कोरोना वायरस के प्रकोप में, हम औरतें कैसे, इस मुश्किल का सामना करते हुए भी, एक दूसरे का समर्थन कर सकती हैं?  जानने के लिए चेक करें हमारी स्पेशल फीड!

बहा ले जाएँगी एक दिन मुझे, मन की कश्तियाँ अपने संग!

लहरों में कश्तियाँ भी होती हैं कुछ, जिन पर निकल जाती हूँ मन ही मन, फिर मेरा लौटना ज़रूरी हो जाता है, व्यवस्थाओं को सींचने शायद!

लहरों में कश्तियाँ भी होती हैं कुछ, जिन पर निकल जाती हूँ मन ही मन, फिर मेरा लौटना ज़रूरी हो जाता है, व्यवस्थाओं को सींचने शायद!

तुझसे क्या चाहती हूँ मैं?
रोज़ एक खामोश सुबह की
देहलीज़ पर बैठी
ताकती हूँ तुझे, मेरी ज़िंदगी।
और
लहरें गिनती हूँ सवालों की।

लहरों में कश्तियाँ भी होती हैं कुछ,
जिन पर निकल जाती हूँ मन ही मन।
सफ़र कुछ देर, कुछ दूर तक का।
किसी अनजान दिशा
और अनछुई सीमाओं का।

फिर मेरा लौटना ज़रूरी हो जाता है
बदन पर उगे पौधों के लिए।
व्यवस्थाओं को सींचने या शायद
अपनी ही बनायी आदतों के लिए।

लेकिन लौट कर भी रोज़
सुबह के आंगन में मैंने,
खुद को पिंजरे की सरहद पर
उड़ने को बेताब पाया है।
जैसे पाया है धूप सा बेबाक
खिलते खुलते कईं सपनों को।

उनके संग अब रोज़ लहरों में
निकलती हैं मेरी कश्तियाँ।
पता है वे ज़रूर मुझे
बहा ले जाएँगी समंदर तक
एकदिन।

मूलचित्र : Pixabay 

पसंद आया यह लेख?

पाइये विमेन्सवेब के सारे दिलचस्प हिंदी लेख अपने ईमेल इनबॉक्स मे!

Never miss real stories from India's women.

Register Now

विमेन्सवेब एक खुला मंच है, जो विविध विचारों को प्रकाशित करता है। इस लेख में प्रकट किये गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं जो ज़रुरी नहीं की इस मंच की सोच को प्रतिबिम्बित करते हो।यदि आपके संपूरक या भिन्न विचार हों  तो आप भी विमेन्स वेब के लिए लिख सकते हैं।

टिप्पणी

About the Author

Suchetana Mukhopadhyay

Dreamer...Learner...Doer... read more...

16 Posts | 32,678 Views
All Categories