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बहू तो मेहमान की तरह आती है…

सुधा जी ने कहा, “बहू कहां जा रही हो तुम? सभी की बहुएँ यहां रुकी हुई है और तुम्हें घर जाने की लगी है। अब कल तो बारात ही है, यहीं रुक जाओ।"

सुधा जी ने कहा, “बहू कहां जा रही हो तुम? सभी की बहुएँ यहां रुकी हुई है और तुम्हें घर जाने की लगी है। अब कल तो बारात ही है, यहीं रुक जाओ।”

“बहू, तुम अब आ रही हो। मेरी सारी बहनों की बहूएँ यहां दो दिन से रुकी हुई है और तुम हो कि मेहमानों की तरह आ रही हो। वो सब मिलजुल कर यहां काम करा रही है और एक तुम हो। आखिर अपने आप को समझती क्या हो तुम? तुम्हें अपनी सास की इज्जत का थोड़ा सा भी ख्याल नहीं है?”

सुधा जी अपनी बहू पूर्वी को डांट रही थी। उनके भाई के लड़के की शादी थी, जहां उनका पीहर का पूरा परिवार एकत्रित था। आज पहरावणी का प्रोग्राम था। उनकी बहनों और भाइयों की सभी बहुएं दो दिन से यहां रुकी हुई थी और सारे काम मिलजुलकर कर रही थी, वहीं  सुधा जी की बहू अभी थोड़ी देर पहले ही पहुंची है, जिस कारण से उन्हें बुरा बहुत लगा और वे उसे डांटे जा रही थी। पर उसने कोई जवाब नहीं दिया।

जैसे ही प्रोग्राम खत्म हुआ, पूर्वी ने खाना खाया और अपने पति तन्मय को जाकर कहा, “चलिए देर हो रही है”

इतने में सुधा जी ने कहा, “बहू कहां जा रही हो तुम? सभी की बहुएँ यहां रुकी हुई है और तुम्हें घर जाने की लगी है। अब कल तो बारात ही है, तो यहीं रुक जाओ। सबके साथ रुक कर के शादी एंजॉय क्यों नहीं करती। तुम यहाँ रूकोगी तो सब को अच्छा लगेगा। तुम भी तो देखो तुम्हारे ससुराल में शादियां कैसे होती है।”

“देखिए मम्मी जी, शादी कोई दूर तो हो नहीं रही। पास ही की तो शादी है, तो रुकने की क्या जरूरत? कल फिर आ जाएंगे। चलिए तन्मय जी, देर हो रही है।”

तन्मय और सुधा जी को बुरा तो लगा लेकिन इतने लोगों के बीच बतंगड़ बनाना ठीक नहीं समझा। तन्मय चुपचाप पूर्वी को लेकर वहां से निकल गया। घर आकर तन्मय में पूर्वी से कहा, “अगर रुक जाती तो कुछ बिगड़ नहीं जाता। अपने ही ससुराल की शादी में मेहमानों की तरह जा रही हो। अगर रुक जाती तो माँ को भी अच्छा लगता। लेकिन तुम और तुम्हारा ईगो, कोई नहीं समझ सकता।”

“अरे! क्या गलत किया मैंने? थोड़े दिन पहले आप ही लोगों ने मुझे बताया था कि यदि घर की कोई शादी आपके शहर में ही हो तो किस तरीके से जाया जाता है।”

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“तो इस बात का बदला तुम मेरी माँ से ले रही हो। पूर्वी तुम बहुत बदल गई हो।”

“हाँ, वक्त के साथ सभी को बदल जाना चाहिए इसलिए मैं भी बदल गई।”

यह सुनकर तन्मय चुपचाप दूसरी तरफ मुंह करके सो गया और पूर्वी को अपने भाई की शादी याद आने लगी, “पूर्वी बेटा, तू कब आयी?”

“हाँ चाची जी, अभी आई हूँ।”

“अरे! तू तो बड़ी बहन है। तुझे तो पहले ही आ जाना चाहिए थी और तू मेहमानों की तरह आ रही है।”

“मेरी बेटी तो अपने भाई की शादी में एक महीने पहले ही आ गई थी। सच में उसने बहुत मदद की थी।”

“लोगों को कितना चाव रहता है अपने भाई की शादी में जाने का। तुझे नहीं है क्या, जो आज जब प्रोग्राम शुरू होने वाले हैं तब आई है।”

“देख लड़की वाले भी तुझसे पहले आ गए।”

“शुक्र मना की शादी तेरे ससुरालवाले शहर में है अगर मायके (महाराष्ट्र) में होती तो?”

“तब तो झक मार के रुकना पड़ता।”

ऐसा कहकर सब हंसने लगी। अब पूर्वी क्या बोलती? बस अपनी चाची और ताईयो की बातें सुनने के अलावा कुछ ना कह सकी। कहे भी तो क्या कि ससुराल वालों ने भेजा नहीं।

आज पूर्वी के भाई विनय का लगन आने वाला था और पूर्वी अपने ससुराल वालों के साथ लेट पहुँची। थोड़ी देर में लगन का प्रोग्राम शुरू हो गया और उसके बाद सब लोगों ने भोजन किया और लड़की वाले विदा हुए।

लड़की वालों के विदा होने के बाद तन्मय पूर्वी को बुलाने आया, “जल्दी चलो, लेट निकलना अच्छा नहीं होता।”

“तन्मय जी, मेरे भाई की शादी है। क्या मैं रुक नहीं सकती”

“देखो, इस बारे में घर पर ही बात हो चुकी है। अब मैं बेवजह की बहस नहीं चाहता हूँ। जल्दी करो”

पूर्वी ने मन मसोसकर अपनी माँ से जाने की इजाजत मांगी तो माँ ने कहा, “बेटा तू जा रही है। अब तो शादी तक यहीं पर रुक। क्या मेहमानों की तरह आएगी जाएगी? यहां लोग तरह की बातें बना रहे थे, सुना था ना तूने।” 

“अब मम्मी, मैं क्या बोलूँ? आप तो समझो। मेरी सासू माँ और तन्मय जी का कहना है कि शादी पास की पास ही तो है, तो रुकने की क्या जरूरत है।”

“शादी पास की पास में है लेकिन तेरे अपने परिवार में हैं और बेटी नहीं रुकेगी तो…”, बोलते बोलते मां चुप हो गई।

“ठीक है, कल जल्दी आ जाना”, कहकर माँ ने पूर्वी और उसके ससुराल वालों को विदा किया।

पूरी शादी में पूर्वी एक मेहमान बनकर ही रह गई। हर प्रोग्राम में सुबह दस ग्यारह बजे तक वहां पहुंचती और प्रोग्राम खत्म होने के बाद खा पीकर विदा हो जाती। सिर्फ इसलिए की ससुराल वालों का मानना था कि शादी पास ही में तो है, तो रूकने की क्या जरूरत।

पूर्वी को बुरा बहुत लगता, लेकिन कह भी कुछ नहीं पाई। एक दो बार मम्मी ने पूर्वी की सास को कहा भी तो उन्होने बहाना बना दिया कि ये तो बच्चे ही जाने, मैं क्या बताऊं? पर घर आकर पूर्वी को बहुत सुनाया।

लेकिन भाई की शादी के बाद पूर्वी में इतना बदलाव तो आ ही गया था कि अब वह ससुराल की हर शादी में मेहमान बन कर ही जाती। लोगों को लगता है कि बहू बदल गई पर बदलने के पीछे कारण होते हैं यह कोई ध्यान नहीं देता।

मूल चित्र: Live Hindustan Via Youtube 

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