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मेरे पति मुझे मारते नहीं हैं, वो बस थोड़ा हाथापाई…

उसकी बात सुनकर मैं चौंक पड़ी और मोहिनी जी से पूछ बैठी, “पलक क्या कह रही है दीदी ? क्या डॉक्टर साहब आप पर हाथ उठाते हैं?”

उसकी बात सुनकर मैं चौंक पड़ी और मोहिनी जी से पूछ बैठी, “पलक क्या कह रही है दीदी? क्या डॉक्टर साहब आप पर हाथ उठाते हैं?”

अब तक मन मोहिनी (भाग – 1) में आपने पढ़ा –

“मेरे मन को अनेक प्रश्न बार बार मथते रहे की एक मनोचिकित्सक जिसके पास सभी की मानसिक ग्रंथियों का इलाज है। जो सभी के मन की गिरहें खोलता है, वो अपनी ही पत्नी के प्रति इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है? उसे अपनी पत्नी का मानसिक संताप क्यों नहीं दिखता?

एक औरत, जिसे मालूम है कि दवाएँ देकर उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ने का प्रयास हो रहा है, वह घर छोड़ने को तैयार नहीं?

मुझे लगता है प्रश्न भले ही अनेक हों, परन्तु उत्तर सिर्फ़ एक है,  माँ होने की इतनी बड़ी क़ीमत शायद एक औरत ही चुका सकती है, कोई और नहीं।”

और अब आगे –

अब अक्सर मेरी और मोहिनी जी की मुलाक़ातें होने लगीं। वे मेरे घर आ जाया करतीं और फिर हम ढेरों बातें करते। मुझे कभी कभी स्वयं पर आश्चर्य होता कि कहाँ मैं पढ़ी लिखी विज्ञान विषयों की ज्ञाता और कहाँ मोहिनी जी महज़ आठवीं पास, फिर भी हम घंटों बातें करते।

जिन आंटी टाइप चर्चाओं से मैं दूर भागती थी, वही बातें मैं मोहिनी जी से करने लगी थी। इसका कारण शायद यह था कि मुझे मोहिनी जी से गहरी सहानुभूति थी और मैं यह सब शायद उन्हें थोड़ी सी ख़ुशी देने के लिए कर रही थी।

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मोहिनी जी जब शाम को आतीं तो अक्सर उनके साथ उनकी बिटिया पलक भी होती। अब पलक से भी मेरी दोस्ती हो चली थी। मैं उसके लिए टॉफ़ी व चॉक्लेट्स लाकर रखती और उसके आने पर उसके नन्हे हाथों में रख देती।

एक दिन जब मैंने पलक के हाथों पर चॉकलेट रखी तो वह मुस्कुरा कर अपनी आँखें गोल-गोल घुमाते हुए बोली, “थैंक यू आंटी!”

तभी तुरन्त मोहिनी जी बोल पड़ीं, “पलक, इनको आंटी नहीं मौसी कहा करो।” फिर मेरी ओर मुख़ातिब होते हुए बोलीं, “तुमको ख़राब तो नहीं लगा न कि हम तुमको अपना बहन बना लीं? सच्ची कहें, हम तो इकलौती रहीं, तो हमको बचपन से भाई बहन का प्यार मिला ही नहीं। गाँव की ज़मीन जायदाद के चक्कर में हमारे पिताजी का किसी भी रिश्तेदार से बहुत अच्छा सम्बन्ध नहीं रहा, इसी कारण चचेरे फुफेरे भाई बहनों के साथ भी कभी हम नहीं रहीं। पर हम सोचती हैं कि अगर हमारी कोई बहन होती तो शायद तुम्हरी जैसी ही होती। इसीलिए हम पलक को बोलीं कि वो तुमको मौसी कहा करे।”

“अरे मुझे बुरा क्यों लगेगा भला? यह तो अच्छा हुआ कि मुझे यहाँ आप जैसी एक बड़ी बहन मिल गई। अब मैं भी आपको दीदी ही कहूँगी।”

कहते कहते मैं भी भावुक हो गई और न चाहते हुए भी मेरी आँखों के कोरों से दो बूँद आँसू ढलक पड़े।

“अरे तुम रो रही हो? पगली!” कहते हुए उन्होंने मेरे गालों पर हल्की सी चपत लगाई और अपने आँचल से मेरे आँसू पोंछ दिये।

तभी मेरे मन में न जाने क्या आया कि मैं उनसे कसकर लिपट गई। उनके बालों में लगे चमेली के तेल की ख़ुशबू सीधे मेरे नथुनों में भरने लगी। वह न झेली जाने वाली दुर्गन्ध कैसे सुगन्ध में परिवर्तित हो गई? मैं ख़ुद भी समझ न पाई।

फिर मैंने अपने पढ़े हुए विज्ञान विषय का लॉजिक लगाया। हमारा मस्तिष्क वही सूचनाएँ ग्रहण करता है जो हम उसे देना चाहते हैं। तो शायद इस समय मेरे मस्तिष्क को चमेली के तेल की दुर्गन्ध नहीं मिल रही थी अपितु मेरे और मोहिनी जी के निर्मल प्रेम से सराबोर उस तेल की सुगंध मिल रही थी ।

पलक वहीं खड़ी टुकुर टुकुर हमें देखती रही। फिर मेरा कुर्ता खींचते हुए बोली, “मौसी, तुम क्यों रो रही हो? क्या तुम्हारे पापा भी तुमको मारते हैं?”

उसकी बात सुनकर मैं चौंक पड़ी और मोहिनी जी से पूछ बैठी, “पलक क्या कह रही है दीदी ? क्या डॉक्टर साहब आप पर हाथ उठाते हैं?”

“अरे नहीं रे! वो जब हम दवा खाने से मना करती हैं न, तो वो ज़बरदस्ती दवा खिलाने के लिए थोड़ा बहुत हाथा-पाई करते हैं। चल पलक, अब हम घर चलेंगे।”

मोहिनी दीदी की आवाज़ में दर्द उभर आया।

“अभी रुको न मम्मी, मौसी के पापा भी अभी ऑफ़िस से नहीं आये हैं।”

पलक ठुनकते हुए बोली। उसकी मासूमियत भरी बात सुनकर मैं और दीदी दोनों ही ज़ोर से हँस पड़े।

दीदी हँसते हुए बोलीं, “दरअसल पलक को लगता है घर में रहने वाला पुरुष ‘पापा’ होता है, इसीलिए वह तुम्हरे पति को तुम्हरा ‘पापा’ कह रही है।”

फिर पलक को प्यार से समझाते हुए बोलीं, “वो मौसी के पति हैं बेटा। जैसे पापा हमरे पति हैं, तुम उनको भी मौसाजी ही कहा करो…अच्छा अब घर चलो और होमवर्क करो, नहीं तो पापा डाँटेंगे।”

दीदी और पलक के जाने के बाद मैं बहुत देर तक भावनाओं के सागर में गोते लगाती रही।

पतिदेव के ऑफ़िस से लौटने पर जब मैंने उन्हें सारी बातें बताईं तो वे भी ज़ोर से हँस पड़े और मज़ाक़िया अंदाज़ में बोले, “अरे मैडम, दूसरों से चाहे जो भी नये रिश्ते बनाओ। पर मुझे तो भरी जवानी में सन्यासी न बनाओ।”

अब दीदी और पलक के साथ मेरा दिल का रिश्ता बन चला था। पलक कई बार अकेली ही मेरे पास आ जाया करती, फिर हम कभी लूडो खेलते कभी साँप-सीढ़ी।

अब आस पड़ोस में भी मेरी और मोहिनी दीदी की दोस्ती के चर्चे होने लगे थे। सभी के मन में एक ही सवाल था कि आख़िर पढ़ी लिखी स्मार्ट मीता और अनपढ़ गँवार मोहिनी के बीच दोस्ती कैसे पनप रही है?

कहानी के सब भाग पढ़ें यहां –

मन मोहिनी का भाग 1 पढ़ें यहां

मन मोहिनी  का भाग 2 पढ़ें यहां 

मन मोहिनी  का भाग 3 पढ़ें यहां 

मन मोहिनी  का भाग 4 पढ़ें यहां 

मन मोहिनी  का भाग 5पढ़ें यहां 

मन मोहिनी  का भाग 6 पढ़ें यहां 

 मूल चित्र : Waghbakri via YouTube(only for representational purpose)

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