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बेटी से अपनी बहु की बुराई नहीं करते माँ…

धीरे धीरे माँ की बातों ने मोहनी की खूबसूरती की जगह उसकी बुराइयों ने लेना शुरू कर दिया। रूचि कुछ ज़वाब नहीं देती सिर्फ हाँ हूं कर फ़ोन रख देती।

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धीरे धीरे माँ की बातों ने मोहनी की खूबसूरती की जगह उसकी बुराइयों ने लेना शुरू कर दिया। रूचि कुछ ज़वाब नहीं देती सिर्फ हाँ हूं कर फ़ोन रख देती।

बचपन से अपनी माँ रमा को अपनी दादी से दुर्व्यवहार करते देख रूचि बड़ी हुई थी। दादी से कुछ विशेष स्नेह था रूचि को।

रूचि की माँ तो सिर्फ अपने इकलौते बेटे के मोह में फंसी रहती। सारी शाबाशी, दुलार बेटे रवि को और डांट सिर्फ रूचि के हिस्से आता। दादी से ही सब दुलार प्यार मिलता रूचि को। सारा दिन दादी से ही चिपकी रहती माँ से तो सिर्फ जन्म देने भर का ही नाता था।

समय ने करवट ली और दादी गुज़र गई। अब रूचि की भी शादी हो गई। दादी थी नहीं और माँ से इतना लगाव था नहीं तो रूचि मायके कम ही जाती। जब रवि की शादी का बताया पापा ने तो रूचि बहुत ख़ुश हुई इकलौता भाई जो था।

रूचि की माँ ने खूब ढूंढ कर मोहनी को चुना था रवि के लिये। जैसा नाम वैसा रूप। बिल्कुल अप्सरा सी सुन्दर एक एक अंग सांचे में ढाला हुआ।

अच्छे से शादी हुई। रमा जी अपने बहु की ख़ुशी में बेटी को भूल गई। रूचि तो सब समझती ही थी तो जल्दी ही वापस आ गई अपने ससुराल।

कुछ महीने अच्छे से बीते। बीच बीच में बात भी होती रहती रूचि की अपने घर। माँ के बात का विषय सिर्फ उनकी बहु होती और उसकी खूबसूरती का गुणगान।

धीरे धीरे माँ की बातों ने मोहनी की खूबसूरती की जगह उसकी बुराइयों ने लेना शुरू कर दिया। रमा जी जैसी तेज़ स्वभाव की महिला के मुँह से ये सब सुनना रूचि के लिये कुछ नया नहीं था लेकिन माँ के मुँह से मोहनी के विषय में सुनना जिसकी तारीफें करते वो थकती नहीं थी, इस पर रूचि थोड़ा आश्चर्य होता।

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“देर से उठती है जो जी में आये वो पहनती है। बड़े बुजुर्ग का कोई लिहाज नहीं। रसोई से में सिर्फ खाना लेने तक का ही मतलब रखती है”, और भी ना जाने क्या क्या। रूचि कुछ ज़वाब नहीं देती सिर्फ हाँ हूं कर फ़ोन रख देती।

“अब तो हर दूसरे दिन माँ फ़ोन कर मोहनी की बुराइयाँ करती। मेरे बेटे की सैलरी मुझे नहीं देती और एक एक खर्च का हिसाब मांगती है। अब तो उसके मायके वाले भी जब जी चाहे मुँह उठाये चले आते है। रवि भी बदल गया।” रोज़ रोज़ वही बातें सुन सुन रूचि परेशान हो जाती। अगले दिन माँ ने कॉल कर फिर वही सब शुरू कर दिया।

“माँ! इसमें नया क्या है? जो जो बात आप मुझे मोहनी के विषय में बता रही हो, वो सब तो आप सालों पहले से ही दादी के साथ करते आये हो। उनके बेटे को अलग किया, घर में दादी की हैसियत मालकिन से नौकरानी का कर दिया।

सिर्फ एक ही अंतर है आप दोनों में। दादी ने सब कुछ बर्दाश्त कर लिया लेकिन कभी भी अपनी बेटियों से अपनी बहु की बुराई नहीं, जो कि आप कर रहे हो अपनी बेटी से अपनी बहु की बुराई। इस मामले मैं आपकी क्या मदद करूं? आप सास हैं और वो आपकी बहु। अब वो मोहनी का घर है जो जी चाहेगा उसका वो वहाँ करेंगी।”

रूचि की बात सुन रमा जी को जैसे सांप सूंघ गया।

आज रमा जी को रूचि ने आईना दिखा दिया था। अतीत की एक एक बात रमा जी के सामने थी।बरसों पहले अपनी सास के साथ किया गया उनका गलत व्यवहार ही आज वर्तमान बन उनके सामने आ खड़ा हुआ था। आज अपनी एक एक गलतियों का आभास हो रहा था लेकिन अब हो भी क्या सकता था।

जो बोया था उसे तो अब काटना ही था। अगले दिन से रमा जी का फ़ोन आना रूचि को बंद हो गया।

मूल चित्र : rvimages from Getty Images Signature, Canva Pro

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