Suchetana Mukhopadhyay

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Voice of Suchetana Mukhopadhyay

माँ और मैं – क्या माँ हर बार की तरह अपनी बिटिया को समझ जायेंगी?

'माँ और मैं', एक बेटी और उसकी माँ में होने वाली गुफ़्तगू को अपने दिल के करीब पाएंगे और ये अंदाज़ा लगा पाएँगे कि कौन किसको, कितना जानता है, कितना समझता है।  

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बहा ले जाएँगी एक दिन मुझे, मन की कश्तियाँ अपने संग!

लहरों में कश्तियाँ भी होती हैं कुछ, जिन पर निकल जाती हूँ मन ही मन, फिर मेरा लौटना ज़रूरी हो जाता है, व्यवस्थाओं को सींचने शायद!

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क्या अगस्त क्रांति की इन असमिया वीरांगनाओं को आप जानते हैं?

भारत छोड़ो आंदोलन में समाज के हर छोर से ऐसी ही औरतें शामिल हुईं जिन्होंने अपने साहस, नेतृत्व और त्याग से भारत में नारीवाद का एक नया इतिहास लिखा।

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साइकिल पर सवार, पैरों में पहिए और पहियों में हौंसला

'साईकल पर सवार उसकी ज़िन्दगी अब संतुलित होने को है।' विश्व साईकल दिवस के अवसर पर एक सच्ची कहानी, जिसे बहुतों ने जिया है, अपने-अपने तरीकों से। 

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डमी क्या चीज़ होती है जी

"भाभी को सरपंच पद पर चुनाव में खड़ा कर दीजिये भैया। इससे चित और पट दोनों आप ही के रहेंगे। है कि नहीं?"

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राष्ट्रमाता मूलमती देवी-प्रसिद्ध क्रांतिकारी और कवि रामप्रसाद बिस्मिल की महीयशी माँ

आत्मकथा में रामप्रसाद लिखते हैं, "यदि मुझे ऐसी माता नहीं मिलती तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों के भांति संसार चक्र में फंस कर जीवन निर्वाह करता।"

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यदि आज की नारी के साथ सीता, द्रौपदी और ना जाने कितनी और बोलें तो?

क्या होगा अगर अब कह दूँ, मेरे प्रश्नों के कोई उत्तर किसी के पास नहीं थे, तो जीवित दफ़ना कर मुझे देवी बना दिया! सदियाँ बीत गईं, यह इक्कीसवीं सदी है ना?

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थेरी गाथा-हमारे लिए कोई धर्म नहीं बना

भिक्षुओं से चौरासी नियम अधिक हमारे लिए रच कर, हे मर्द महाबोधि, आप ने भी साबित कर दिया, औरतों के लिए कभी कोई धर्म नहीं बना। 

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गौमाता

गौमाता के कितने भक्त! पर क्या इनमे से किसी को उसकी ज़रा सी भी फ़िक्र है?

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नई कविता

एक नयी कविता जो अभी मन के झरोखे से निकली है। क्या शांति में ही सदैव समझदारी है - दो लघु कविताएं। 

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