाथ को धीरे से छुआ तो गुड्डन ने अपना हाथ झटक दिया सुमित को बुरा तो लगा पर उसने कुछ कहा नहीं।

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माँ मुझको बंदूक दिला दे, मैं अपनी लाज बचाऊंगी!

कोई भी प्रदेश हो, सरकारें तो आती जाती रहेंगी, बेटियां भी यदि यूं ही जाती रहीं, तो एक दिन हर मां अपनी बेटी को बंदूक देकर ही घर से बाहर भेजेगी!

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नहीं मिलता जब तक इंसाफ, कोई चूल्हा नहीं जलेगा…

वहशी खुले घूम रहे, जब यूं गली गली, हमारे सम्मान की चिता, यहां हर रोज़ जली। कह दो जब तक, नहीं मिलता इंसाफ, कोई चूल्हा नहीं जलेगा।

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