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अब शादी की नयी परिभाषा लिखने का समय आ गया है…

शादी की बात करते ही याद आते हैं, फेरे, शहनाई, बाजे, खुशियाँ और भी न जाने क्या क्या... मन ही तो है न जाने क्या क्या सोच लेता है...

शादी की बात करते ही याद आते हैं, फेरे, शहनाई, बाजे, खुशियाँ और भी न जाने क्या क्या… मन ही तो है न जाने क्या क्या सोच लेता है…

शादी वह बंधन है, जो कसमों और वादों, वचन पर टिका होता है। और अगर शादी के बाद रिश्तों में यही सब तथ्य न हो तो? ख़ैर! यह तो बाद कि बात हुई।

शादी की ज़रुरत समझना ज़रूरी

न जाने कितने सालों से हर धर्म में विश्व के हर कोने कोने में शादी करने की प्रथा का चलन हर जगह है। लोग शादी करते हैं – एहसास बाँटने के लिए, पीढ़ी बढ़ाने के लिए, सहारा बनाने के लिए।

क्या वास्तव में ऐसा होता है? ज़रा दिल से पूछिए अपने, और जवाब आपके पास ही होगा। शादी का असली मतलब तो यही होता है कि आप किसी के दोस्त बनें, न कि मालिक। आप किसी को शोषित न करें, बल्कि उसका साथ दें। मगर इन बातों में कहाँ तक सच्चाई है, यह आपको समाज के मौजूदा हालात बता देंगे।

लड़कियों के लिए शादी की प्राथमिकता पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा क्यों?

अक्सर कहते सुना ही होगा ‘उम्र निकलती जा रही है, ज़्यादा हो गई तो कोई शादी नहीं करेगा!’ अरे! निकल गई तो क्या हो गया? शादी के बिना जीवन संभव है। बिल्कुल है। कुछ लोगों का मानना है लड़कियों की शादी करनी ज़रूरी होती है, क्योंकि समाज क्या बोलेगा? खानदान वाले क्या बोलेंगे? लड़की को माता पिता की मृत्यु के बाद कौन संभालेगा? उसका खर्चा कौन उठाएगा? बच्चे होना ज़रूरी हैं! एक सहारे की ज़रूरत तो पड़ती है!

उपरोक्त में से एक भी बात सार्थक नहीं है, मेरी नज़र में तो बिल्कुल नहीं। वास्तविक तौर पर देखा जाए तो समाज का एक एक व्यक्ति इस बात से सहमत नहीं होता, चाहे उनकी बेटी जला कर मार दी गई हो, या रोज़ाना वह अपने पति द्वारा शोषण की मूरत बनी हो।

एक आप बीती – शादी की ज़रूरत और उसके प्रभाव

दो लोग जिन्होंने प्रेम विवाह किया और दोनों ही चिकित्सक क्षेत्र से सम्बंधित थे। लड़की और लड़का दोनों अच्छा कमाते थे, बल्कि लड़की की सैलरी लड़के से कहीं ज़्यादा थी। दोनों में प्रेम पनपा, शादी हुई। बच्चे भी हुए।

“अंजली सुनो मुझे काम वाली आया पर भरोसा नहीं, वह आर्यन को कैसे संभालती होगी, हमारी ग़ैर मौजूदगी में? और मुझे उसके हाथ का खाना बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रहा।”

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“क्या हुआ विराज, तुमको तो यह शिकायत पिछले पांच सालों से नहीं हुई, आज क्या हुआ? सब ठीक तो है?”

तुम अपनी जॉब छोड़ सकती हो?”

“अरे! यह क्या बोल रहे हो? यू नो, दिस इज़ माय पैशन, नॉट ओनली जॉब।”

तुमको आर्यन की परवरिश और मेरे खाने की ज़रा भी फिक्र नहीं? तुम अपने काम को प्रायोरिटी दे रही हो? रही बात पैसे की तो मैं हूँ न? और फिर तुम्हारे पिताजी भी तुम्हें पैसे देने को हमेशा तैयार रहते हैं। तो मुश्किल किस बात की?” (यह पहला तोहफ़ा अक्सर लड़कियों को मिलता है, जिसे आप शादी कहते हैं)

“जब सब कुछ ठीक चल रहा है तो फिर इसमें इतना इशू क्यों क्रिएट कर रहे हो ? तुम खुद ही तो कहते हो , अपने आप खर्चे उठाओ अंजली, मैं अपनी कार की किश्तों और भी बहुत खर्चे उठाता हूँ। अगर जॉब छोड़ दूँगी तो यह सब घर का खर्चा कौन उठाएगा? आर्यन भी बड़ा हो रहा है विराज, ख़र्चे बढ़ेंगे ही।”

देख लेना क्या स्टेप लेना है, मैं ऑफिस के लिए लेट हो रहा, बाय!

यह एक छोटा सा दृश्य है जो एक कामयाब और पढ़ी लिखी लड़की होने के बावजूद यह सब झेल रही है।

“अंजली ! कैसी हो बेटा? इतनी सुबह कैसे फ़ोन किया? आज हॉस्पिटल नहीं गई?”

“हाँ, मम्मी ऑफिस नहीं गई विराज जॉब छोड़ने को कह रहा है। यह पॉसिबल नहीं है माँ, मैं यहाँ तक कैसे पहुंची हूँ आप तो जानती हैं न।”

“हाँ, मगर तू लड़ी तो नहीं उससे? तेरा पति है, ठीक ही कह रहा है। अच्छा तो है तू घर देख लेगी, और आर्यन को भी तेरी ज़रूरत है, बेटा।”

“मम्मी, आप भी वही बातें कर रहीं हैं, मैं यह जॉब नहीं छोड़ सकती। चलो अभी बाद में बात करती हूँ, विराज का फ़ोन आ रहा है।”

“हाँ, अंजली क्या सोचा?”

“सोचना क्या? मैं जॉब नहीं छोड़ सकती किसी भी क़ीमत पर, यह मेरा सपना है, मैं लोगों के लिए काम करूँ।”

“तो मतलब ज़िद पर अड़ रही हो तुम?”

“विराज ज़िद नहीं, मैंने अपनी एजुकेशन इसलिए नहीं कि ताकि मैं घर बैठ जाऊं, सब कुछ छोड़ छाड़ कर।”

“तो ठीक है जॉब और मेरे में से एक को चुन लो।”
( यह दूसरा तोहफ़ा, हमारी भारतीय नारी के लिए, जो शादी के बाद मिलता है, सोचो ज़रा क्या महसूस होता होगा?)

फोन कट जाता है, और अंजली हताश अवस्था में खड़े खड़े, कुर्सी पर बैठ जाती है। माँ को फ़ोन कर के सारी कहानी सुनाती है, और एक भावनात्मक सहारे की हवा को तलाश करती है, जो शायद उसने अपनी माँ से उम्मीद लगा रखी थी। सारी बातें सुन कर माँ का उत्तर आता है।

“बेटी, यह ख़तरे की घन्टी है, तुझे अपना घर देखना चाहिए। लोग क्या कहेंगे? पूरा खानदान थू थू करेगा! क्या करेगी? कहाँ जाएगी? अंजली पागल मत बन, तू तो बड़ी समझदार थी! और सबसे बड़ी बात बेटा, तेरे घर की शान्ति ज़्यादा ज़रूरी है। पैसे की तू चिंता मत कर। तेरे पापा हैं ना। तू परेशान मत हो। अपना परिवार सम्भाल बेटा, बिना आदमी के ज़िन्दगी नकारी हो जाती है, मुझको ही देख लो पूरे 30 साल हो गए रिश्ता क़ायम है, क्योकिं मैंने हमेशा तेरे पापा की बात मानी है, मैंने भी तो टीचिंग की जॉब छोड़ दी थी, इस रिश्ते को बचाने के लिए।” (यह बहुत आराम से तीसरा तोहफा है, ‘लोग क्या कहेंगे?’)

हम अगर ढूंढने निकलें तो ऐसे ना जाने कितनी ही अंजली हमको मिलेंगी और ऐसे ही विराज, जो पितृसत्ता के घोड़े पर बैठे हुए घोड़े की टाप से महिलाओं को कुचलने के लिए हमेशा तत्पर रहा करते हैं।

आज शादी की क्या ज़रुरत हो सकती है?

आजकल शादी के कई पहलू पहले की तरह सार्थक और उपयोगी नज़र नहीं आते। शादी के बाद, कभी किसी ने सुना होगा कि पुरूष अपनी पत्नी से प्रताड़ित है, अगर होगा भी, तो इसके पीछे एक मुकम्मल वजह होगी। मगर औरतों का शोषण करने के लिए उनकी सिर्फ यही ख़ता काफी है के वह औरत हैं। वह औरत हैं इसलिए दबाई जाती हैं। आजकल कई शादी बस एक फॉर्मेलिटी बन कर रह गई हैं, और इस फॉर्मेलिटी को निभाने के लिए, ना जाने कितने जीवन तबाह और बर्बाद हो चुके हैं।

शादी में दोस्ती और बराबरी का बंधन ज़रूरी है

शादी करो, मगर ऐसा बन्धन रखो जैसे एक दोस्ती में होता है, ऐसा एहसास हो जैसा लगे कि हम एक जिस्म और दो जान लगें, सहानुभूति हो, समानता हो,प्रेम हो वह भी निस्वार्थ। मगर आज के समाज में ऐसा होना नामुमकिन जान पड़ता है।समाज में शादी टूटने के कई कारण होते हैं, इन सब का एक ही आधार है असमानता का आधार।

शादी अभी भी निराधार नहीं है लेकिन…

शादी निराधार नहीं है, यह एक बहुत प्यारी और एक सार्थक इकाई है परिवार की, इसमें जब विश्वास और प्रेम का अभाव होता है तो समस्या खड़ी हो जाती है। जिस भी रिश्ते में अहम की प्राथमिकता आ जाती है वहाँ कोई भी रिश्ता ज़्यादा दिन तक नही टिका रह सकता। प्राचीन काल में हम और हमारा समाज रूढ़िवादी सोच की दलदल में फंसा हुआ था, अब तो आधुनिकता ने समय को बदल दिया, लोग खुद को समझदार समझने लगे, अब तो और इन रिश्तों में मज़बूती आनी चाहिए, मगर क्या करें आज भी लोग उसी विचारधारा में जीते हैं।

शादी का मूल रूप होता है समानता

शादी का मूल रूप होता है, समानता का नाम सबसे पहले, एक दोस्त जिससे किसी भी समय कोई सी भी बात साझा की जा सकती है, एक इंसान जिसके साथ आप अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ार सकते हैं। यह वास्तव में एक बहुत अच्छा एहसास है। बस! ज़रा गौर करने वाली बात यह है कि पति और पत्नी दोनों एक समान हैं, कोई ऊंचा नहीं और ना कोई नीचा। दोनों को स्पष्ट रूप से एक दूसरे का साथी बनना बेहतरीन ज़िन्दगी की शुरुआत हो सकती है।

मूल चित्र : Unsplash

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