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मांजी, पोते-पोतियों के बीच फर्क क्यों करती हैं आप?

लड़कियों का जन्मदिन घर में ही परिवार के लोगों के साथ मना दिया जाता था लेकिन लड़कों का जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनाया जाता था।

“बहू मेहमानों की लिस्ट बना लेना। और देखना कोई छूट ना जाएं। मैं अपने पोते का जन्मदिन बहुत ही शानदार तरीके से मनाना चाहती हूँ। ताकि लोग देखते रह जाएं।” सरला जी ने अपनी बहू रमा से कहा।

कमरे में मौजूद रमा और उसके पति अजय एक दूसरे का मुँह देखने लगे। लेकिन उस समय कुछ बोला नही बस चुप हीं रहे।

सरलाजी के कमरे से जाते रमा ने कहा, “अजय हमने तो तय किया था ना कि दोनो बच्चों का जन्मदिन समान रूप से मनाएंगे। हम अपने बेटे और बेटी की परवरिश में कभी कोई फर्क नहीं करेंगे। फिर तुमने माँ जी से कुछ कहा क्यों नही?”

“मुझे सब कुछ याद है रमा। बस अभी बात करने का सही समय नही था। कल सुबह उन्हें समझाने की कोशिश करूंगा।”

रमा और अजय की एक बेटी रुही तीन साल और दूसरा बेटा रोहित एक साल का था। आधुनिक विचारों की रमा का ससुराल बहुत रूढ़िवादी सोच का था। वहां आज भी लड़के-लड़कियों में काफी भेदभाव होता था। अब बात चाहे उनके परवरिश की हो या जन्म और जन्मदिन की खुशियां मनाने की।

लड़कियों का जन्मदिन घर में ही परिवार के लोगों के साथ मना दिया जाता था लेकिन लड़कों का जन्मदिन बहुत धूमधाम से मनाया जाता था। रमा घर की छोटी बहू थी। इसलिए बड़ो का सम्मान करते हुए वो कभी कुछ बोलती नहीं थी। तीन बच्चों की माँ उसकी जेठानी ने कभी कोई विरोध नहीं किया क्योंकि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था

एक दिन रमा ने अपनी जेठानी और सास की मौजूदगी में पूछा भी, “माँ जी भाभी के दोनो बच्चों के जन्मदिन में फर्क क्यों?” तब उनका कहना था ये आम बात है सभी ऐसा हीं करते हैं। जेठानी जी की भी एक बेटी खुशी और दो जुड़वा बेटे थे। लेकिन रमा जब भी खुशी के चेहरे की उदासी देखती उसका मन व्यथित हो जाता।

नौ साल की मासूम खुशी जब भी ये सवाल पूछती, आखिर उसके जन्मदिन पर उसके भाइयों की तरह बड़ी पार्टी क्यों नहीं की जाती तो सब उसको एक सुर में यही समझा देते, “बेटा तू अपनी बराबरी अपने भाइयों से मत किया कर। हम तो तुम्हारा जन्मदिन घर में मना भी देते हैं। लेकिन ना जाने कितनी ऐसी भी लड़कियां हैं जिनके जन्मदिन मनाए हीं नहीं जाते।”

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खुशी ये सुनकर शांत हो जाती। लेकिन रमा ने तय कर लिया था कि वो ये भेदभाव अपने बच्चों में नहीं होने देगी। अगले दिन रविवार की सुबह नाश्ते की टेबल पर सभी बैठे हुए थे। तभी रमा की सास ने कहा, “बहू मेहमानों की लिस्ट बन गयी हो तो दे दो। आज सब घर पर ही हैं तो सबको फोन से हम निमंत्रण भी दे देंगे।”

रमा ने अपने पति की तरफ देखा। लेकिन अजय ने लाचारी में नजरें झुका ली। तब रमा ने कहा, “माँ जी मैं आप सब से कुछ कहना चाहती हूँ। अच्छा हुआ कि आज सब एक साथ यहाँ मौजूद हैं।”

सरला जी ने कहा, “हाँ-हाँ कहो, क्या कहना चाहती हो?”

रमा ने कहा, “माँ जी मैं रोहन का जन्मदिन भी खुशी और रुही की तरह घर में परिवार और आस-पड़ोस के बच्चों के साथ हीं मनाना चाहती हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहती कि जब रोहन बड़ा हो तो उसको बेटे-बेटियों की परवरिश में कोई फर्क पता चले और उसके अंदर पुरुष का अहम उत्पन्न हो और वो महिलाओं को दोयम दर्जे का समझे।”

“क्या बकवास कर रही हो बहू? तुम्हारा दिमाग ठिकाने तो है। हमारे क्या ये तो समाजिक रिवाज हैं। पुरुषों का मान सदैव ऊंचा होता है क्योंकि उनसे ही वंशवृद्धि और समाज चलता है। अजय लगता है तुमने बहू को अच्छे से नही बताया है।” ससुर जी ने कड़कती आवाज में कहा।

अब तक चुप अजय ने कहा, “माफ कीजिएगा पापा!  लेकिन रमा गलत नही कह रही। मैं उसके साथ हूँ। मैं एक पिता होने के नाते अपने बच्चों में कोई भेदभाव नही कर सकता क्योंकि जितना प्यार मैं रुही से करता हूं उतना ही रोहन से भी करता हूं।

दूसरी बात पापा महिलाओं का स्थान युगों-युगों से पुरुष के बराबर ही रहा है। ये तो हमारे देखने और सोचने का फर्क है जो ये भेदभाव खड़े करता है। लेकिन ईश्वर ने दोनो को एक दूसरे का पूरक बनाकर धरती पर भेजा है। तभी तो चाहे वंशवृद्धि की बात हो या समाज के कोई काम अकेले दोनों में से किसी के लिए कर पाना सम्भव नहीं है।”

“इसलिए मैं एक पिता होने के नाते अपने दोनो बच्चों की परवरिश में हमेशा समानता रखूंगा। फिर चाहे बात शिक्षा की हो या जन्मदिन और रहन-सहन की जो सही होगा मैं वो ही करूंगा। इसलिए मैं आज रमा का हीं साथ दूंगा। हम कोई पार्टी नहीं देंगे ना हीं ऐसी किसी पार्टी में शामिल होंगे जो मेरे बच्चो में भेदभाव खड़ी करती हो।”

वहाँ मौजूद सभी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे और अजय रुही को गोद में लेकर कमरे में चला गया।

इमेज सोर्स : Still from the Short Film, Nidhi’s lunchbox, Six Sigma, YouTube

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