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अम्मा! नियम तो बदलने के लिए ही बनते हैं…

"अम्मा! नियम तो बदलने के लिए ही बनते हैं और बेटियाँ और बहुएं तो हमारे समाज और परिवार के लिए रीढ़ के हड्डी समान होती हैं..."

“अम्मा! नियम तो बदलने के लिए ही बनते हैं और बेटियाँ और बहुएं तो हमारे समाज और परिवार के लिए रीढ़ के हड्डी समान होती हैं…”

“अरे, नाशपीटी! दूसरी भी बेटी जन्मी तूने… बेटा जन्मती तो हम भी सोने की सीढ़ी चढ़ते। परपोते का मुँह तो दिखा देती ताकि मरने पर सीधा स्वर्ग जाती। लगता है पिछले जन्म में सास-बहू दोनों ने कर्जे खाए थे जो इस जन्म में चुकाने के लिए दोनो को बेटियां हुईं।”

दादी सास ने पोत बहू सोनिया को मुँह बिचकाकर सुनाते हुए छट्ठी के दिन उसकी सास सीता जी और उसे ताना मारते हुए कहा।

दादी सास के मुँह से ऐसी बात सुनते सोनिया की आँखें भर आई। घर पर मौजूद आस-पास की महिलाएं आपस मे खुसर-फुसर करने लगी। दादी की बात सुनकर सीता जी की बेटी ने कहा, “दादी जमाना बदल गया लेकिन आपकी सोच आजतक नहीं बदली। आजकल क्या नहीं कर सकतीं बेटियां जो बेटे कर सकते हैं?”

पोती के मुँह से जवाब सुनकर दादी ने फिर सीता जी को आड़े हाथ लेते हुए कहा, “अरे सितवा! यहीं संस्कार दिए तूने अपनी बेटी को देख तो जरा कैसे कैंची की तरह जबान चला रही है। पूछ इससे… ऐसे ही अपनी सास को भी जवाब देती है क्या? तूने इसको बताया नहीं कि बेटियां हमको मोक्ष नहीं दिला सकतीं। कुल और वंश आगे नहीं बढ़ा सकतीं।”

चुपचाप खड़ी सीता जी सबके बात को सुन रही थीं। उनका मन अतीत की गलियारों में विचरण करने लगा ना चाहते हुए भी आज बहुत सी कड़वी बातें याद आ गयीं कि कैसे उनकी चार बेटियां होने पर घर मे मातम पसरा रहा। चौथी बेटी के समय तो उनको दो दिन बाद खाना दिया गया था। उसके ऊपर से जुल्म और अत्याचार। ताने तब तक खत्म नही हुए जब तक कि उनको बेटा नहीं हो गया।

सीताजी ने पूरी उम्र अपनी सास को कभी जवाब नहीं दिया था। दबंग प्रवृत्ति की उसकी सास को सिर्फ चार बेटे थे। धन वैभव घर में कोई कमी नहीं थी जिस के घमण्ड में सीता जी की सास हमेशा चूर रहती थी।

आज अपनी बहू की आंखों में जब उन्होंने अपने दर्द के समान आंसू देखा तो उन्होंने आगे बढ़कर सोनिया को गले से लगाते हुए कहा, “बहू मुझे इतनी प्यारी सी मेरी पोती देने के लिए शुक्रिया! तुमने तो बुढ़ापे में मुझे मजबूत लाठी दे दी, जिसका सहारा लेकर मेरे कदम और मजबूत हो जाएंगे। तुम किसी की बात पर ध्यान मत देना, लोग तो बहुत कुछ कहते हैं और हम सबके हिसाब से तो अपनी जिंदगी नही जी सकते ना। अपने माँ बनने के सफर को खुशी-खुशी एन्जॉय करो।”

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इतना सुन सोनिया मुस्कुराने लगी। फिर उन्होंने अपनी पोती को गोद मे लेते हुए कहा, “नाउन सुनो, बरही के दिन पूरे मोहल्ले को निमंत्रण देना। उस दिन घर पर मैं अखंड रामायण और खाने-पीने का समारोह रखूंगी। तुम भी सपरिवार आना।”

“अरे बहुरानी! लेकिन लोग क्या कहेंगे अभी पूरे गांव में किसी ने भी बेटी होने पर रामायण नहीं कराया ना हीं कोई बड़ा फंक्शन किया। पूरा गांव बातें बनायेगा। वो भी बात जब दूसरी बेटी के जन्म की हो तो”, नाउन ने कहा।

“अरी नाउन मावा! लोग तो ऐसे भी बातें बनाते ही हैं, ये तो उनका काम ही है। चाहे काम अच्छा करो या बुरा और किसी ना किसी को तो अच्छे काम की शुरुआत करनी ही होगी ना। मैं अपनी बेटियों के जन्म पर तो बड़ा समारोह नहीं कर पायी लेकिन पोती के जन्म पर समारोह करके उस कमी को पूरा कर लेना चाहती हूँ”, सीता जी ने दादी सास को देखते हुए कहा।

गुस्से में दादी सास बोली, “आने दे मेरे बेटे को फिर देखती हूं कि कैसे मनाती है तू समारोह।”

तब तक सीता जी के पति आलोक जी भी वहाँ आ गए। उन्होंने कहा, “सीता तुमने समारोह के बारे में सब तैयारियां कर ली ना देखो कोई कमी ना रह जाये।”

दबी आवाज में सीता जी की सास ने कहा, “बेटा! बेटियों के होने पर कहां समारोह होते हैं? जो तू ये सब अलग नए नियम कर रहा है।”

“अम्मा! नियम तो बदलने के लिए ही बनते हैं। और बेटियाँ और बहुएं तो हमारे समाज और परिवार के लिए रीढ़ के हड्डी समान होती हैं। जिसे बिना पुरूष रूपी शरीर का कोई अस्तित्व ही नहीं। और आपका पोता चाहता है कि उसकी बेटी का ऐसा स्वागत समारोह हो कि सब याद रखें।”

पति की बात सुन सीता जी गर्व से मुस्कुरा ने लगी। तो दादी सास की गुस्से में घूरती निगाहें ये बताने के लिए काफी थी कि अब घर के नियम बदल चुके हैं। ये मौन करारा जवाब था जिससे दादी सास के जुबान पर ताला लगा दिया था।

प्रिय पाठकगण, उम्मीद करती हूं कि मेरी ये रचना आपको पसंद आएगी। कहानी का सार सिर्फ इतना है कि बेटियों के जन्म को लेकर लोगों की सोच में बदलाव तो हुआ है लेकिन अभी भी बहुत जगहों पर ये भेदभाव व्याप्त है। जिसे जड़ से खत्म कर के हीं हम समाज में बदलाव और बेटियों के लिए सुरक्षित माहौल बना सकते हैं।

इमेज सोर्स: Still from Mom, Dadi Aur Period/Girliyapa M.O.M.S via YouTube

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