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ये उन घुँघरुओं की बेबसी थी या कुछ और?

घुँघरुओं को पहन कर रुबिना बेहिसाब रोती हुई नाचने लगी, जैसे ही ज़मीन पर उसने अपनी एक छाप लगाई, वैसे ही अल्ताफ़ की आँखे खुल गईं। 

घुँघरुओं को पहन कर रुबिना बेहिसाब रोती हुई नाचने लगी, जैसे ही ज़मीन पर उसने अपनी एक छाप लगाई, वैसे ही अल्ताफ़ की आँखे खुल गईं। 

इलाहाबाद का मीर गंज, वही इक्के वाले की आवाज़, अजर शोर, पूरी गली में कोलाहल मचा हुआ है। तांगे वालों के घोड़ों की टाप, और ऊपर से तीन मंज़िल की कोठी, जो 70 साल पुरानी, वैसी की वैसी ही खड़ी है।

ज़रकन बाई की कोठी का नाम भी बड़ा अनोखा है, ‘रोग़न की फुलवारी’,  नाम अजीब है न? हाँ! मगर है बड़े ही मान और मतलब वाला। रोग़न का मतलब होता है, सारा रस, और फुलवारी, मतलब फूलों का जमघट। तो इससे तो यही मतलब बनता है ‘रस वाले फूलों की क्यारी’।

ख़ैर! नाम में क्या रखा है। ज़रकन बाई, इलाहाबाद के मीर गंज की सबसे मशहूर तवायफ रहीं, अपने ज़माने की, और आज उनकी हवेली पर 20 अदद ख़ूबसूरत और हसीन लड़कियों का जमावड़ा है। ज़रकन बाई तो बस अब लड़कियों को नाच सिखाया करती हैं, और कुछ एक को गाना भी।

“अरि निगोड़ मारी मेरी छालिया (सुपारी) तो देती जा, ला मेरा पानदान उठा कर यहीं रख”, ज़रकन बाई ने चिल्ला कर रुखसाना से कहा।

“अरे आपा, चीख़ो तो मत ला रही हूँ, इसके बाद रोकने न लगना, आज लखनऊ से चावल आये हैं, जद्दन मियाँ का, वही लेने जा रही हूँ।”

ज़रकन बाई – ” अरे! वो कम्बख़्त मूआ, एक ज़र्रा नहीं देगा, कंजूस कहीं का।”

रुखसाना – ” जाने तो दो, आपा, तुम बैठी बैठी बस कुछ भी बक देती हो।”

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ज़रकन आपा, 65 साल की, शरीर से स्थूल, घुटनों में दर्द, और बाल बिल्कुल सफ़ेद, और लंबा ग़रारा वो भी सुर्ख़ रंग का, ऊपर से छोटी में लाल रंग के रिबन से गुंथी हुई लंबी चोटी, और होंठ, पान से लाल किए हुए। उनका हुलिया किसी को भी भावविभोर करने का दम रखता था, और आवाज़ में एक खनक के साथ एक रौब, उनकी आवाज़ यह दर्शाती थी के मानो कह रही हो, जीना है तो अपने दम पर, मर्दों की किसको ज़रूरत। ज़रकन नाम भी , ज़रकन के पत्थर की वजह से नाम भी बिल्कुल चमकता हुआ। चेहरा भी खूबसूरत।

“लो पूरे 2 पसेरी(10 किलो) चावल लाई हूँ।”

“वाह री लौंडिया, तू तो सवा शेर निकली”

“जा, ज़ेबा को बुलाकर ला। उसके घुँघरुओं की आवाज़ सुनने का मन कर रहा है, अल्ताफ़ मियाँ तो रास्ता ही भूल गए।”

“जी, आपा कहिए।”

ज़ेबा का कौन दीवाना नहीं होगा। पूरे शहर में उसकी ख़ूबसूरती के चर्चे आम थे। अल्ताफ़ मियाँ अपनी बीवी को छोड़कर आए दिन ‘रौग़न की फुलवारी’ में अपना डेरा जमाए रखते थे। यहाँ आना जाना तो पहले से ही था, अब्बा ने शादी कर दी, वो भी ज़बरदस्ती। तो ऐसे में जब ज़ेबा जैसी लड़की सामने हो तो कोई और लड़की किसी को कैसे भाती?

ज़ेबा, और अल्ताफ़ एक दूसरे के बिना कभी नहीं रह सकते। ज़ेबा के घुँघरुओं की आवाज़ को वो कई मीटर की दूरी से ही समझ लेता था, के आज की शाम ज़ेबा अपना नृत्य पेश कर रही है। उसका नाच और साथ में ज़रकन बाई की मीठी तान, किसी को भी मंत्रमुग्ध करने का दम रखती थी।

ज़ेबा और अल्ताफ़ ये नाम पूरे इलाके में मशहूर हो गए। बात अल्ताफ़ की बेग़म रुबिना तक भी गयी, अब कोई कैसे बर्दाश्त करे, अपने शौहर को किसी और का दीवाना बने हुए। उसने नक़ाब डाला और इक्के पर सवार हो कर निकल पड़ी, ज़रकन बाई के बंगले पर। उसने ज़ेबा को ख़ूब खरी खोटी सुनाई, सारा बाज़ार रुक कर तमाशा देखने लगे।

रुबिना – “तुम तो बाज़ारू औरत हो और हम शरीफ़ ख़ानदान के लोग, अपनी औक़ाद की हद में रहना ज़ेबा, तुम्हारे लिए बेहतर रहेगा”

ज़ेबा – “हद में आप अपनी ज़ुबान को रखिये रुबिना बेग़म, हम मोहताज़ ज़रूर हैं मगर बग़ैरत नहीं, अपने अल्फ़ाज़ वापस लो और जाओ इस बाज़ार से, कहीं तुम्हारे नाम के साथ भी बाज़ार न जुड़ जाए।”

रुबिना – ” तेरे यहाँ रहने नहीं आयी, बल्कि तेरी अक्ल ठीकाने लगाने आई हूँ। जा रही हूँ मगर ज़ुबान याद रखना।”

बात यहीं तक ख़त्म नहीं हुई, जब ये बात अल्ताफ़ को पता लगी तो उसने बिना कुछ जाने समझे रुबिना को तलाक़ दे दिया, और घर से दस्तबर्दार (निष्काषित) कर दिए जाते हैं, फिर आख़िरी में बचता है बस ज़रकन बाई का बंगला। बेचारे अल्ताफ़ मियाँ अपना से मुंह लेकर आकर बरामदे में बैठ जाते हैं, और सारी आपबीती सुना देते हैं, ज़रकन बाई दिल की नाज़ुक थीं, मगर ज़ुबान की उतनी ही कड़वी।

ज़रकन बाई – “क्यों मियाँ? शक़्ल पर बारह क्यों बज रहे हैं ? फाख़्ते उड़े उड़े लग रहे हैं। जब पड़ी हलवाई की डांट, तब याद आई घर की चाट। भगा दिए गए मियाँ? चलो अच्छा है, ज़ेबा का दुखड़ा सुनने वाला कोई तो है। जा, अंदर जा, खाना पीना कर सुबह बात करते हैं।”

बरामदे के बराबर वाले तहखाने में वो जाकर सो जाता है।

भोर में सारी कहानी ज़ेबा को पता लगती है, उसने अल्ताफ़ को घर जाने की बात बहुत समझाई, बहुत कुछ कहा, मगर अल्ताफ़ के कानों में जूं तक न रेंगी। ख़ैर! पूरा दिन बस दोनों का रोते रोते बीता। इधर ज़ेबा रोई और उधर रुबिना। दोनों की परेशानी की एक वजह थी और वो, नहीं नहीं, अल्ताफ़ नहीं, समाज में फैला पुरुषवाद।

अल्ताफ़ पर कहीं न कहीं पितृसत्ता की परछाई घर करती जा रहीं थी। ज़ेबा को ख़ुद पर तो इख़्तियार था, मगर अल्ताफ़ पर तो बिल्कुल नहीं रहा, जब उसने अपनी बीवी को तलाक़ दे दिया। 7 सालों की शादी 2 महीने की दोस्ती पर क़ाबिज़ आ गई? ऐसे कैसे? जबकि उसके 2 बच्चे हैं, उनका भी ख़्याल नहीं? मर्दों के लिए हुस्न इतना मायने रखता है? उनको गोरी चमड़ी दिखती है? ज़िन्दगी के गुज़ारे हुए पल नहीं? बड़ी ही शर्मनाक बात है।

“मैं अल्ताफ़ से मोहब्बत करती हूँ, मगर ये नहीं चाहती कि किसी औरत का घर उजड़े, हमारा तो कोई होता नहीं, मगर जो औरतें पहले दर्जे की मानी जाती हैं, जिनके शौहर होते हैं, बच्चे और परिवार भी, उनका बर्बाद होना? नहीं नहीं, मैं यह क्या करने जा रही हूँ। मुझे आज इन घुँघरुओं से नफ़रत हो रही है, यही वो घुंघरू हैं जिनकी झनकार मेरे क़दमों से पामाल होकर अल्ताफ़ के कानों में अपना निशाँ छोड़ आई, या ख़ुदा! मैं तो गुनाह में मुब्तेला हो जाऊंगी। नहीं, मैं अल्ताफ़ को एक पल भी यहाँ नहीं रुकने दूंगी। मेरा क्या? आज यहाँ और कल कहीं और। रुबिना का क्या होगा?”

ऐसे ही न जाने कितने सवालों के घेरे में क़ैद ज़ेबा, पितृसत्ता के घने जंगल में खोई हुई एक औरत की तरह इधर उधर भटकने लगी, जिसे कोई रास्ता नहीं मिल रहा हो। उधर अल्ताफ़ अपने हुक्के की गुड़गुड़ से सोच रहा था, की ज़ेबा को कैसे समझाऊं, रुबीना मेरे लायक नहीं, मुझे तो बस ज़ेबा चाहिए, और उसके घुँघरुओं की आवाज़। वाह! क्या धनक है। असल में अल्ताफ़ किसी ज़ेबा को नहीं बल्कि उसके हुस्न का भूखा था। उसकी ललक उन घुँघरुओं के लिए बेताब थी, मगर क्या करता। ज़ेबा ने ठान ली थी, उसको हमेशा के लिए छोड़ देने की।

जैसे तैसे रात हुई, आँगन के बाहर दुशाला ओढ़े एक ख़ातून, बरामदे की तरफ़ बढ़ती आ रही थी, और ज़ेबा मेहराब से उस को निहारे जा रही थी, और सोच रही थी इस वक़्त कौन होगा? पाज़ेब की झंकार और रुपहले रंग की दुशाला, ज़ेबा की धड़कनों को झकझोर किए जा रही थी। शख्शियत और क़रीब आई, और मेहँदी से भरे हुए हाथ, और टूटी हुई चूडियों के टुकड़े लेकर वो सीधे ज़ेबा के पास आई, उसने ज़ेबा को देखा, मगर अपना चेहरा छुपा रखा था, ज़ेबा ने दबे अल्फ़ाज़ों में बोला

“कौन?”

“मैं हूँ वही बदकिस्मत, जिसके घर की रोशनी तुमने चुरा ली है, जिसकी क़िस्मत की झोली में तुमने बर्बादी डाल दी। ज़ेबा मैंने तो तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा था, आज बस अल्ताफ़ के एवज़ तुमसे कुछ माँगने की गुज़ारिश लेकर आई हूँ।”

“रुबिना? आओ अंदर आओ, बोलो क्या चाहती हो? मेरी बहन।”

“बहन कैसी?, कोई बहन किसी बहन की मांग नही उजाड़ती।”

“ऐसी बात नहीं है, मेरी बात तो सुनो।”

“मुझे बस तुमसे तुम्हारे घुँघरू चाहिए, क्या दे सकती हो मुझे? वही है ना सारे फ़साद की जड़?”

ज़ेबा उन घुँघरुओं से नफ़रत करने लगी थी, और यह सुनकर सकपका गई, “लो, यह तुम्हारी अमानत हुई, तुम न लेती तो मैं ख़ुद इसे कहीं फिकवा देती। रुबिना सुनो! मैं कुछ भी नहीं तुम्हारे सामने, तुम उसके निकाह में थी, मैं तो बस एक नाचने वाली। तुम्हारी अमानत अल्ताफ़ है, ये घुँघरू तो मेरी विरासत हैं, तुम इसका क्या करोगी?”

“ज़ेबा, मैं इसको पहन कर अपनी बर्बादी का सोग मनाऊंगी।, नाचना चाहती हूँ इसको पहन कर, इसे आँगन में और अभी, के अभी।”

घुँघरुओं को पहन कर रुबिना बेहिसाब रोती हुई नाचने लगी, जैसे ही ज़मीन पर उसने अपनी एक छाप लगाई, वैसे ही अल्ताफ़ की आँखे खुल गईं, और वो भागता हुआ, आँगन की तरफ बढ़ा, और अंधेरे में उसे बस घुँघरुओं की आवाज़ सुनाई दे रही थी। बादलों की चादर ने वैसे भी चाँद की चाँदनी को अपने में समेट लिया था, अल्ताफ़ नींद में था, और बस उस क़दम को निहार रहा था, जिन पैरों में वो घुँघरू बंधे थे, उसको उस वक़्त उन क़दमों की झंकार ही महसूस हो रही थी।

वो ज़मीन पर रेंगता रेंगता उन क़दमों के आगे बिछ गया, यह देख कर रुबिना बिखर पड़ी और बोलने लगी, “लो ज़ेबा, तुम्हारा आशिक़ आज मेरे क़दमों की धूल में बिछा हुआ है, इसको इन घुँघरुओं से प्यार है, और किसी से नहीं।”

आवाज़ सुन कर अल्ताफ़ चौंक गया। उठकर एक थप्पड़ रुबिना को मारते हुए बोला, “बदज़ात तू यहाँ? तेरी हिम्मत कैसी हुई?”

पीछे से ताली की आवाज़ के साथ ज़ेबा बोल पड़ी, “अय्याशियों की मैंने हर हद देखी, मगर ऐसी हद तो पहली बार देखी, ऐसी कैफ़ियत? वाह अल्ताफ़ वाह।” और एक ज़ोरदार तमाचा रसीद करते हुए बोली, “तू किसी भी औरत के लायक नहीं, तुझे ख़ुदा ने तड़पने के लिए पैदा किया है, तू न तो उसका हो सका, और न मेरा, रुबिना, घुँघरू उतारो।”

रुबिना घुँघरू उतारते हुए ज़ेबा से बोली, “बस मुझे इस घुँघरू की औक़ाद बतानी थी तुमको, के एक बेजान सी चीज़ तुम्हारी मोहब्बत के आगे जीत गई, लो तुम्हारी अमानत। मैं अब इस शख्श की शक्ल तक नहीं देखूंगी, और इसको कभी माफ़ भी नहीं करूंगी, मगर तुम अपना ख़्याल रखना ज़ेबा, मेरे अल्फ़ाज़ों के लिए माफ़ी।”

घुँघरुओं को उठाते हुए, ज़ेबा अल्ताफ़ के हाथ को अपनी तरफ खींचते हुए उसकी हथेली पर वही घुँघरू रख कर, दरबान को बोलती है, “भगाओ इस अय्याश को, इस दरवाज़े पर ये दोबारा न दिखे। और हाँ, हो सके तो ये घुँघरू इसके पैरों में बेड़ियों की तरह डाल देना।”

अल्ताफ़ के पास अल्फ़ाज़ों का कोई ज़ख़ीरा नहीं था। अफ़सोस! उसके हाथ न दुनिया लगी और न आख़ेरत।

मूल चित्र : Canva 

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