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और अब मुझे मम्मी जी की ख़ामोशी समझ में आ गई थी…

Posted: August 7, 2020

रोहित ने जब भी मुझे अपने साथ ले जाने की बात की, कुछ न कुछ हो ही जाता,  कभी मम्मी जी बीमार हो जातीं, तो कभी पापा जी रोक लेते मगर वो ‘कुछ दिन बाद’ आया ही नहीं।

जब मेरी शादी हुई तो मैं बहुत खुश थी। मेरी शादी हो रही थी इसलिए नहीं बल्कि, शादी के बाद मुझे सास ससुर के रुप में माँ-बाप मिलने वाले थे इसलिए मैं बहुत खुश थी।

मेरे माँ बाप नहीं थे, चाचा-चाची ने ही मुझे पाला था। वो मुझसे नफरत तो नहीं करते थे मगर  प्यार भी नहीं जताते थे। मुझे माँ-बाप के प्यार की बहुत कमी महसूस होती थी। इसलिए जब मुझे पता चला कि मेरे सास-ससुर हैं तो मैं बहुत खुश हुई। 

“मैं उन्हें अपना बना लूगी”, मैंने खुद से कहा।

खैर शादी हो गई और मैं ससुराल भी आ गई। सब कुछ मुझे बड़ा अच्छा लगता रहा था। सास-ससुर के साथ ऊपर वाले ने मुझे एक ननंद भी दे दी थी। रोहित तो छुट्टी खत्म होने के बाद चले गए।  उनकी नौकरी दूसरे शहर में थी।

वो मुझे ले जाना चाहते थे, मगर पापा ने कहा, “कैसी बात करते हो? अभी तो हम अपनी बेटी को जान भी नहीं पाए और तुम अपने साथ ले जाने की बात करने लगे?”

“नहीं पापा वो मैने सोचा कुछ दिन के लिए ले जाऊं।”

“अरे ले जाना बेटा! कौन सा हम हमेशा बैठे रहेंगे? तुम्हारे ही साथ रहेगी”, उन्होंने कहा। 

जब मैं किचन में काम कर रही थी, तो मम्मी जी मेरे पास आईं, “तुम्हें बुरा लगा? तुम्हारे पापा जी ने तुम्हें नहीं जाने दिया। मैंने तो उनसे कहा था, नई-नई शादी हुई है, जाने दें। कुछ दिन घूम फिर लेगें, मगर मेरी सुनते ही नहीं। कहने लगे, मेरी बेटी अभी नहीं जाएगी। हमारा दिल नहीं लगेगा यहाँ। कुछ दिन बाद जाएगी।” वो शायद अपने तरफ से सफाई दे रहीं थी क्योंकि वो वहीं बैठी थीं मगर उस समय कुछ बोल नही पायीं थी।

“कोई बात नहीं मम्मी। मुझे बुरा नहीं लगा”, मैने कहा। मैं खुश थी कि सब मुझे कितना प्यार करते हैं। सब का काम मैं खुशी-खुशी करती थी।

वक़्त बीतता गया। रोहित ने जब भी मुझे अपने साथ ले जाने की बात की, कुछ न कुछ हो ही जाता।  कभी मम्मी बीमार हो जातीं, तो कभी पापा रोक लेते। वो ‘कुछ दिन बाद’ आया ही नहीं।

मम्मी जी मुझसे आ कर बोलतीं, “मैं तो चाहती हूँ तुम साथ जाओ, मगर तुम्हारे पापा जी तैयार ही नहीं होते। मैं उनके सामने ज्यादा बोल नहीं पाती।”

मेरी बेटी एक साल की हो गई थी। मेरा काम भी काफी बढ़ गया था। रोहित को बहुत टाइम बाद कुछ दिन की छुट्टी मिली थी। वो घर आए थे। मगर मैं उनको ज़्यादा टाइम नहीं दे पा रही थी। ना तो मम्मी जी, ना तो राखी ही मेरा काम में हाथ बटाती थी, इसलिए वक़्त ही नहीं मिल पा रहा था।

“तुमको अगर कुछ कहना रहा करे तो हमसे कहा करो रोहित से बोलने की क्या जरूरत है?” जब मैं पीहू को खाना खिला रही थी तो राखी मुझे बुलाने आई कि पापा बुला रहे हैं।  मुझे लगा शायद कोई काम होगा। मगर जैसे ही मै अंदर पहुची पापा मुझ पर चिल्ला पड़े। मैं हैरान हो कर उन दोनों को देखने लगी। मम्मी जी भी वहीं थीं मगर बोली कुछ भी नहीं। 

“क्या हुआ?” जब वो बड़बड़ाने लगे तो मैंने पूछा।

“बहुत काम रहता है क्या तुमको? साहब जादे काम वाली बाई लगाने के लिए कह रहे हैं। कह रहे हैं  तुमको बहुत काम करना पड़ जाता है। क्या ये सही है बहुत काम करती हो? तुम्हारी मम्मी जी कुछ नहीं करतीं?” वो काफी गुस्से में थे और  मम्मी जी खामोशी से अपना कपड़ा तह कर रहीं थीं।

जब भी कुछ होता पापा जी ही बोलते थे और वो एकदम खामोश बैठ कर सुनती रहतीं। अगर न भी होती तो पता नहीं कहा से आ कर बैठ जातीं। बोलती कुछ भी नहीं थी। ये खूबी तो थी उनमें।

“मैंने उनसे कुछ भी नहीं कहा”, मैंने अपनी बात रखनी चाही।   

“झूठ मत बोला करो बेटा! पाप होता है”, वो बोले तो पता नहीं क्यों मुझे पहली बार बहुत बुरा लगा।

“नहीं पापा मै झूठ नहीं बोलती”, मैं रुआंसी हो गई।  शब्द मेरे गले में अटक गए, “मम्मी जी आप कुछ तो बोलिये।”

“मैं क्या बोलूं?” उन्होंने सिर्फ यही बोला। वो पता नहीं क्या क्या बोले जा रहे थे, मैं बहुत परेशान हो कर उन दोनों को देख रही थी कि ऐसी कौन सी इतनी बड़ी बात हो गई? मेरे दिल मे ससुर जी के लिए जो इज्जत थी, वो धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही थी।

मैं उठ कर धीरे-धीरे चलती हुई बाहर निकल आई। थोड़ी दूर चलने के बाद मैंने सोचा मैं मम्मी जी से बात कर लूँ। छोटी सी बात है रोहित को मैं टाइम नहीं दे पाई तो इस लिए बोल दिया होगा। माँ तो समझ ही जाएगी। वैसे भी ये कोई बात है। जैसे ही मैं दरवाजे पर पहुचीं मेरे पैर अपने आप वहीं रुक गए। 

“वहाँ चलीं जाएगी महरानी जी तो जो चार पैसा रोहित दे रहा है वो भी बंद हो जाएगा। और यहाँ अगर काम वाली लगा लिया तो मैडम जी के रहने से फायदा ही क्या होगा? मैं तो कुछ कहती भी नहीं हूँ, तब भी यहाँ से भागने के चक्कर में है। वहां रहेगी, आजादी रहेगी, कोई कुछ बोलने वाला न रहेगा। जो मर्ज़ी बनाएगी खाएगी। इसलिए तो जब देखो रोहित ले जाने की बात करता रहता है। उससे दूर रह कर भी अपने बस में कर रखा है। आपको क्या पता कैसी झूठी-झूठी बातें बता कर मिलाती है!”

ये मम्मी जी थीं जिनको मैंने माँ माना था। जिनके लिए मेरे दिल में बेपनाह प्यार था। जिनके बारे में मैं कभी गलत बोलना तो दूर, सोच भी नहीं सकती थी!

अब सारा माजरा मेरी समझ में आ गया था। बात काम वाली की नहीं थी। उन लोगों को डर था कहीं रोहित मुझे अपने साथ न ले जाए। इस बार तो उन लोगों के पास कोई बहाना भी नहीं था।

एक और बात मेरी समझ में आ गई थी, लफ्ज़ मम्मी जी के होते थे और बोलते पापा जी थे। कितनी मीठी बनतीं थी। और कितनी खतरनाक थीं!

“रोहित अब की बार मैं भी आपके साथ चलूँगी। वहीं पर पीहू का एडमिशन भी करवा दीजियेगा, नहीं तो वो बड़ी हो जाएगी तो दिक्कत होगी।” रोहित जब मम्मी पापा के पास बैठे थे तो मैंने उनसे कहा। 

“अब तो मम्मी जी ठीक हैं, राखी भी है। काम वाली लगवा दीजिये। अभी तक मैं आपको मना करती थी, लेकिन आपको भी तो वहाँ दिक्कत होती है न। मम्मी जी भी यही चाहती हैं मगर पापा जी के सामने बोल नहीं पातीं।”

मूल चित्र : Canva Pro

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