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मुझे दूसरे का घर ज़्यादा प्यारा लगने लगा था…

मीना भी शादीशुदा थी और जब देखो अपने पति के प्यार के तराने गाती रहती थी। छवि को अक्सर जलन भी होती थी पर मन मसोस कर रह जाती थी।

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वैसे हमारी कोई मांग नहीं है, बस लड़की हमें ऐसी चाहिए …

हमारा रिश्तेदारी का खून उबाल लेने लगा, “बेटा हमें तो साधारण लड़की चाहिए। कोई मांग नहीं हैं, ना हूर की परी चाहिए। बस पढ़ी-लिखी होनी चाहिए।”

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क्या पत्नी या माँ होने का मतलब ये है कि मैं अपना ध्यान न रखूं?

"अपने आप को फ़िट रखने के लिए शादीशुदा या कुँवारी होने से क्या मतलब है? मुझे किसी को दिखाने के लिए नहीं स्वयं को स्वस्थ रखने फ़िट रहना है।"

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जब अख़बार में आया शादी का विज्ञापन कुछ हट कर हो…

हर शादी का विज्ञापन लंबी, पतली सुंदर दुल्हन मांगता है, लेकिन अगर लड़की अपनी ऐसी माँगे रखे तो तो प्रश्न आता है एक महिला ऐसा कैसे कर सकती है?

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हमारी रानी बेटी हमारी मर्ज़ी से ही शादी करेगी…

पापा ने बड़ी तेज़ी से लड़के ढूँढने शूरु कर दिये। रिशतेदारों और समाज में ख़बर फ़ैला दी गई थी कि बेटी के लिए एक सुयोग्य वर ढूँढा जाए।

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‘समाज क्या कहेगा’ की सोच पर हथौड़ा मारती है फिल्म शादीस्थान

फिल्म शादीस्थान का ये डायलाग बहुत कुछ कहता है, "हम जैसी औरतें लड़ाई करती हैं ताकि आप जैसी औरतों को अपनी दुनिया में लड़ाई न करनी पड़े।"

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