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दहेज़ का लालच कहीं बेटी की खुशियों पर भारी न पड़ जाए…

"वाह माँ वाह, ये सिला दिया आपने उस मासूम के विश्वास का? अभी तो हमने अपना जीवन शुरू भी नहीं किया था और आपने सब बर्बाद कर दिया।"

रमेश जी के घर की रौनक देखते बन रही थी।पूरे घर को दुल्हन की तरह सजाया गया था और क्यूँ ना हो? अवसर ही ऐसा था, आज नैना की शादी जो थी समीर के साथ। रमेश जी और उनकी पत्नी सुधा जी की एकलौती बेटी नैना उनकी आँखों का तारा। एक राजकुमारी की तरह नैना को रमेश जी और सुधा जी ने पाला था। कॉलेज में समीर से नैना की मुलाक़ात हुई थी जो जल्दी ही प्यार में बदल गई। 

समीर, एक साधारण परिवार से आता था चार बहनो का एकलौता भाई, समीर के पिताजी एक बैंक में केशियर थे। कमाई ठीक थी पर बड़े परिवार की जिम्मेदारी के बाद कुछ बचता नहीं था। किसी तरह लोन ले के एक बेटी की शादी की थी और तीन घर बैठी थी।

समीर अपने स्कॉलरशिप के दम पे अपने कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था।जब नैना ने घर पे समीर के बारे में सब बताया तो रमेश जी सोच में पड़ गये, इतने नाज़ो से पली इतने ऐशोआराम की जिंदगी जीने वाली नैना क्या समीर के साथ ख़ुश रह पायेगी?

“किस सोच में डूबे हैं?” सुधा जी ने अपने पति से पूछा।

“अब क्या बताऊँ? नैना कैसे एडजस्ट करेंगी उस घर में?” रमेश जी ने अपनी चिंता बताई।

“आप क्यूँ चिंता करते हैं? समीर एक सुलझा हुआ लड़का है। पढ़ने में होशियार है, देखना बहुत जल्दी उसकी नौकरी लग जाएगी, और हम भी तो है हम भी कुछ मदद कर देंगे।”

पत्नी की बात सुन रमेश जी को थोड़ी तसल्ली हुई और उन्होंने अपनी सहमति दे दी। वहां समीर के घर किसी को यकीन नहीं हो रहा था की इतने बड़े घर से रिश्ता आया हैं। समीर की माँ वंदना जी थोड़ी लालची महिला थी। उनको समझते देर ना लगी की ये शादी उनके सभी दुख दूर कर देगी।

देखते ही देखते शादी का दिन आ गया, समीर के परिवार के मांगने से पहले ही नैना के पापा ने उनका घर भर दिया। घर के बाहर कार, नये फर्नीचर, बर्तन, पूरे परिवार के कपड़े, गहने। वंदनाजी के उम्मीद से बढ़ कर दिया था रमेश जी ने। वंदनाजी और उनकी बेटियों की तो आँखे चौंधियां गईं ये वैभव देखकर।

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समीर के पिताजी समझदार इंसान थे उन्होंने अपनी पत्नी और बेटियों को समझाया, “देखो बहुत बड़े घर की बेटी हैं नैना और घर भर के सामान भी लायी हैं। अब तुम लोगो का भी फर्ज़ हैं की उसको बेटी बना के रखें।”

उनकी बातों को कुछ सुन कुछ अनसुना कर वे सब चल दी। नैना बहुत ही सीधी लड़की थी। जो प्यार से बोलता उसकी हो जाती।

शादी के अगले दिन मुँह दिखाई की रस्म थी, नैना ने बनारसी पीली साड़ी और रानी हार पहन रखा था। रस्म में सारी औरतें नैना की खूबसूरती की तारीफ करती रहीं। नैना के गले में वो रानी हार देख उसकी बड़ी ननद को लालच आ गया। धीरे से अपनी माँ के कान में उसने ये बात कह दी।

अगले दिन जब ननद को अपने ससुराल निकलना था तो वंदना जी नैना के पास गई, “नैना, बेटा वो तेरी ननंद आज अपने ससुराल वापस जा रही हैं। तो रिवाज के अनुसार उसे कुछ गिफ्ट दे देती।”

“हाँ माँ। बताइये क्या दूँ? दीदी पर कौन सी साड़ी अच्छी लगेगी।”

“अरे बेटा साड़ियों का क्या हैं। वो तो भर के दी हैं हमने। तू तो वो अपना रानी हार दे दे उसे”, नज़रे चुराते हुए नैना की सास ने तो कह दिया। अब नैना को समझ नहीं आ रहा था की वो क्या जवाब दे क्योंकि वो हार उसकी परदादी का दिया हुआ एक खानदानी हार था।

नैना को चुप देख उसकी ननद ने ताना देते हुए कहा, “छोड़ो ना माँ, भाभी का दिल तो बहुत छोटा निकला। एक हार के लिए सौ बार सोच रही हैं” और नाराज होकर दोनों माँ बेटी वहां से चली गई। उनके जाने के बाद घर का माहौल ख़राब ना हो ये सोच कर नैना ने वो हार दे दिया।

अब ये रोज़ का काम हो गया तीनो ननंदे कभी कोई सामान ले लेती, तो कभी कोई और तो और नैना को बताती भी नहीं। नैना परेशान हो जाती फिर भी चुप रह जाती। आखिर समीर के साथ शादी का फैसला भी तो उसका ही था।

नैना की सास के मन में ये बात बैठ गई की अगर उनकी बेटियों की शादी से पहले नैना को बच्चा हो गया तो समीर और नैना के घर वालो से कुछ हाथ नहीं लगेगा। एक दिन मार्केट से आते हुए एक नीम हकीम का बोर्ड लगा देख वो रुक गई।

“क्या हुआ माई। क्या सोच रही हो?” हकीम ने पूछा,

“कुछ नहीं बाबा वो आपसे कुछ पूछना था”, वंदना जी ने कहा।

“वो मेरे बेटे की नौकरी अभी नहीं लगी तो बहु को कुछ साल बच्चा नहीं करना, लेकिन बेटा मान नहीं रहा तो कुछ उपाय बता देते आप”, वंदना जी ने झूठ बोल बाबा से कुछ जड़ी बूटी ले ली जिसे रोज़ दूध में मिला कर पीना था।

अब रोज़ झूठा प्यार दुलार दिखा वंदना जी नैना को वो जड़ी बूटी वाला दूध पिला देती। नैना को बिलकुल अच्छा नहीं लगता।

“माँ, इसका स्वाद अच्छा नहीं हैं,” जब नैना बोलती तो वंदना जी झूठा लाड दिखाते हुए कहती, “अरे बेटा देख कितनी कमजोर हो गई हो इससे ताकत आएगी। तभी तो एक सुन्दर सा पोता मिलेगा हमें।”

भोली नैना उनकी बातों में आ जाती। इस तरह कुछ महीने बीत गए और नैना के पापा ने नैना के दूसरी ननद की शादी भी करवा दी। एक दिन सुबह से नैना को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था।

“समीर, आज सुबह से कुछ अच्छा नहीं लग रहा। जी घबऱा रहा हैं और चक्कर भी आ रहे हैं।”

नैना की बात सुन समीर ने अपनी बाहों में लेती हुए कहा, “मैडम जी ये कोई बीमारी नहीं हैं। लगता हैं अपने मम्मी पापा बनने के दिन आ गए।”

नैना शरमा के समीर के बाहों में छिप गई।

“शाम को एक बार डॉ से मिल लेंगे,” ये बोल समीर ऑफिस निकल गया। उसके जाने के दस मिनट के बाद नैना को ज़ोरदार चक्कर आया और वो बेहोश हो गई। जब उसकी आंख खुली तो सब आस पास थे। उसके मम्मी पापा रोए जा रहे थे।

तभी डॉ की आवाज़ आयी, “इनकी दोनों किडनी ख़राब हो चुकी हैं। हार्ट पे भी असर हुआ हैं। अब कुछ नहीं हो सकता, आई ऍम सॉरी।”

“समीर”, नैना की आवाज सुन समीर भाग के नैना के पास आया।

“हाँ नैना बोलो? समीर माँ रोज़ मुझे दूध में कुछ देती थी, मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। पर उनको बुरा ना लगे तो मैं पी लेती थी। आज समझ आया कि वो क्या देती थी”, नैना के कहते ही सबकी नज़रे वंदना जी पे टिक गईं।

समीर ने वंदना जी का हाथ पकड़ रूम से बाहर ले आया, “ये नैना क्या बोल रही है माँ?”

“मुझे क्या पता, पागल हो गई है तेरी बीवी।”

“अब बस भी करो माँ”, रोते हुए समीर की छोटी बहन ने कहा। “मैंने खुद देखा है आपको भाभी के दूध में कुछ मिलाते हुए।”

अब वंदना जी को ‘काटो तो खून नहीं’ ऐसी अवस्था हो गयी।

“वाह माँ वाह, ये सिला दिया आपने उस मासूम के विश्वास का? मुझे तो आपको माँ कहते हुए भी शर्म आती है। अभी तो हमने अपना जीवन शुरू भी नहीं किया था और आपने सब बर्बाद कर दिया।”

उसी वक़्त पुलिस को फ़ोन कर नैना की सास को जेल भेज दिया गया और अपनी प्यारी नैना को रोते हुए उसके मम्मी पापा और समीर ने अंतिम विदाई दी। एक लालची इंसान के लालच ने एक साथ चार-चार  जिंदगियों को बर्बाद कर दिया।

 

इमेज सोर्स : Still from Sansani(recreation)/ YouTube

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