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आखिर मैं भी कब तक चुप रहती?

चलते-फिरते मुझे ससुर जी, कभी मेरे देवर, तो कभी मेरे पति याद दिला दिया करते थे कि मैं इस घर में उनकी पसंद नहीं हूँ।

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कम से कम ससुराल वाले तुम्हें भूखा तो नहीं मार रहे…

तेरे कारण मेरी दोनों छोटी बेटियों की शादी नहीं हो पाएगी। लोग कहेंगे कि बड़ी बहन तो खुद पीहर आकर बैठी हुई है, पता नहीं छोटी कैसी होगी।

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त्यौहार की खुशियों पर सिर्फ बेटों की माँ का हक़ क्यों?

क्या एक दिन बेटा अपने ससुराल में खाना खा ले, तो वो अपने परिवार से दूर हो जाएगा? क्या त्यौहार सिर्फ आपके घर है, आपकी बहु के मायके में नहीं?

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अरे! कहीं बहू ने नौकरी तो नहीं छोड़ दी?

तुम घर की बहू हो, बेटी नहीं। तुम्हें जिम्मेदारियों का कोई एहसास है कि नहीं? रात के खाने का टाइम हो चुका है और तुम्हारा अता पता ही नहीं।

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मेरे ससुराल की सब रस्में मैगी खा कर पूरी हो गयीं…

बुआ सास ने कहा, "जब सास ही रस्म रिवाज नहीं निभाएगी, तो बहु क्या खाक रीति-रिवाजों को मानेगी? वो तो आज के जमाने की लड़की ठहरी।"

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ज़्यादा हँसने-बोलने की ज़रूरत नहीं है ससुराल में…

इधर चंचल की शादी हो गई। माँ ने पहले ही बोला था कि ज्यादा बोलना नहीं और कोई कुछ बोले तो 'खीखी' मत करने लगना।

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