Aarti Ayachit

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क्या माता-पिता को अपनी ज़िंदगी की तुलना अपने बच्चों की ज़िंदगी से करनी चाहिए?

हम बच्चों की ज़िंदगी की तुलना अपनी ज़िंदगी से कभी नहीं कर सकते और न ही अपेक्षा कर सकते हैं। इस नए परिवेश में जीना आज उनकी आवश्‍यकता हो गई है। 

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ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव में ऐसे रंग लाई हमारी दोस्ती

सखियां सोच रही थी कि शीतल से जब भी हम मिलते है तो ऐसी उदास नहीं रहती, चेहरा भी काला दिख रहा और ऑंखो में लाली छाई है, देखकर लग रहा है मानो कितना रोई हो।

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वो अनमोल पल नवोदय के – नई राह नई रौशनी!

पर जिंदगी में राहें कभी खत्म नहीं हुआ करतीं, हर अंधेरे के बाद एक नई रोशनी अवश्य ही जन्म लेती है, मेरे सपने ने जीवन की प्रकाश रूपी राह चुन ली है। 

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क्षणिक जीने दो ये प्यार भरे पल – नई पीढ़ी, नई दुनिया, नई सोच

जब तक आपके साथ रह रहे हैं, हम बहन-भाई को, आपके प्‍यार एवं स्‍नेह के ऑंचल तले खुशनुमा माहौल में क्षणिक जीने दो ये प्‍यार भरे पल

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रंग लाई है दोस्ती

एक सुंदर वीणा जो मन में तान छेड़ती, लगता है दोस्त अपने बारे में बात कर रहे, इसका ही मतलब है, दोस्ती!

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बचपन की ऐसी सखी की याद जो सिखा गई ज़िंदगी जीने का जज़्बा

मेरी यादों के बसेरे में एक बात अवश्‍य ही जुड़ गई दोस्‍तों, ज़िंदगी जीने का नाम है, मुर्दादिल क्‍या ख़ाक जिया करते हैं।

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एक ही स्थान पर संवर रही है बच्चों एवं महिलाओं की ज़िंदगी

आज के दौर में ऐसी महिलाएँ भी हैं, जो समाज की भलाई के लिए कुशलतापूर्वक कार्य करने में सक्षम हैं, यह तारीफे काबिल तो है ही, साथ ही आश्चर्यजनक भी। 

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बांझपन के लिए केवल औरत ही दोषी है ?

इस समाज में बांझपन के लिए क्या अकेली औरत ही दोषी है? साथ ही साथ यह भी सोचा जाना चाहिए कि क्या औरत ही औरत की दुश्मन हो सकती है?

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महिलाओं के आपसी सहयोग से बदली गाँव ग्वाडिया की तस्वीर

गांव ग्वाडिया की महिलाओं के आपसी सहयोग से परिस्थितियों में परिवर्तन लाने की कोशिश यूँ कामयाब रही। 

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अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना आवश्यक

अन्याय सहना भी एक घनघोर अपराध है, जिससे हमें ही बाहर निकलना होगा, प्रकाश रूपी इस शक्ति को हमें ही अपनी पूरी ताकत से, सब जगह जगमगाते हुए फैलाना होगा।

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बहुत हुआ धैर्य एवं संयम का बांध,अब और नहीं महोदय!

इतनी तन्मयतापूर्वक कार्य करने के बाद भी आप संतुष्ट नहीं हैं। आपको सिर्फ काम से ही मतलब है और घरवालों को पैसा से।

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प्रीती सुख का स्वागत, भावों के नाद मधुर सुर ताल के साथ

दोनों की समागम भावनाओं से होगी रस बरसात, बुनियादों का कर त्याग हमें करना कुरितियों का हनन, गर तुम निभाओ साथ मेरा सुखद होगा ये नवजीवन

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बहु की अच्छाई कभी भी नहीं दिखाई दी?

सुबह हुई नहीं कि सबकी फरमाइशें शुरू हो गईं। किसी को चाय तो किसी को स्पेशल कुछ। किसी को न दीपू से मतलब और ना ही रागिनी की नौकरी से।

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जिंदगी की प्रताड़ना से बाहर निकलना आवश्यक

हे नारी ज़िंदगी की हर प्रताड़ना को अंदर से निकाल, तू बाहर निकल स्वच्छंद बना अपनी पहचान, एक मिसाल कायम कर बन परिवार व देश की ढाल।

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ये दहेज प्रथा कब तक चलेगी?

हम नवचेतन युग के नवयुवक हैं मां, ये दहेज प्रथा कब तक चलेगी? इस पर अंकुश लगाने के लिए हमें ही कदम बढ़ाना होगा।

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ससुराल में पहला दिन और रस्मों की कुछ खट्टी-मीठी यादें

ससुराल में पहला दिन'-ये शीर्षक पढ़कर मुझे अहसास हुआ कि ये दिन, किसी भी नई बहु के लिए एक परीक्षा से कम नहीं।

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नारी तेरी सदैव ही परीक्षा

इन सबके पश्चात बाबुल, आएगा ज़िंदगी का तीसरा-अंतिम पड़ाव, अंतिम पड़ाव ना समझ, बढ़ाऊंगी आगे कदम, मिलेगी नई दिशा, क्योंकि यह जीवन ही है, सदैव नारी की परीक्षा

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काश ऐसा हो कि हम अपने आप से हमेशा प्यार करें

काश कि हर महिला यह समझ पाती कि वह सिर्फ एक देह नहीं बल्कि बुद्धि‍, बल, विवेक का भंडार भी है। देह समाहित है हम में, हम देह में नहीं। 

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गर्मी की छुट्टियों में अपने बच्चों को देख लेने दो खुला आसमान

अपने बच्‍चों को उनके अरमानों को पूरा करने का एक मौका अवश्‍य दीजिए, तभी वे आत्‍म-निर्भर बनकर जिंदगी की परीक्षा में पूर्ण रूप से पास हो सकेंगे।

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