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मैंने अपने घर में असमानता का माहौल देख खुद को कोसा कि मैं लड़का क्यों हूँ?

Posted: जुलाई 19, 2020

मुझे असामनता का समय आज भी काटने को दौड़ता है। मुझे तब भी यही महसूस होता था की यह तो गलत बात है, हम एक ही माँ की औलादें हैं फिर ये भेदभाव क्यों?

समाज में बदलाव किसको नहीं पसंद? हाँ! बदलाव अगर किसी अच्छे काम के लिए हो तो सभी को अच्छा लगता है मगर बुरे काम के लिए कुछ करना और उसके परिणाम की आशा करना बुरा लगता है।

आज मैं यहाँ पर अपने लेख को इसलिए लिख रहा हूँ कि मुझे समाज में बदलाव चाहिए। मुझे पूरे विश्व में बदलाव लाना होगा, यहाँ पर एक व्यक्ति यह बोल रहा है कि वो अकेला होकर समाज में बदलाव लाएगा? ये हास्यपद हो सकता है मगर नामुमकिन नहीं।  नहीं, हाँ मगर हौसला और करने की चाहत बुलंद होने के साथ एक मज़बूत मनोबल बस। यह वही शस्त्र हैं जिनसे समाज में क्रांति लायी जा सकती है।

असमानता के न जाने कितने ही नकारात्मक पहलू हैं

मुझे यहाँ पर लिखना है कि मुझे क्या बदलाव चाहिए, क्या होना चाहिए समाज में। समाज में जो सबसे बुरी कृति है वह है असमानता की। भेदभाव की। इनसे ही न जाने कितनी समस्याओं का जन्म हुआ है। जैसे गरीबी, अशिक्षा,  दहेज़ प्रथा, भ्रूण हत्या, आदि। अगर हम इन समस्याओं की तह में जाएंगे तो देखेंगे कि इन सब समस्याओं के पीछे असमानता की एक बहुत बड़ी भूमिका है। असमानता  के न जाने कितने ही नकारात्मक पहलू हैं।

असामनता से भरा ये समाज पुरुषवादी रास्ते पर अपना जीवन बसाये बैठा है

जहाँ देखो उस ओर असमानता के बादलों से ढका हुआ एक समाज आपकी नज़रों से ओझल नहीं होगा, क्योंकि समाज पुरुषवादी रास्ते पर अपना जीवन बसाये बैठा है। हर तरफ बस एक ही हवा है ‘पुरुष महिलाओं से बेहतर’ ! कितना अपूर्ण और निरर्थक और असभ्य तथ्य है। कोई किसी की ताकत का आकलन उसके लिंग से नहीं कर सकता, बिलकुल भी नहीं।

आप कैसे और किस बिना पर कह सकते हैं कि महिलाएं पुरुष से बेहतर नहीं हैं? आप खुद से सवाल पूछिए और जवाब ढूंढने की कोशिश करें कि आप कहाँ इन विचारों पर ख़रे उतरते हैं। आपको शायद मानवतावादी होने की वजह से जवाब मिल जाए और शायद वो जवाब यह होगा कि  आपने महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए कितने मौके दिए?

स्त्री पुरुष की तुलना कभी करनी ही नहीं चाहिए

आपने महिलाओं को क्या क्या सिखाया? आपने उनको कितना सिखाया, आपने महिलाओं को आज़ाद रखा? आपने उसमें कितना आत्मविश्वास भरा और कितने अवसर दिए ताकि वह खुद को साबित कर सके कि हाँ, वह भी बेहतर है और बेहतरीन कार्य को अंजाम दे सकती है। स्त्री पुरुष की तुलना कभी करनी ही नहीं चाहिए। महिलाओं को आपने मल्टी टैलेंटेड के ख़िताब से नवाज़ा हुआ है, पर उस टैलेंट की क़द्र है आपको? ज़्यादातर पुरुषों को इस बात से कुछ लेना देना नहीं होता कि  महिलाओं की क्या अहमियत होती है। वे खुद को सबसे ज़्यादा शक्तिशाली और बलवान समझते हैं, जो एक गलत धारणा है।

असामनता में बदलाव की स्तिथि खुद के घर से शुरू करनी होगी

हमको बदलाव की स्तिथि खुद के घर से शुरू करनी होगी हमको देखना होगा हमारी माँ, बहनों, बेटिओं के साथ कहीं भेदभाव तो नहीं हो रहा? हमको समझना होगा की क्या यह जो असमानता का बीज है इसको हम पोषण प्रदान तो नहीं कर रहे। आपने कभी खुद के घर में शायद पुत्र होने के नाते हमने देखा होगा की कभी कभी दूध का गिलास या खाने ली प्लेट हमारी बहनों या हमारी बेटी के हाथों में न होकर हमारे हाथों में या हमारे बेटों के हाथ में देखा होगा।

मैंने अपने घर में देखा है असमानता का माहौल

मैंने अपने घर में देखा है असमानता का माहौल, मेरी माँ  हम सभी भाई बहनों से प्यार करती हैं, मगर मुझे बचपन के वो दिन याद हैं के जब मैं खुद को कोसता था कि मैं लड़का क्यों हूँ ? मेरी माँ मुझे खाना अपने हाथों से निकाल कर देती थी और मेरी बहन को खुद निकलना पड़ता था और वो भी तब , जब घर के सभी पुरुष खाना खा चुके होते थे।

मुझे वो समय आज भी काटने को दौड़ता है। मुझे तब भी यही महसूस होता था की यह तो गलत बात है, हम एक ही माँ की औलादें हैं फिर ये भेदभाव क्यों? मुझे आज भी यह बात समझ नहीं आती के पुरुषवादी समाज अपनी मानवतावादी सोच को कहाँ छोड़ आया है ? यह अत्यंत असंवेदनशील लगता है, यह ऐसा लगता है मानो समाज पर एक धब्बा लगा हो एक मैला सा निशान जो साड़ी व्यवस्था को उथल पुथल कर रहा है।

हम सब को असामनता के विरोध में आवाज़ उठानी होगी

हम सब को पुरुषवादी समाज के लिए विरोध में आवाज़ उठानी होगी। अब जब आप खुद के घर` में या बहार कहीं  भी असमानता का सुबूत देखें तो उसी समय उसको निपटाने की सोचे और लोगों को जागरूक करें बताएं कि आप एक अपराध कर रहे हैं, भेदभाव करना अपराध है।

बुद्धिजीवी वर्ग का एक बहुत बड़ा समूह भी रूढ़िवादी बनता जा रहा है

आप अपनी पत्नी बहन या बेटी को सबसे पहले शिक्षित करें। आज कल देखने को मिलता है की बुद्धिजीवी वर्ग का एक बहुत बड़ा समूह भी रूढ़िवादी बनता जा रहा है। किसी का बेटा पढ़ा हुआ है और सरकारी नौकरी  है तो उसके लिए दहेज़ की मांग की जाती है। लोग अपने बेटे की नौकरी के हिसाब से अपने बेटों की बोलो लगाते हैं। क्यों? यह बोली ही तो है?

आप अपने बेटों को बेच रहे हैं मगर यहाँ शिक्षा का कोई नामो निशान नहीं। आपने शिक्षा ग्रहण की और आपके बेटे ने भी शिक्षा ग्रहण कर के किसी भी कार्य में पारंगत होने के बाद उसकी जॉब किसी अच्छी जगह लग गयी या सरकारी नौकरी लग गयी इसका मतलब ये बिलकुल मत सोचियेगा की आपने अपने मस्तिष्क को शिक्षित किया है, नहीं! नहीं! बिलकुल भी नहीं। आप एक डिग्री होल्डर कहला सकते हैं मगर सही मायनो में शिक्षित नहीं।

कई ग्रामीण महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करने का शौक होता है

संपूर्ण भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा गाँव में रहता है और भारत का ७०% हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में ही वास करता है , तो क्यों न हम ग्रामीण क्षेत्रों से अपने आंदोलन की शुरुआत करें ? यहाँ पर आपको प्राकृतिक आपदाओं के कई सारे गवाह मिल जाएंगे और हर कोई पीड़ित ही नज़र आएगा। कई महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करने का शौक होता है पर कई महिलाएं इस बात से पीछे हटती हैं। हमें उन तक शिक्षा पहुंचनी है और फिर देखिये परिणाम।

हथकरघा, सिलाई बुनाई, कढ़ाई , अचार बनाना आदि यह सभी तथ्य वह हैं जिनसे हम औरतों को उनको खुद के पैरों पर खड़े होने के लिए तैयार कर सकते हैं। उनको आत्मविश्वास से भर सकते हैं, उनको यक़ीन दिला सकता हैं कि आपको घर के राशन तक के पैसों के लिए पति के सामने भीख मांगने की ज़रुरत नहीं, तुम खुद इस क़ाबिल हो के खुद कमा भी सकती हो और बच्चो को खिला भी सकती हो।

असमानता के रहते हर महिला को शोषण का सामना करना पड़ता है

हर महिला, खासकर भारतीय महिला चाहे वह वर्किंग हो या घरेलू हो कहीं न कहीं उसको शोषण का सामना करना ही पड़ता है, ऑफ़िस हो या घर। इसमें सबसे बड़ी भूमिका उसी पुरुष की है जो पितृसत्ता को बढ़ावा देता है। ऐसे समय में पुरुष होने के नाते आप अपनी सभी महिला मित्र और महिला रिश्तेदारों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। बस ज़रुरत है तो बस थोड़ी सी आशा की और प्रेरणा की और सबके साथ की।

हर कोई एक एक क़दम बढ़ाकर ही आगे बढ़ता है, यह जो महिलाओं के प्रति असमानता है ये कहीं न कहीं हमारे देश खोखला कर रही है। सबको आगे आना होगा और एक मुहिम चलानी होगी ताकि औरत कहीं पीछे न रह जाए। मेरा उद्देश्य है महिलाएं पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर चलें न कि घर की चार दीवारी में बंध कर बस एक कठपुतली बनें।

मूल चित्र : Canva   

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