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वैश्या या वैश्यावृति, सुनकर मन में उठते सवाल, क्या हैं इनके कारण, नियम और कानून?

Posted: अप्रैल 14, 2020

भारत और ना जाने कितने ही देशों में वैश्या और वेश्यावृत्ति आदिकाल से ही परिलक्षित रही है, भारत के इतिहास में वेश्याओं के कई रूप देखने को मिलते आ रहे हैं।

‘सेक्स वर्कर’ नाम सुनकर अक्सर लोगों को बुरा लगता है। लोग मुँह छिपाने लगते हैं। जबकि वह खुद इसके ज़िम्मेदार हैं। वैसे तो भारत में वेश्यावृत्ति वैध है, मगर उनकी ज़िंदगी के कुछ पहलू ऐसे हैं, जिनको समाज अवैध क़रार देता है। क्या कभी किसी ने सोचा है? या कभी गहराई में जाकर देखा है, कि उन महिलाओं के पीछे की छवि क्या रही होगी? वो कौन से हालात थे जिन्होंने उनको इस दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया जहाँ से सिर्फ दो ही रास्ते निकलते हैं, एक है हवस का और दूसरा लाचारी बेबसी, भूख और भी न जाने क्या क्या।

भारत और ना जाने कितने ही देशों में वेश्यावृत्ति आदिकाल से ही परिलक्षित रही है। भारत के इतिहास में वेश्याओं के कई रूप देखने को मिलते आ रहे हैं। अजंता की गुफाओं की कई आकृतियां यह तथ्य बताती आई हैं, और शुरुआत से ही इनके गीत संगीत का परिचय हमारे सामने से गुज़रता हुआ कई सदियों से चला आ रहा है। मुग़ल काल के महलों से आती हुई घुंघरुओं की झंकार हमें बताती आई है के वेश्याओं और वेश्यावृत्ति का प्रचलन आम था।

वैश्या : गीत संगीत नृत्य से जिस्मफरोशी का सफर

प्राचीन भारत में पहले यही रिवाज़ हुआ करता था जैसे किसी शादी-ब्याह में या किसी और मौके पर नाचने वालियों और गाने वाली औरतों को बुलाया जाता था। यह उस समय की बात है जब संचार का कोई ऐसा साधन मौजूद नहीं था जिससे मनोरंजन हो सके। लोग मनोरंजन के लिए इनका नृत्य, संगीत, गायन सुनना पसंद करते थे। मगर 17 वीं शताब्दी के बाद दुनिया में यह बदनाम होना शुरू हुआ जब भारत ब्रिटिश के अधीन था तब अंग्रेजों ने इनके गीत और संगीत से कोई सरोकार ना था, उन्होंने इनका शारीरिक शोषण, करना शुरू किया। किसी भी समय वह उनके शरीर पर से कपड़े का एक टुकड़ा तक नहीं रहने देते थे। उस समय ही इसके लिए बोलियों का चलन चल पड़ा जैसे “गन्दा है पर धंधा है” आदि।

कुछ समय बाद यह बात आम हो गई और महिलाओं ने अपनी लज्जा और संकोच को त्यागकर अपनी जीविका कमाने का चलन चला लिया। महिलाएं अब गाने और नृत्य के लिए नहीं बुलाई जाती थी बल्कि अपने शरीर के लिए बुलाई जाती थीं। महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जो आर्य समाज के संस्थापक भी थे, उन्होंने इस प्रथा का घोर विरोध किया था। एक बार की बात है, जोधपुर के राजा महाराज यशवंत सिंह के दरबार में दीपावली के दिन उन्होंने वहाँ नन्ही नाम की वेश्या को देखा और महाराज को समझाया के वह इस घोर पाप से दूर रहें और महाराज ने उनकी बात को मान लिया। परन्तु यह बात नन्ही को नागवार गुजरी और उसने स्वामी दयानंद जी की हत्या करवा दी। यह भी एक प्रभाव का हिस्सा रहा कि वेश्यावृत्ति को जड़ से उखाड़ फैंकने का इरादा सबका टूट चुका था।

वेश्यावृत्ति के कारण

यों तो इस क्षेत्र के पनपने के अनन्य कारण हैं। मगर जब हम इसकी गहराई में जाकर निरीक्षण करते हैं तब देखते हैं कि इसके प्रमुख दो कारण इस जाल को फैलाने में अपना योगदान देते हैं, और शुरू करते हैं एक ऐसी ज्वाला जो कई सदियों से जलती आ रही है, जिसको बुझाने वाला कोई नहीं।

समाजिक कारण

किसी भी महिला का दिल नहीं चाहेगा कि वह खुद चलकर वेश्यावृत्ति के मुहाने पर आकर कहे, “मुझे वेश्या बनना है।” ऐसा कभी नहीं हो सकता। समाज में फैली कुप्रथाएं जैसे विधवा जीवन, अनमेल विवाह, घरेलू हिंसा, महिला के प्रति असमानता आदि, यह वह तथ्य हैं जो वेश्यावृत्ति को पोषकता प्रदान करते हैं। और एक दूसरी वजह है महिलाओं के सामने, एक ऐसी समस्या, जिसका उसके पास कोई रास्ता नहीं और वह है उनकी अपनी कामुकता, उनकी अपनी वासना प्रक्रिया, जिसको संतुष्ट करने के लिए भी कई बार उन्हें खुद इस कृति का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे ही पुरुष अपनी शारीरिक तृष्णा को संयमित नहीं करते और वेश्यालयों का रुख़ करते हैं। भारत का लिंग अनुपात भी इस समस्या के लिए जिम्मेदार है। पुरुषों की संख्या से महिलाओं की संख्या अधिक होने के कारण युवा पुरुष इस वेश्यालयों की तरफ आकर्षित होते हैं।

समाज में महिलाओं को एक वस्तु के रूप में देखा जाता है। जिन महिलाओं ने यौन सम्बंध बना लिया या उनका अनुभव किया तो उनको ‘सेकंड हैंड माल’ कहा जाता है या फिर ‘इस्तेमाल किया गया माल’ माना जाता है। यह कैसी अजीब सोच है और इस सोच और वाक्यांशों पर मुझे तरस आता है कि हमारे देश से नैतिकता कहाँ जाकर छुप गयी है, किस अंधकार में खो गई?

अगर महिला की शादी हो गई और उसका पति मर गया तो सोचिए उसका क्या हाल होता होगा? विधवा या तलाकशुदा महिलाओं को भी इस सामाजिक कलंक का हिस्सा बनाया गया है।

भारतीय वैश्या और वेश्यावृत्ति में गरीबी की भूमिका

भारत की सबसे चरम पर इस समय भौतिक गरीबी है। भारत की अनुमानित 40% आबादी गरीबी में रहती है।इस का मतलब है कि लगभग 400 मिलियन लोग खाना, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी वस्तओं से भी काफी दूर हैं।

गुजरात के वाडिया जिला विश्वभर में सिर्फ इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि वहाँ पर उनके पिता और भाई खुद उनको बेचते हैं, ग्राहक उनके घर आते हैं। यह कितनी असभ्य बात है। नैतिकता से परे। मगर यह बात विचार करने योग्य है कि ऐसे कौन से हालात होंगे जो उनको इस प्रकार का कदम उठाना पड़ा। निर्धनता भारत में कई सालों से विराजमान है और कई प्रकार की समस्याओं की जननी भी है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा एकत्र डेटा जो IPC इंडियन पैनल कोड के तहत आने वाले अपराध जो प्रमुख तौर पर वेश्यावृत्ति और मानव तस्करी से संबंधित है, कहता है कि

• नाबालिग लड़कियों को लाना (धारा 366-ए आईपीसी)

• लड़कियों का आयात (धारा -366-बी आईपीसी)

• वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की बिक्री (धारा -372 आईपीसी)

• वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की खरीद (धारा -373 आईपीसी)

•अनैतिक तस्करी (रोकथाम) अधिनियम 1956

इन धाराओं के अंतर्गत आने वाली समस्याओं का सरकार ने हल निकाला हुआ है, जिससे किसी भी प्रकार का शोषण न हो सके।

वैश्या या सेक्स वर्कर्स और उनके महत्वपूर्ण अधिकार

भारत में, कानून उद्योग पर ही अस्पष्ट है। मुख्य रूप से यौनकर्मियों के साथ सीधे तौर पर काम करने वाला कानून 1956 का इम्मोरल ट्रैफिक (दमन) अधिनियम है। इस अधिनियम के तहत, वैश्या या यौनकर्मी निजी तौर पर अपने पेशे को करने के लिए आज़ाद हैं।

विशेष रूप से, 1956 का इम्मोरल ट्रैफिक (दमन) अधिनियम के अंतर्गत सामान्य श्रम कानूनों के तहत, यौनकर्मियों को सुरक्षा जाती है, लेकिन अगर वे चाहें तो पुनर्वास और बचाव का अधिकार रखते हैं। एक वैश्या या सेक्स व्रकर्स को भी अपने जीवन जीने का पूरा हक़ है, जैसे और आम नागरिकों को।

संशोधन अधिनियम 1956 अनैतिक व्यापार रोकथाम में प्रस्तावित – ITPA

1986 में 1956 अधिनियम से अनैतिक यातायात (रोकथाम) अधिनियम में संशोधन किया गया था। संशोधन इसलिए किया गया था क्योंकि भारत को 1950 में तस्करी के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र की घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करना था। इस अधिनियम को पहले ऑल इंडिया दमन ऑफ इम्मोरल ट्रैफिक एक्ट (SITA) के रूप में माना जाता था। भारत में वेश्यावृत्ति को सीमित करने और खत्म करने के लिए अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम लागू किया गया था।

निम्नलिखित आईटीपीए अधिनियम के प्रमुख बिंदु हैं:

यौनकर्मी

कानून उन यौनकर्मियों के विरोध में है जो ग्राहकों को बहकाते हैं। और साथ के साथ, वैश्या या कॉल गर्ल को अपने फ़ोन नंबर पब्लिकली शेयर करने से रोक दिया जाता है। इसी तरह हिंसा करने वालों को 6 महीने तक की कैद हो सकती है और ज़ुर्माना भी लगाया जा सकता है।

ग्राहक

एक ग्राहक से जुर्माना लिया जा सकता है यदि वह किसी सार्वजनिक क्षेत्र में 200 गज के भीतर एक किसी वैश्या या सेक्स वर्कर की सेवाएं लेता है तो उसे 3 महीने तक की कैद हो सकती है।

दलाल

जो लोग वैश्या हैं या सेक्स वर्कर से जीविका कमा रहे हैं, वे इस अधिनियम के तहत दोषी हैं। एक वयस्क पुरुष जो स्थायी रूप से एक यौनकर्मी के साथ रह सकता है जब तक कि दोनों की स्वीकृति हो। अगर इसके बिना वह किसी वेश्या को प्रताड़ित नहीं कर सकता। और ऐसा करते हुए पाया जाता है तो उसको 6 महीने की क़ैद हो सकती है।

ख़रीद फ़रोख़्त करना

कोई भी व्यक्ति जो किसी दूसरे व्यक्ति को खरीदने या बेचने का प्रयास करता है, उसे दंडित किया जा सकता है। यह भारत दंड सहिंता के अंतर्गत आता है।

और अंत में हम सब यही प्रण ले सकते हैं कि महिलाओं को महिलाएं ही समझें। वह कोई वस्तु नहीं हैं। उनके पास ह्रदय है। उनको सम्भालने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर ही है। अनैतिकता के कुएँ में समा चुकी कई महिलाएं, जो आज वेश्या कहलाती हैं, उनको भी पुनर्वास का मौका दिया जाना चाहिए। कई ऐसी भी होंगी जो अपना जीवन नरक से भी ज़्यादा भयावह स्तिथि में गुज़ार रही होंगी। जीवन बहुत छोटा है, एक पानी के बुलबुले की तरह, बस याद रखिए सबको प्यार देना है और इज़्ज़त भी।

हाए! जलती हुई हसरत ये तिरी आँखों में
कहीं मिल जाए मोहब्बत का सहारा तुझ को
अपनी पस्ती का भी एहसास फिर इतना एहसास
कि नहीं मेरी मोहब्बत भी गवारा तुझ को

-मुईन अहसन जज़्बी

मूल चित्र : Bollywood movie Begum Jaan

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