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Chandani Jha

रिश्तों और परिवार की अहमियत मेरे लिए सबसे ज्यादा है।

Voice of Chandani Jha

घर के काम मैं करूँ या तुम, क्या फ़र्क़ पड़ता है?

सीमा को अपने पति पर गर्व होता। उसने सपने में न सोचा कि उसका पति उसका साथ देगा। क्या करती, बचपन से उसने देखा कि ज़रूरत सिर्फ पति की होती है।

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तुम मेरी बहू भी हो और बेटी भी…

"मेरे बेटे ने पसन्द किया है लड़की को और लड़की रहना चाहती है। मैं माँ हूँ अगर मैं साथ न दूँगी तो मेरे बच्चे दुनिया में अकेले हो जायेंगे।"

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इस युद्ध में मैं खुद ही कृष्ण बनी और खुद ही अर्जुन!

शादी के बाद सुगंधा ससुराल गयी, तो वहाँ कभी खाना मिलता तो कभी नहीं, कभी ये नहीं तो कभी वो नहीं। घर की माली हालात अच्छी न थी।

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एक विधवा औरत सुहागिन का माँग भरती है क्या…

पर शादी में जितनी महिलाएं आयी थीं, दुल्हन से ज्यादा शिवानी पर सबकी नजरें थी। कुछ तो "अनर्थ" कहकर चल दीं उठकर शादी से।

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आज सोचती हूँ ससुराल नहीं तो न सही, नाम तो मिला…

बहुत बुरा लगता मुझे कि मुझे ससुराल और ससुराल के रिश्ते होते हुए भी कुछ नहीं मिला। और मेरे ही कारण मेरे पति भी परिवार से अलग हो गए...

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मैं सिर्फ शादी करने के लिए पैदा नहीं हुई…

अब घरवाले उसकी शादी की तैयारी कर रहे थे। जैसे-तैसे उसने अपने माँ-पिता को बहुत अच्छे से समझा कर दो साल शादी न करने के लिए मना लिया।

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गंगा सी पवित्रता हो मुझमें!

जग तारूं, उद्धार करूँ,दया भाव से, सबको निवारूँ,न अपना कोई न बेगाना,बिन स्वार्थ सबका कल्याण करूँ,कल्याणी सी भव्यता हो मुझमें।

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मैंने अपने आत्मसम्मान को मरने नहीं दिया…

उन्हें खेद था लेकिन मैं आंसू पोंछकर, आत्मविश्वास से दमक रही थी। मेरा मन हल्का हो गया था कि मैंने अपने आत्मसम्मान को मरने नहीं दिया।

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आजादी

मैं जन्मदात्री, मैं ही हूँ उर्मि, और रानी चेन्नमा। मैं सहती कभी गृहप्रताड़ना, पर अब आजाद हूँ, मैं मजबूत हूँ, हूँ मैं कल्पना। मैं नारी, आजादी हमें प्यारी।

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मेरी बेटी को मैंने नहीं उसके पिता ने पाला है…

मेरे पति उसकी माँ बनकर उसके साथ रहते थे। स्कूल में उसका एडमिशन भी करवा दिया, उसे स्कूल छोड़ना, लाना, खिलाना, साथ में सुलाना सारा काम करते।

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ज़िंदगी का सफर

मैंने अपनी बेटी के सफर की शुरुआत अलग तरीक़े से किया है,जहाँ बचपन में खोना है, और किस्मत के साथ, खुद जिंदगी की मिल्कियत चुनना है।

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माँ को मेरी शादी नहीं पढ़ाई की चिंता थी…

इसी तरह चाचा के द्वारा कई बार कहने के बाद एक दिन माँ ने कहा, "पढ़ी है तो क्या हुआ? कोई गलत काम थोड़ी ना करी है।"

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शबरी सी भक्त हूँ और दुर्गा सी सशक्त हूँ…

शबरी सी भक्त हूँ, दुर्गा सी सशक्त हूँ। मेरे नाम अनेक, रूप अनेक, मैं औरत हूँ, हाँ मैं नारी हूँ, शक्ति मेरी अपार मैं महिला अवतारी हूँ।

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उस दिन की बरसात और पतिदेव का सरप्राइज़…

मेरी आँखें भर आईं। मेरी आँखें बरस रही थीं और बारिश का बरसना कम हो रहा था और परीक्षा देने के लिये जब मैं घर से निकली तो बारिश रुक चुकी थी।

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