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माँ और मैं – क्या माँ हर बार की तरह अपनी बिटिया को समझ जायेंगी?

'माँ और मैं', एक बेटी और उसकी माँ में होने वाली गुफ़्तगू को अपने दिल के करीब पाएंगे और ये अंदाज़ा लगा पाएँगे कि कौन किसको, कितना जानता है, कितना समझता है।  

‘माँ और मैं’, एक बेटी और उसकी माँ में होने वाली गुफ़्तगू को अपने दिल के करीब पाएंगे और ये अंदाज़ा लगा पाएँगे कि कौन किसको, कितना जानता है, कितना समझता है।  

“छोटी, तेरे फ़ोन के लिए कब से बैठी हूँ मैं, कितनी देर कर दी तूने कॉल करने में, बस में सीट नहीं मिली थी क्या?” माँ हू-बहू ऐसी ही चिंतित सुनाई देतीं हैं रोज़।

“नहीं माँ, कहाँ मिलती है इस वक़्त सीट। अभी-अभी उतरी और तुम्हें फ़ोन किया।”

“बात करते हुए मैं टाइम पर ऑफिस पहुंचने के लिए भाग रही थी ऑटो की ओर।”

“कैसे हो तुम लोग? कामवाली आयी? नन्ही स्कूल गयी है? तू खाना ठीक से खाई आज? टिफिन ली हो ना?”

“सब आये हैं, सब कुछ ठीक है। वरना मैं निकल पाती माँ?” मेरी साँस फूल रही थी। अभी भी और कुछ कदम दूर है ऑटो स्टैंड।

“अच्छा सुन, क्या तू इस दौरान मेरा कमरा खोली थी?”

“नहीं, वक़्त नहीं मिला माँ”, मैंने बेज़ार हो कर कहा।

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“मैं ना, आते वक़्त बताना भूल गयी थी,” माँ कुछ झिझक से बोल रही थी, “बेड के नीचे लाल बैग में मुरी, दाल और मसाले रखे हुए हैं। जब कमरा खोलेगी तो ले लेना।”

हर साल कुछ महीने घर से बहुत दूर, एक दूसरे शहर में अपने अपनों के घर रहने जातीं हैं मेरी माँ। अपने इलाज के लिए। वहाँ चेकअपस और दवाईयाँ ले कर सही सलामत अपने रास्तों पर बढ़ने लगती हैं। पर इन व्यवस्थाओं के बाहर अपनों के घर में अपने मिलते कहाँ हैं अब पूरा हफ़्ता?

सुबह से शाम, सोम से शनिवार, किसी आठवी मंज़िल पर पंद्रह सौ स्क्वेयर फ़ीट की एक लंबी चौड़ी तन्हाई के चक्कर काटती रहतीं माँ, ऐसे ही मुझसे शब्दों की एक अविरल आकुल धारा सी मिलतीं हैं रोज़…

“तेरे पापा की तस्वीर वाले शेल्फ में बिस्किट, चाय-पत्ती और चीनी है, वो भी ले लेना। देर न करना, वरना सब खराब हो जाएंगे।”

मुझे लगभग सब पता होती हैं माँ की बातें।

“अख़बार और बाकी कागज़, जो मैं रैक के ऊपर रख कर आयी हूँ, उन्हें मत बेच डालना, मैं लौटने के बाद देख कर बेचूँगी। उनमें कईयों को पढ़ना मेरा अभी बाकी है…”

आसमान से ऊंचे फ्लैटस, टकाटक चलती ऑटोमैटिक लिफ्ट्स, काम्प्लेक्स के फैशनेबल बग़ीचे, गेट के बाहर भागती घमासान सड़क माँ के बूढ़े मन को बिल्कुल भी भाती नहीं…

…पता है मुझे।

पता है मुझे यह भी खूब, कि माँ अपने सौंधे से सवाल दोहरा कर हर रोज़, एक कंक्रीट के शहर में अपनी मिट्टी खोजती हैं। जिससे, शायद उनके बीमार शरीर और व्याकुल मन को एक और दिन के खालीपन को झेलने का हौसला मिले?

“और, तुम लोग सारे कितने व्यस्त रहते हो, कमरा साफ करने में वक़्त ज़ाया न करना। मैं वापस आ कर, साफ कर लूँगी।” एक उदास स्वर धीमे से स्वगतोक्ति कर रहा था।

“यहाँ, घर से इतना दूर, एक पल भी मन नहीं लगता है छोटी। दिन गिन रही हूँ, कब घर वापस जाऊँ।”

इधर माँ अपनी दिनचर्या दोहरानी शुरू ही की थी, कि उधर ऑटो में मुझे पीछेवाली सीट नहीं मिली। अगले ऑटो के लिए इंतजार करने का समय नहीं था बिल्कुल।

और सामने बायीं साइड में ठीक से बैठने के लिए मैंने माँ को बिन बताए फ़ोन काट दिया।

जानती हूँ, माँ कुछ बोल रही थीं और आगे भी कुछ देर ऐसे ही अकेली बोलती रहेंगी, क्योंकि अचानक से फ़ोन काटने का यह अक्सर वाला सिलसिला उन्हें आज तक समझ में नहीं आया है।

पर क्या करूँ? माँ को मैं बाद में समझा दूंगी।

मुझे पता है, माँ हर बार की तरह अपनी बिटिया को समझ जायेंगी।

मूल चित्र : Unsplash

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Suchetana Mukhopadhyay

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