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एक दुपट्टे के कारण यूँ बदली मेरी ज़िंदगी…

वीरा अपने पिता को देख कर चीख़ चीख़ कर रो पड़ी और बोली, "पापा मेरा दुपट्टा नहीं मिल रहा, आपने देखा क्या? पापा सच्ची मेरा दुपट्टा कहीं खो गया है...."

वीरा अपने पिता को देख कर चीख़ चीख़ कर रो पड़ी और बोली, “पापा मेरा दुपट्टा नहीं मिल रहा, आपने देखा क्या? पापा सच्ची मेरा दुपट्टा कहीं खो गया है….”

ट्रिगर अलर्ट 

“आज भी मुझे अन्नू से ज़्यादा नम्बर मिले माँ, मेरी मैडम बोल रहीं थी, तुम एक दिन डॉक्टर बनोगी।”

“आज तूने पाँचवी कक्षा पास कर ही ली, आज तेरे पापा बहुत ख़ुश होंगे।”

“देखो, वीरा कितने अच्छे नम्बरों से पास हुई है, पूरी क्लास में फर्स्ट आई है।”

“सरला, तू चुन्नी सही से क्यों नहीं लेती? घर पर रह तब भी सही से ओढ़ कर सामने आया कर। वीरा कैसे सीखेगी, फिर चुन्नी ओढ़ना? ध्यान रखियो अब से।”

“जी, आगे से ध्यान रखूंगी।”

“वीरा अब मुझे सयानी होती दिख रही है, देख अब तो उसकी छठी क्लास है, अगर सूट सलवार वाला स्कूल मिले तो ठीक वरना, इसकी पढ़ाई रहने दियो, हमको कौन सा नौकरी करवानी है इस से?”

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“अरे! नहीं-नहीं मिल जाएगा स्कूल, सूट और दुपट्टे वाला।”

रात हो गई, सब सो गए मगर सरला को नींद न आई, सोचे जा रही आस पास तो हर स्कूल में स्कर्ट है, कैसे समझाऊं इनको? वीरा तो पढ़ने में इतनी अच्छी है, उसको पढ़ाई का भी शौक है। सुबह हुई, सरला घर-घर पूछने गई। सभी से पूछ आई मगर, सब ने यही बताया कि हम घर से दूर भेजते हैं लड़कियों को। सब इकठ्ठी हो कर साईकल से निकल जाती हैं, तुम भी अपनी वीरा को उनके साथ ही भेज दिया करना, औरतों ने सरला को समझा कर घर भेजा।

“आसपास का स्कूल होगा तो ठीक वरना स्कूल नहीं, सूट दुपट्टे के बिना मैं किसी क़ीमत पर इसको स्कूल नहीं जाने दूंगा। देख नहीं रही आज कल जितने भी रेप केस आ रहे हैं सब ऐसी ही लड़कियों के हैं जो जीन्स टॉप पहनने वाली हैं। अब बात समझ और ला खाना गर्म कर के दे। हम गाँव में हैं तेरे मायके नहीं। ये दिल्ली नहीं है, समझी।, दूर तो मैं बिल्कुल न भेजूँ”, दिनेश झल्लाकर बोला।

कैसे न कैसे कर के वीरा को स्कूल भेजना बन्द कर दिया। सरला 12वी कक्षा पास थी। उसने वीरा की पढ़ाई घर में ही जारी रखी।  सरला बराबर वाले घर में पढ़ने वाली निम्मो से सारा सिलेबस पूछ लेती और वीरा को बिल्कुल उसी तरह पढ़ाती। 

निम्मो की तरह वीरा की भी ड्रेस बनाई गई, 8 बजे से 12 बजे तक सरला ने वीरा की ज़िम्मेदारी ले ली थी। जब निम्मो की परीक्षा होती, तब सरला भी वीरा की परीक्षा लेती। पूरे चार साल यही चलता रहा। सब कुछ स्कूल जैसा ही रहा, बस कमी थी तो वो भी बस विद्यालय की तरह मार्कशीट की।  इसके अलावा वीरा ने जब दसवीं कक्षा की किताबों को हाथ लगाया तो वह ख़ुशी से झूम उठी। गाँव की मिश्रानी ने बताया था, गाँव में ओपन स्कूल की पढ़ाई कराई जाती है दसवीं की।

“वीरा, तुझे कितनी बार कहा है अपने दुपट्टे को ढंग से पहना कर, मुझे इस वक़्त तू बिल्कुल गंदी औरतों की तरह दिखती है।” दिनेश ने वीरा को धक्का देते हुए बोला।

वीरा इस बात से ख़ासी आहत थी। वीरा अब बच्ची नहीं थी, सारी बातें समझती थी। उसको दुपट्टे से कोई परेशानी नहीं थी, बस वह अपने पिता की वजह से आहत रहती थी। गाँव था, तो वहाँ तो रूढ़िवादी सोच का ज़्यादा प्रचलन था।

मिश्रानी की द्वारा वीरा के जन्म पत्री के आधार पर ओपन स्कूल में दाख़िला मिल गया, जिसमें दिनेश ने भी आर्थिक सहायता की। वीरा बहुत डरी और सहमी हुई लड़की बनकर उभरी, उसको बाहर की कुछ भी समझ नहीं थी। वह बाहर गाड़ियों की आवाज़ तक से डर जाती थी। दिनेश उसको बाहर कहीं नहीं जाने देता था, जिससे उसका सामाजिक विकास रुक गया। मनोवैज्ञानिक तौर पर उसने चारदीवारी को ही अपनी दुनिया समाझ लिया था।

कुछ दिनों बाद वीरा की किताबें घर पर आईं, वीरा उनको देखकर बहुत ख़ुश हुई। उसने परीक्षा की तैयारी शुरू की, और परीक्षा केंद्र भी घर से ज़्यादा दूरी पर नहीं था, क़रीब में ही था। सरला ने दिनेश को इस काम के लिए मना लिया के वीरा को वही ले जाया करेगा और लाया करेगा।

परीक्षाएं शुरू हुईं। दो रिबन के साथ गुँथी हुई चोटियाँ, एक भारी दुपट्टा, शॉल से भी ज़्यादा भारी, बालों में तेल लगा हुआ, सलवार और क़मीज़ ख़ुद के शरीर के दोगुने साइज की। डरी डरी एक छवि, और पैरों में हवाई चप्पल, जिसमें एक में टांका लगा हुआ था। हाथ में एक पर्चा, और पेन का बॉक्स। सिर नीचे। जो भी देखता बड़ी अजीब सी निगाह से देखता।

दिनेश को भी अजीब लगता, के लोग इतने अचंभित होकर क्यों देख रहे हैं। बहरहाल! वीरा परीक्षा केंद्र पहुंची। वहाँ पर लड़की और लड़कों का एक साथ सेन्टर पड़ा था। तो सभी लोग वीरा का बहनजी कहकर मज़ाक उड़ाने लगे। साथ में सरपंच का बेटा भी परीक्षा में बैठ रहा था, उसने भी कहा, “ये तो वही है वीरा, जो घर में ही दुबकी बैठी रहती है, अरे! आज तू पेपर देने आ गी?”

वीरा मूर्ति बनी डेस्क पर बैठी रही। परीक्षा कक्ष में टीचर आए उन्होंने पर्चे बाँटने शुरू किए। इसी बीच पीछे बैठी लड़की ने वीरा की चोटी खींच ली इस पर वीरा की चीख़ निकल गई, सारी कक्षा हँसने लगी, और टीचर सबको चिल्लाने लगी, फिर वो लड़की बोली, “जादा शानी न बड़ियों, दिखा दियो मन्ने बी।” इस बात पर वीरा ने सिर हिला दिया, और प्रश्न पत्र मिलते ही उसको करने बैठ गई। 

इतनी देर में पीछे बैठी लड़की को टीचर ने अलग सीट पर बैठा दिया। वो वीरा पर भड़कने लगी। जैसे तैसे परीक्षा समाप्त हुई, वीरा ने सारा प्रश्न पत्र हल कर दिया था, मगर उस लड़की और सरपंच की आँखों में वह न जाने क्यों चुभ रही थी।

“माँ, मेरा पेपर तो अच्छा गया, मगर बड़े ही अजीब लोग थे, निम्मो भी नहीं थी, जिससे मैं बात कर पाती।” घर आते ही माँ से गले लगकर वीरा ने बोला।

सरला हँसते हुए बोली, “चल अब खाना खा ले, थक गई होगी।”

“हाँ, माँ, खाना दे दो।” तब तक दिनेश भी आ गया और सबने मिलकर खाना खाया, दो दिन बाद फिर से परीक्षा थी।

आज सुबह से ही आँधी के जैसा मौसम हो रखा था। चारों ओर धूल ही धूल। आज वीरा और दिनेश ने अपना मुँहा दुपट्टे से और अँगोछे से ढक लिया था। फिर परीक्षा केंद्र पर वही दृश्य कोई शोर कर रहा है, कोई दीवारों पर नकल लिख रहा, और वीरा वैसे ही मूर्ति बनी बैठी।

परीक्षा खत्म हुई, सरपंच का बेटा मोनू और उसके दो साथी बारबार उसको घूरे जा रहे थे। मोनू के मन और आँखों की परछाई में कुछ वासना की बू आ रही थी। सभी लोग घर जाने लगे।  क्लास के दरवाज़े पर वही लड़की खड़ी थी, जिसने वीरा की चोटी खींची थी। उसने आज वीरा को टाँग अड़ा कर गिराने की ठान रखी थी। उसने ऐसा ही किया, वीरा को टाँग अड़ा कर गिरा दिया, जिससे वीरा के होंठों पर हल्की चोट लग गई, वह अपने होंठों से बहता हुआ खून धोने के लिए पानी की टंकी के पास गई।

वहीं पर मोनू ने उसका हाथ पकड़ लिया और खींचता हुआ बोला, “तू इतना डरती क्यों है री?”

वीरा सहम गई थी, उसने अपने हाथ को छुड़ाने की कोशिश की मगर छुड़ा न सकी, इतनी देर में उसके दो दोस्त भी आ गए, और उससे छेड़खानी करने लगे। मोनू ने सबसे पहले उसके दुपट्टे पर हाथ डाला, और खींच लिया, दुपट्टे को हवा में उड़ाता हुआ बोला, “इसकी कोई ज़रूरत नहीं…..”

दिनेश बाहर खड़ा होकर गुस्से से लाल पीला हो रहा था, और न जाने क्या क्या सोचे जा रहा था। बादल भी अपना तेवर दिखाने को उमड़ घुमड़ कर शोर मचा रहे थे। और इतने में बारिश शुरू हो गई। बारिश काफ़ी तेज़ थी, स्कूल के गेट पर खड़े हुए चौकीदार से दिनेश ने पूछा के परीक्षा ख़त्म नहीं हुई है क्या? उसने जवाब दिया, ख़त्म हो गयी, मगर कुछ बच्चे शायद बारिश की वजह से रुक गए हों।

चौकीदार की बात सुनकर भी दिनेश को चैन नहीं आया, पूरा एक घण्टा बीत गया।

एक घण्टे के बाद चौकीदार खुद विद्यालय में अंदर देखने गया और जब वापस आया तो बहुत घबराया हुआ प्रधानाचार्य के कक्ष में जाकर कुछ बोला।  इतने में 2 अध्यापिका एयर प्रधानाचार्य जी विद्यालय के अंदर की तरह गए। जब वहाँ से वापस आये तो आगे और पीछे दोनों मैडम थीं, और बीच में निर्वस्त्र और अधमरी वीरा, जिसके शरीर पर हज़ारों निशान थे। 

वीरा का सामूहिक बलात्कार हुआ था, और खून में लथपथ वीरा के बाप को अंदर बुलाया गया, जहाँ आते ही यह सब देख कर वह पागल सा हो गया। उसके अंदर एक भयावह तरीके से जलती हुई ज्वाला पर मानो किसी ने मनो घड़े पानी के उड़ेल दिए हो। उसको अपनी आँखों को नोचने का मन कर रहा था। उसकी पीड़ा की ध्वनि उसके चेहरे पर साफ दिख रही थी।

वो व्याकुल होकर इधर उधर भटकने लगा, जैसे वो कुछ ढूंढ़ रहा हो, जैसे उसको अपनी आँखों को आग लगानी हो या अपनी बेटी के शरीर को आसमान उढ़ाने और ज़मीन से ढ़कने की कोशिश कर रहा हो, और विद्यालय के आंगन में पड़ी हुई गीली मिट्टी वीरा के शरीर पर लगाने लगा, उसको शरीर को मिट्टी से छुपाने लगा, मगर यह दाग़ तो उस दुपट्टे के एवज मिले थे, जो बचपन से वीरा के संगी बन गए थे।

वीरा अपने पिता को देख कर चीख़ चीख़ कर रो पड़ी और बोली, “पापा मेरा दुपट्टा नहीं मिल रहा, आपने देखा क्या? पापा सच्ची मेरा दुपट्टा कहीं खो गया है, आज माफ़ कर देना पापा।” इतना कहकर वह बेहोश हो गई।

सारे मामले की छानबीन हुई, गलती वीरा की निकली, और उसके पिता की, पुलिस मुखिया बोला, “आप इतना छुपा कर क्यों रखते थे बेटी को, आज कल के लड़के हैं देख कर बहक गये।”

3 साल लग गए वीरा को ठीक होने में। उसने अपने पिता और माँ से यही कहा के मैं अस्पताल से घर नहीं जाऊंगी, माँ मेरा दुपट्टा छीनने वाले इसी गाँव के हैं। पापा आपकी बेटी की लाज वो दुपट्टा नहीं बचा पाया, जो आप मुझे हमेशा उढ़ाते आए।

कुछ दिन बाद पूरा परिवार बाहरी दिल्ली के शकूर बस्ती इलाके में रहने आ गया। वीरा ने 12वी कक्षा दिल्ली के सरकारी विद्यालय से पास की और उसके बाद दिल्ली के मशहूर कॉलेज लेडी श्रीराम से BSW सोशल वर्क में स्नातक की।

वर्ष 2013 में वीरा एक सफल उद्यमी महिला के रूप में उभरी और उन्होंने महिलाओं के उत्पीड़न को ख़त्म करने और रूढ़िवादी सोच को मिटाने के लिए मुहीम चलाई। 2015 में उन्होंने एक कैंपेन चलाया जिसका नाम “बंदिशों को तोड़ो” था, जो बहुत सफल हुआ।

इस कहानी से यही सीख पाएंगे के लड़कियों के कपड़ो में गंदगी नहीं, गन्दगी आपकी सोच में है।  पुरुषवादी समाज के लोग अक्सर यही कहते हैं, हर बलात्कार पर की लड़की ने गंदे कपड़े पहने थे, तो इसी बात पर मेरा उनसे सवाल है क्या आपकी सोच के कपड़े साफ थे? आपने जो शराफ़त का चोला ओढ़ रखा है, वो पावन और पवित्र है?

मूल चित्र : Canva 

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