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भाभी, आप रात को ऑनलाइन क्या कर रहीं थीं?

मैं सोचने लगी कि अब तक तो मुझ पर निगरानी रखी जाती थी अब आज ये बात भी पता चली कि ऑनलाइन  निगरानी भी मेरी रखी जाती है।

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जो मेरे साथ हुआ, क्या वो हर घर में होता है?

मेरे ससुराल वाले मेरी तारीफ किया करते, जिससे मेरी जेठानी को बहुत प्रॉब्लम होती और वो रोज नए तरीके ढूंढतीं मुझे नीचा दिखाने के।

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दीदी, आज से मेरी बेटी भी घी वाली रोटी खायेगी!

“अगर जिंदगी मुझे दोबारा मौका दे रही है तो मैं क्यों घर में बैठूँ। मेरी बच्ची को भी घी वाली रोटी खाने का हक है और उसके लिए ऐसी रोटी मैं कमाऊंगी।”

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आखिर मैं भी कब तक चुप रहती?

चलते-फिरते मुझे ससुर जी, कभी मेरे देवर, तो कभी मेरे पति याद दिला दिया करते थे कि मैं इस घर में उनकी पसंद नहीं हूँ।

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कम से कम ससुराल वाले तुम्हें भूखा तो नहीं मार रहे…

तेरे कारण मेरी दोनों छोटी बेटियों की शादी नहीं हो पाएगी। लोग कहेंगे कि बड़ी बहन तो खुद पीहर आकर बैठी हुई है, पता नहीं छोटी कैसी होगी।

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त्यौहार की खुशियों पर सिर्फ बेटों की माँ का हक़ क्यों?

क्या एक दिन बेटा अपने ससुराल में खाना खा ले, तो वो अपने परिवार से दूर हो जाएगा? क्या त्यौहार सिर्फ आपके घर है, आपकी बहु के मायके में नहीं?

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