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क्या सुहागरात से जुड़े ऐसे रिवाजों का कोई अस्तित्व होना चाहिए?

Posted: अगस्त 17, 2020

सुहागरात  में रजनीगंधा और गुलाब से सजी सेज पर घुंघट निकाले मैं अपने पिया का इंतजार कर रही थी। मुझे ऐसा लगा कि कोई मुझे सुन रहा है।

मुझे ऐसा लगा कि कोई मुझे सुन रहा है। नहीं-नहीं ये मेरा वहम होगा। ऐसा कैसे हो सकता है? यहां छत पर तो सिर्फ मेरा कमरा हैं। फिर ये आहट कैसी है?

सुहागरात  में रजनीगंधा और गुलाब से सजी सेज पर घुंघट निकाले मैं अपने पिया का इंतजार कर रही थी। पिया जी ने शादी से पहले तीसरी मंजिल में ये कमरा हमारे लिए बनवाया था। सुबह से जेठानी जी छेड़ रहीं थीं, ‘देखो नई दुल्हन, देवर जी को प्राइवेसी चाहिए। मेरे कमरे के पास वाला कमरा देवर जी का था पर उसे गेस्ट रूम बनाकर तुम्हारे लिए छत में कमरा बना दिया।’

‘हां भई हमने कितना मना किया था लेकिन भाई ने किसी की नहीं सुनी। छत में कितनी गर्मी लगेगी। जब ये सुंदर गोरा रंग काला पड़ जाएगा तब तुम्हारे मियां जी को अक्ल आएगी। तब देखना सरपट नीचे वाले कमरे में शिफ्ट होंगे’, ननद ने कहा।

जितने मुंह उतनी बातें। मुझे पता चल चुका था कि इस कमरे को बनाने के कारण घर पर  कोई खुश नहीं है। पर मैं क्या कर सकती थी। शादी से पहले आशीष ने मुझे बताया था कि उनके कमरे के एक तरफ बड़े भइया का कमरा है और एक तरफ मम्मी-पापा का, वॉशरूम मम्मी-पापा के कमरे से अटैच था।

उनकी बात और थी वो घर के बेटे हैं, वो मम्मी-पापा के साथ वॉशरूम शेयर कर सकते थे, पर मैं कैसे करती? इसलिए उन्होंने तीसरे मंजिल पर एक बेडरूम अटैच बाथरूम बनवा दिया था।

दरवाजे में आहट हुई और आशीष मेरे सामने थे। हमारी अरेंज मैरिज थी। इन तीन महीनों में हम एक-दूसरे को अच्छे से जान नहीं पाए थे। हमने तय किया था कि हम पहले एक दूसरे के अच्छे दोस्त बनेंगे, फिर पति-पत्नी का रिश्ता शुरू होगा।

हम बातें कर रहे थे पर रजनीगंधा और गुलाब की मदहोश सुगंध हमें भी अपनी आगोश में ले रही थी। न जाने कब नए नए बने दोस्त प्यार की खुमारी में डूबने  लगे। प्रेमालाप अभी शुरू हुआ ही था कि मुझे फिर लगा कोई हमारी बातें सुन रहा है।

मैंने आशीष के कानों में धीरे से कहा, “सुनो बाहर कोई है।”

आशीष ने हंसते हुए कहा, “जनवरी की ठंड में रात के तीन बजे छत पर कौन आएगा। कोई नहीं है।”

पर मेरा मन मानने को तैयार हो रहा था। मैंने स्पष्ट आहट सुनी थी। मैंने आशीष को इशारा किया कि आप चुप रहो और सोने का नाटक करो। थोड़ी देर बाद आहट आनी बंद हो गई। आशीष और मैं बाहर गए तो देखा खिड़की का शीशा हल्का खुला था। मुझे पक्का यकीन हो गया कि कोई तो था।

अगली सुबह मैं जैसे ही नीचे आयी ननद, जेठानी सब मुस्करा रहें थे। मैं समझ गई कि रात को कौन था। अब उन लोगों ने हमारी बातों को खट्टी-मीठी चटनी डालकर रिश्तेदारों को बताना शुरू किया। मैं शर्म और गुस्से से तिलमिला रही थी।

जब अति हो गई तो मैंने कहा ही दिया दीदी, “क्या आपके पति आपको प्यार नहीं करते?”

“अरे ऐसा क्यों कह रही हो?” उन्होंने कहा।

“फिर आपके अपने सुहागरात में क्या कमी रह गई थी कि आपको कमरे में चुपके से देखना पड़ा कि हम क्या करते हैं।”

“अरे तुम तो गुस्सा हो गई। ये तो रिवाज है”, चाची जी ने कहा।

“पति के साथ के समय को अंतरंग पल कहा गया है इसका मतलब तो सब जानते ही होंगे। क्या सिर्फ पोर्न फिल्म देखना ही बुरी बात है, क्राइम है? फिर शादीशुदा दंपति के निजी पलों को देखना रिवाज कैसे बन गया।”

अब सारी औरतें चुप थी मेरी बातों का किसी के पास जवाब नहीं था। शायद अब से इस घर की औरतें किसी की शादी में इस बेशर्मी वाले रिवाज को न मनाएं।

मूल चित्र : Canva Pro 

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