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लेकिन दीदी के पति के खिलाफ शिकायत किसने की?

मीता, तुम हमको हँसना बोलना, उठना बैठना, सब तौर तरीक़ा सिखा दो, तो सायद (शायद) डागदर साहब को हम थोड़ा सा खुस कर सकें।

मीता, तुम हमको हँसना बोलना, उठना बैठना, सब तौर तरीक़ा सिखा दो, तो सायद (शायद) डागदर साहब को हम थोड़ा सा खुस कर सकें।

अब तक मन मोहिनी (भाग – 3) में आपने पढ़ा –

मैंने उसे समझाते हुए कहा और फिर उसकी तरफ़ अपना प्रश्न उछाला, “ये बताओ पराग कि तुम्हें किसने बताया कि तुम्हारी मम्मी पागल हैं?”

“पापा ने, और किसने? पापा तो मम्मी को हमेशा दवा देते हैं कि मम्मी जल्दी से अच्छी हो जाएँ, पर मम्मी? वही, पागल की पागल।”

पराग की बातों में अब झिझक ख़त्म हो चली थी और वह खुलकर मुझसे बात कर रहा था।

“फिर तो मम्मी को दवाओं से फ़ायदा होना चाहिए था। इसका तो अर्थ यह है कि या तो मम्मी को दवाएँ असर नहीं कर रहीं या फिर ग़लत दवाएँ दी जा रही हैं?”

और अब आगे – 

उसी दिन शाम होते होते मोहिनी दीदी मेरे घर आयीं और बोलीं, “तुम पराग को भी पढ़ाती हो क्या? आज पराग ने बताया।”

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“जी, मैं कक्षा ग्यारह व बारह को पढ़ाती हूँ दीदी”, मैंने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया।

“हाँ…आज हम बहुत खुस (ख़ुश) हैं…आज पराग ने पूरे दो साल बाद हमसे बात की। कह रहा था कि मौसी बहुत अच्छी हैं। ई बताओ, वो तुमको कब से मौसी कहने लगा? तुम हमरी अच्छी वाली बहन नहीं हो। हमसे बात छुपाती हो।”

दीदी की आवाज़ ख़ुशी से खनक रही थी।

“अब जैसी भी हूँ, आपकी ही बहन हूँ दीदी।”

ये कहकर मैं उनके गले लग गई और मन ही मन सोचने लगी, “मोहिनी दीदी को कैसे बताऊँ कि आज विद्यालय में क्या हुआ। पराग के इरादे कितने ख़तरनाक थे। जब वह एसिड भर रहा था,यदि उस समय मेरी नज़र उसपर न पड़ी होती तो? फिर अभी दीदी न जाने किस हाल में होतीं?”

मन में यह विचार आते ही मेरी बाँहों का घेरा मोहिनी दीदी के इर्द गिर्द और कस गया और मैं सुबक पड़ी ।

“क्या हुआ पगली? आज हम इतनी खुस हैं और तुम रो रही हो? चलो, आज हम तुम्हें बढ़िया सी अदरक वाली चाय पिलाती हैं। तू भी क्या याद करेगी। चाय का स्वाद तुम्हरी ज़ुबान पर न चढ़ जाए तो कहना…”

मोहिनी दीदी ने मुझे प्यार से अलग करते हुए कहा और मेरी रसोई की ओर बढ़ चलीं।

“दीदी, मेरी चाय में चीनी नहीं पड़ेगी।”

मैंने उन्हें चेताया तो वे हँसते हुए बोलीं, “हाँ…हाँ…पता है तुम सहर (शहर) वाले लोग चीनी नहीं पीते हो। डागदर साहब भी बिना चीनी की ही चाय पीते हैं और एक हम हैं, जब तक तीन चार चम्मच चीनी न डालें, चाय हलक से नीचे ही नहीं उतरता। आख़िर हम हैं तो जाहिल गँवार ही।”

“अब ये चीनी वाली चाय का जाहिल गँवार होने से क्या सम्बन्ध? ये तो अपने अपने स्वाद की बात है। अब आप अपने को जाहिल गँवार कहना बंद कीजिए। आप बहुत प्यारी हैं। भोली हैं, छल कपट से दूर सीधी सच्ची इंसान हैं, बस ये याद रखिए और हाँ, चाय हलक से नीचे नहीं उतरती कहिए क्योंकि चाय स्त्रीलिंग शब्द है।”

मैंने उनको प्यार भरी झिड़की लगाई और हम फिर दोनों ही हँस पड़े।

“मीता, तुम हमको हँसना बोलना, उठना बैठना, सब तौर तरीक़ा सिखा दो, तो सायद (शायद) डागदर साहब को हम थोड़ा सा खुस कर सकें।”

कहते कहते अचानक उनकी आवाज़ मुझे कहीं किसी गहरी गुफ़ा से आती हुई सी लगी, जैसे ज़माने भर का दर्द सिमट आया हो उनकी आवाज़ में। वो चाय बनाने के लिए रसोई में चली गईं और मैं सोचती रही…

“कितनी सहनशीलता है दीदी के व्यक्तित्व में। वे जानती हैं कि डॉक्टर साहब उन्हें ग़लत दवाएँ देकर उनका मानसिक संतुलन बिगाड़ना चाहते हैं। सारी दुनिया के समक्ष उन्हें पागल साबित करना चाहते हैं, फिर भी, वे उन्हीं डॉक्टर साहब को ख़ुश रखना चाहती हैं। उनके दो प्यार भरे शब्दों के लिए तरसती हैं।”

अब विद्यालय में पराग का मेरे प्रति व्यवहार पूरी तरह बदल चुका था। मैं जैसे ही कक्षा में पहुँचती, वह सबसे पहले खड़ा होकर ‘गुड मॉर्निंग मिस’ कहता। विद्यालय के ऑफ़िस से चॉक डस्टर लाना हो या प्रयोगशाला में प्रैक्टिकल फाइल्स पहुँचानी हों, पराग सदैव तत्पर रहता।

अब कभी कभी शाम को वह मेरे घर भी आ जाया करता। कभी किताबें या नोट्स लेने या देने या कभी अपनी पढ़ाई से सम्बन्धित अपने संशय दूर करने के लिए।

एक शाम वह मेरे घर आया और बोला, “जानती हैं मौसी। अब मुझे मम्मी अच्छी लगने लगीं हैं। शी इज़ नॉट मैड (वो पागल नहीं हैं ) इसलिए अब मैं पापा द्वारा दी गई दवाइयाँ मम्मी को नहीं खिलाता।”

“यह तो तुम बहुत अच्छा करते हो पराग। पर कभी कभी डॉक्टर साहब तो दीदी को ज़बरदस्ती दवाएँ खिला ही देते होंगे।”

पराग से यह प्रश्न पूछते हुए मुझे पलक की वह बात याद आ गई,जब उसने कहा था कि “पापा मम्मी को मारते हैं!” और दीदी ने सफ़ाई देते हुए कहा था कि “जब हम दवा नहीं खातीं तो डागदर साहब हाथापाई करते हैं…”

“नहीं मौसी, मैंने पापा को विश्वास में लेकर मम्मी को दवाएँ खिलाने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है, इसलिए अब मम्मी, पापा के हाथों मार खाने से बच जाती हैं। कम से कम इतनी तो राहत मिली है उन्हें।”

पराग ने थोड़ा गम्भीर होते हुए कहा।

“पर तुम उन दवाओं का करते क्या हो? डॉक्टर साहब को शक नहीं हुआ?”

मेरे मन में शंका ने सिर उठाया।

“अरे वो तो मैं टॉयलेट में फेंक कर फ़्लश चला देता हूँ।”

पराग की आँखों में शरारत चमक उठी, जब उसने मुस्कुराते हुए यह कहा।

फिर अचानक ही वह थोड़ा सा उदास होते हुए बोला, “मौसी, मुझे बहुत मेहनत करनी है। बहुत पढ़ना है। आई आई टी क्लीयर करना है, पढ़-लिख कर बड़ा इंजीनियर बनना है। मौसाजी की तरह। मम्मी के लिए कुछ करना है। जब सोचता हूँ कि मैंने मम्मी को कितनी बड़ी तकलीफ़ दी है, देन आई फ़ील रियली बैड, आई फ़ील अशेम्ड ऑफ़ माईसेल्फ़ ( तो मुझे बहुत बुरा लगता है…मुझे स्वयं पर शर्म आती है)”

“शर्म की कोई बात नहीं पराग। इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं, तुम्हारी आँखों पर डॉक्टर साहब और अन्य लोगों की बातों का पर्दा पड़ा हुआ था। तुम वही देख रहे थे, वही समझ रहे थे जैसा दूसरे लोग तुम्हें समझा रहे थे। चलो, यह अच्छा हुआ कि तुम्हारी आँखें खुल गईं। वैसे भी पराग, किसी दूसरे की बातों में आकर किसी के भी प्रति अपनी राय बनाना उचित नहीं।”

अपने पतिदेव द्वारा कही गई पंक्ति पराग से कहकर मैं मन ही मन मुस्कुराई और बोली, “पर ये बताओ पराग कि तुम अपने मौसा जी जैसे इंजीनियर क्यों बनना चाहते हो? अपने पापा जैसे डॉक्टर क्यों नहीं?”

“क्योंकि मुझे मौसाजी पसंद हैं, वो जिस तरह आपका ख़याल रखते हैं, आपको घर से बाहर काम करने देते हैं। मुझे अच्छा लगता है, मुझे पापा जैसा तो बिलकुल भी नहीं बनना, जो मेरी सीधी सादी मम्मी को ग़लत दवाएँ देते हैं, घर पर सभी के ऊपर हुक्म चलाते हैं। यहाँ तक कि छोटी सी पलक पर भी।”

अब दीदी का परिवार मुझे अपना परिवार लगने लगा था, सिवाय एक व्यक्ति के, वो थे डॉक्टर साहब। कई महीने बीत जाने पर भी, मैं एक बार भी दीदी के घर नहीं गई थी। दीदी और बच्चे ही मेरे घर अक्सर आ जाया करते थे।

अब धीरे धीरे सारे मोहल्ले में यह चर्चा आम हो चली थी कि मोहिनी दीदी पागल नहीं हैं अपितु डॉक्टर साहब ही उन्हें पागल साबित करना चाहते हैं। आस पड़ोस की औरतों के मन में बैठे मोहिनी दीदी के प्रति डर का स्थान सहानुभूति ने लिया था।

इसी बीच किसी ने डॉक्टर साहब के ख़िलाफ़ लिखित शिकायत अस्पताल में कर दी। शिकायतकर्ता ने अपना नाम गुप्त रखा था, परन्तु सारे मोहल्ले में यह बात फैल गई थी हो न हो यह काम ‘मीता’ यानी कि मेरा है। परन्तु मैं तो ख़ुद ही हैरान थी कि लिखित शिकायत किसने की?

जब बातों बातों में मैंने पतिदेव को अपने मन की शंका से अवगत कराया तो एक रहस्यमय मुस्कान उनके होंठों पर थिरक उठी।

मैंने आश्चर्य से पूछा, “क्या आपने? आपने यह शिकायत अस्पताल में की है?”

वे उसी तरह मुस्कुराते हुए बोले, “जब तुम मोहिनी दीदी और उनके बच्चों के लिए इतना कुछ कर सकती हो…तो क्या मैं इतना भी नहीं कर सकता? दीदी के लिए सम्मान की तुम्हारी बड़ी सी लड़ाई में यह मेरा तुच्छ सा योगदान है।”

“पराग सच कहता है, आप…सच्ची…सच्ची बहुत अच्छे हैं!”

कह कर मैं उनके गले लग गई।

नोट : ये मन-मोहिनी (भाग-4) है

मन मोहिनी का भाग 1 पढ़ें यहां

मन मोहिनी  का भाग 2 पढ़ें यहां 

मन मोहिनी  का भाग 3 पढ़ें यहां 

मन मोहिनी  का भाग 4 पढ़ें यहां 

मन मोहिनी  का भाग 5पढ़ें यहां 

मन मोहिनी  का भाग 6 पढ़ें यहां 

मूल चित्र : Waghbakri via YouTube(only for representational purpose)

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