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बस आखिरी बार मुझे एक मौका और दे दो…

Posted: मई 20, 2021
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संध्या को देखते ही सुधीर उसके पांव को पकड़ माफ़ी मांगने लगा, “मुझे माफ़ कर दो संध्या बहुत बड़ी गलती हो गई। प्लीज़ घर चलो।

कमरे से ऐसी महक आई जैसे सालों से सफाई नहीं हुई। चाय भी बिल्कुल काली पड़ चुकी थी। अपनी आंखों को मलते हुए सुधीर चिल्लाते हुए बोला, “संध्या! संध्या! कहाँ मर गई? चाय भी काली और ठंडी पड़ चुकी है। क्या कर रही है, घर की सफाई भी तुझसे नहीं होती। आज लगता है, तुझे तेरी औकात याद दिलानी ही होगी।” सुधीर झल्लाता हुआ बोला। 

“अरे! किसको चिल्ला रहा सुबह-सुबह?” लड़खड़ाते सुधीर को संभालते हुए विनीता जी बोलीं।

“अरे! ये संध्या कहाँ मर गई माँ? लगता है इसे आज मजा चखाना पड़ेगा। पूरा घर गंदा करके रखा हुआ है। बस भर भरकर खाने को दो इस इसको।” 

“कहाँ है ये संध्या जिसे तू घर‌ से निकाल रहा? उसे तो तूने दो दिन पहले ही घर से भगा दिया था मार मारकर। हाय रे मेरी किस्मत, इस बुढ़ापे में सारा काम करना पड़ रहा है।”

“दो दिन पहले?” आश्चर्य से उसने माँ की तरफ़ देखते हुए पूछा, “क्या मैं दो दिन से बिस्तर पर था?”

“तुझे कुछ याद नहीं है? जब इतना पिएगा तो याद कैसे रहेगा? उसको बदचलन कह तूने ही तो निकाला था। अच्छा किया, वो थी भी इस लायक। अब मैं अपनी सहेली बीना की बेटी मधुरिमा से तेरी शादी कराऊंगी। भर भरकर मुट्ठी पैसे लाएगी, इस कंगली के जैसे नहीं। इसका तो चेहरा देखते ही दिन खराब हो जाता था।” 

अचानक से सुधीर सोफे पर गिर जाता है।

“अरे! बेटा क्या हुआ, तू ठीक तो है?”

“माँ, ये मैंने क्या कर डाला?”

“क्या हुआ बेटा, क्यूँ परेशान हो रहा?” 

“माँ बहुत बड़ी गलती हो गई, संध्या पेट से थी। अब पता नहीं कहाँ भटक रही होगी। मैं बेसुध सा पड़ा था, आप ‌भी मुझे होश में नहीं लाईं। ये मैंने अपने हाथों से क्या कर डाला। कहाँ जाऊं, कैसे ढूंढूं उसे? कुछ समझ नहीं आ रहा।” 

“जाने दे बेटा, जो गया सो गया। अब मैं तेरा सुंदर सा घर बनाऊंगी। बस कर ली तूने अपनी मनमर्जी अब और नहीं। कितना समझाया था कि इससे शादी ना कर, पर तुझे तो प्यार का भूत सवार था। पता नहीं क्या जादू-टोना किया था मेरे बेटे पर उस कुलक्षणी ने। अब तो भगवान की कृपा बरसी है, बस ये मौका हाथ से नहीं जाने दूंगी।” 

इधर सुधीर सोच में पड़ जाता है, “शादी से पहले क्या-क्या वादे किए थे। वो मेरे लिए घर बार सब छोड़ आई और मैं अपनी मर्दानगी साबित करने में लगा रहा। छी! शर्म है मुझे अपने आप पर, पर संध्या गई कहाँ होगी? पता नहीं ये शराब की लत और क्या-क्या दिखाएगी।”

सुधीर भागते हुए सब जगह संध्या को ढूंढता है। पर वो कहीं नहीं नज़र आती। यहां तक कि अपने सभी परिचित और जहां-जहां संध्या जा सकती थी सब जगह उसने ढूंढा। थक हार कर उसने पुलिस स्टेशन जाने की सोची और पहुंच गया। पर अचानक उसके पांव रुके। वो लोग पूछेंगे आखिर बीवी गई क्यूँ तो क्या जवाब दूंगा, कि मैं शराब पीकर उसे बुरी तरह मारता हूं? 

नहीं, नहीं, बिल्कुल भी नहीं। फ़िर वो उल्टे पाँव घर लौट आया। घर में आकर सुधीर करवटें बदलता रहा। पर आंखों में नींद कहाँ थी उसके, आंखें बंद होते ही संध्या का चेहरा ‌सामने आने लगा। इसी बीच तेजी से सुधीर उठा और कहा, “चाहें जो हो जाए संध्या को तो ढूंढना है। हाथ पर हाथ धरे ऐसे नहीं बैठ सकता।”

वो फिर पुलिस स्टेशन गया और वहां संध्या की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। घर पहुंचा ही था कि उसके पास पुलिस का कॉल‌ आया, “हैलो सुधीर बोल रहे हैं?”

“जी बोल रहा हूं।”

“ज़रा जल्दी अशोक चौक आ जाएं। यहां एक महिला की लाश मिली है।” सुधीर को तो काटो तो खून नहीं।

सुधीर भागते हुए वहां गया। उसके हाथ डर के कारण कांप रहे थे। उसने कांपते हाथों से जैसे ही कपड़ा हटाया। तो आंखों के नीचे अंधेरा छा गया।होश आते ही उसने बताया कि ये मेरी संध्या नहीं है।

शाम का समय था घर की लाइब्रेरी में बैठे सुधीर को जाने क्या याद आया, “वहीं होगी वो, हो ना हो मेरा मन कह रहा।” 

“पर कैसे जाऊं बड़ी दीदी के पास, शराब के नशे में उस समय क्या कुछ नहीं कहा था मैंने। बड़े रौब में भाई-बहन का रिश्ता खत्म किया था। पर कुछ भी हो जाए आज संध्या की खातिर ज़रूर जाऊंगा वहां।”

उसने जैसे ही श्यामली जी का दरवाजा खटखटाया, “नमस्ते दीदी।”

“बड़ी जल्दी आ गए तुम, बस इतना ही ख्याल था? जानवरों सा हाल कर रखा है उसका तुमने। वो तो कहो वो सही समय पर मेरे पास आ गई वरना माँ और बच्चे दोनों को जान का खतरा था।” 

संध्या को देखते ही सुधीर उसके पांव को पकड़ माफ़ी मांगने लगा, “मैंने तुम्हें शादी के वक्त रानी बनाकर रखने का वादा किया था और तुम्हारा ये हाल कर दिया। मुझे माफ़ कर दो संध्या बहुत बड़ी गलती हो गई। कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढा तुमको प्लीज़ घर चलो। उसे अपने हाथों से स्वर्ग बना दो।”

“आज अगर तुम्हें कुछ हो जाता तो मैं अपने को माफ नहीं कर पाता। माँ की ग़लत सोच मेरे दिलो-दिमाग पर इस कदर हावी हो गई थी कि सही ग़लत का अंतर नहीं कर पा रहा था। हाथ जोड़ रहा हूं संध्या आगे से कभी ऐसी गलती नहीं होगी।”

“बैग पैक करो सुधीर! मैं चल रही हूँ तुम्हारे साथ।”

“एक बार ठंडे दिमाग से फिर सोच ले संध्या, ये पहली बार नहीं हुआ था।” श्यामली बोली। 

“लेकिन दीदी पश्चाताप के ये आँसूँ मैं पहली बार इनकी आंखों में देख रही हूँ। और अगर किसी को गलती का एहसास हो जाए, वो ही बड़ी बात है। मैं नहीं चाहती कि मेरे होने वाला बच्चा अपने पिता के प्यार से वंचित रहे। शायद उसके लिए ही मैं अपने रिश्ते को एक मौका देना चाहती हूं।”

“तू धन्य है संध्या और हाँ सुधीर मेरी नजरें अबसे बस तुझ पर रहेंगी।”

“दीदी! अब तो गलतियों की कोई गुंजाइश नहीं। मैंने इन दिनों में बहुत कुछ सीख लिया दीदी। रिश्तों का बनना और बिगड़ना सब आपके हाथों में होता है। मुझे बस अब अपना परिवार देखना है। जिसको अपने प्यार और समझदारी से आगे बढ़ाना है।” सुधीर का आत्मविश्वास देख संध्या के चेहरे में सुकून के भाव दिख रहे थे।


मूल चित्र: Still from movie Thappad

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