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क्यों सबका अस्तित्व बनाने वाली खुद अपना अस्तित्व ढूंढती है…

कितनी सरलता से एक स्त्री एक बीज को फूल बनाती है और पूरी बगिया को अपने प्रेम से सींचती है फिर क्यों वह अपने अस्तित्व को ही खोज नहीं पाती?

कितनी सरलता से एक स्त्री एक बीज को फूल बनाती है और पूरी बगिया को अपने प्रेम से सींचती है फिर क्यों वह अपने अस्तित्व को ही खोज नहीं पाती?

एक स्त्री होकर सृजन का दायित्व निभाती हूँ

घर को एक सूत्र में पिरोकर, प्रेम के धागे से

हर एक रिश्ते को दिल से बांधती हूँ।

पुरुष के एक बूंद प्यार से लिपटी श्रृंखला को

नौ महीने अपने पेट में सींचती हूँ

प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर को मैं

अपने वात्सल्य से सींचती हूं।

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संस्कारों की चादर को ओढ़कर

अपने अस्तित्व को खुद में समेटे

एक बीज को फूल बनाती हूँ

उस पूरी बगिया को अपने प्रेम से संवारती हूँ।

फ़िर भी अपने अस्तित्व को आज भी

इस समाज में पल-पल ढूँढती हूँ

क्यूँ स्त्री होकर अभी तक

अपने लिए समान अधिकार को तरसती हूँ?

इमेज सोर्स – Still from Mother’s Day Short Film- Mom via YouTube

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