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Aarti Ayachit

मुझे लेख, कविता एवं कहानी लिखने और साथ ही पढ़ने का बहुत शौक है । मैं नवोदय विद्यालय समिति, क्षेत्रीय कार्यालय, भोपाल ( केन्द्रीय सरकार के अधीन कार्यरत एक स्वायत्त शासी संस्थान) की पूर्व कर्मचारी रही हूं । कार्यालयीन अवधि में हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी पखवाड़ा के तहत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसे निबंध, भाषण, वाद विवाद एवं कविता पाठ में हिन्दी अधिकारी एवं उपायुक्त महोदय द्वारा पुरस्कृत भी किया जा चुका है । एकता की जान है हिन्दी , भारत देश की अस्मिता है हिन्दी । हिन्दी दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए सभी समूहों पर अपनी लेखनी के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत करने का एक छोटा सा प्रयास कर रही हूं । सेवा में धन्यवाद प्रस्तुति ।

Voice of Aarti Ayachit

शादी करना कोई गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं

युवा अक्सर अपने मन मुताबिक फैसला लेते हैं, लेकिन कुछ फ़ैसले ऐसे होते हैं जिनके लिए अपने परिवार वालों के साथ विचार-परामर्श करने में ही समझदारी है।

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वो मुलाकात एक अजनबी परिवार के साथ

हर माता-पिता को चाहिए कि वे इस तरह से अपने बच्‍चों को सकारात्‍मकता के साथ समझाएँ कि सब अजनबी बुरे नहीं होते, सिर्फ उन्‍हें सही परखने की जरूरत है।

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बच्चों को सिर्फ मंजिल ही नहीं सही राह दिखाना भी आवश्यक है

वर्तमान के दौर में माता-पिता से ये अनुरोध है कि अपने बच्‍चों को चाहे बेटा हो या बेटी घर या बाहर की सभी अच्‍छी-बुरी बातों से वाकिफ ज़रूर कराएं।

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बच्चों की नैतिक शिक्षा घर से हो शुरू करें

आज ज़रूरत है कि माता-पिता अपने बच्चों को आवश्यक रूप से समय देते हुए उन्हें प्रारंभ से ही अच्छा-बुरा, सही-गलत इत्यादि के बारे में नैतिक शिक्षा अवश्य दें। 

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यहां सिसकियों का कोई मोल नहीं …

वे लोग कैसे जानेंगे जो इंसानियत के पुतले बनकर, सिसकियों को नाटक कहते हैं, ऐसे लोगों से करती हूं निवेदन, हम हर उस शख्स का करें उत्साहवर्धन!

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आशारूपी दीपक

धूप-छांव के उतार-चढ़ावों को, पार करते हुए आशारूपी दीपक हो, प्रज्वलित तेजमयी प्रकाश की लेकर आस, 2020 का खुशनुमा स्वागत हो खास!

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टेंशन फ्री परीक्षा के लिए बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए 11 सुझाव

टेंशन फ्री परीक्षा! जी हाँ पाठको, आज मैं आपके और आपके बच्चों के लिए कुछ ऐसे ही सुझाव लेकर एक बार फिर हाज़िर हुई हूँ! तो आइये पढ़ें आगे! 

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क्रिसमस गया, तो क्या? हम अब भी एक दूसरे के सांता क्लॉज़ बन सकते हैं!

पिताजी ने किरण को समझाया, "ये तो समय का फेरा है। किसी का ऐसे मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, क्‍या पता वक्‍त कब किस तरफ करवट बदल ले?"

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अरे! जाते समय मुझे बोलकर जाने की तो बनती है न सैंया जी!

अपने बहु-बेटे या बेटी-दामाद के विवाह होने के बाद ज़िम्मेदारियों और अपेक्षाओं पर खरे उतारने के पूर्व उनको एक दूसरे को समझने का अवसर अवश्य ही प्रदान करें।  

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सारी मुश्किलों से आगे निकलने का नाम है ज़िंदगी

ठीक ही कहा शेखर ने नीलिमा से कि यही हमारे समाज की विडंबना है कि दुःख में अपना सहारा खुद ही बनना पड़ता है और जब मुसीबत की घड़ी गुज़र गयी न फिर काहे का गम?

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आत्‍म-विश्‍वास, आत्‍म-सम्‍मान व आत्‍म-अनुशासन से सब कुछ हासिल किया जा सकता है

मैं आपको ऐसी कहानी से वाकिफ करा रही हूं जो आपकेे हौसले की उड़ान को और भी बुलंद कर देगी, कहानी सच्‍ची है, केवल पात्राेें के नाम परि‍वर्तन कि‍येे गये हैै।

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अपने जीवन-साथी की ख़ुशी के लिए आप किस हद तक जाने को तैयार हैं?

हमारे मैनेजर ने एक ही बात बोली, 'पति-पत्नी का रिश्ता जन्मों-जन्मों का होता है, जब प्यार दिल से किया है तो यह रिश्ता भी दिल से निभाना दोनों।'

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यदि आपका मोबाइल फ़ोन आपका सबसे बड़ा हमदर्द है तो इसे खतरे की घंटी समझें!

अगर आप सब कुछ छोड़ कर अपने मोबाइल फ़ोन में ही खोए रहते हैं तो आप इसके गुलाम बन गए हैं और इस एडिक्शन से छुटकारा पाने के लिए आपको काउंसलर की ज़रुरत है।

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कुछ तो आपकी भी होंगी भूली-बिसरी यादें, स्कूल और बचपन की!

प्रथम पाठशाला में जो प्रारंभिक शिक्षा और संस्कार सिखाए जाते हैं वह हमारे कुशल व्यक्तित्व में समाहित होते हैं और वह ज्ञान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है।

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क्या माता-पिता को अपनी ज़िंदगी की तुलना अपने बच्चों की ज़िंदगी से करनी चाहिए?

हम बच्चों की ज़िंदगी की तुलना अपनी ज़िंदगी से कभी नहीं कर सकते और न ही अपेक्षा कर सकते हैं। इस नए परिवेश में जीना आज उनकी आवश्‍यकता हो गई है। 

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ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव में ऐसे रंग लाई हमारी दोस्ती

सखियां सोच रही थी कि शीतल से जब भी हम मिलते है तो ऐसी उदास नहीं रहती, चेहरा भी काला दिख रहा और ऑंखो में लाली छाई है, देखकर लग रहा है मानो कितना रोई हो।

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वो अनमोल पल नवोदय के – नई राह नई रौशनी!

पर जिंदगी में राहें कभी खत्म नहीं हुआ करतीं, हर अंधेरे के बाद एक नई रोशनी अवश्य ही जन्म लेती है, मेरे सपने ने जीवन की प्रकाश रूपी राह चुन ली है। 

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क्षणिक जीने दो ये प्यार भरे पल – नई पीढ़ी, नई दुनिया, नई सोच

जब तक आपके साथ रह रहे हैं, हम बहन-भाई को, आपके प्‍यार एवं स्‍नेह के ऑंचल तले खुशनुमा माहौल में क्षणिक जीने दो ये प्‍यार भरे पल

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रंग लाई है दोस्ती

एक सुंदर वीणा जो मन में तान छेड़ती, लगता है दोस्त अपने बारे में बात कर रहे, इसका ही मतलब है, दोस्ती!

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बचपन की ऐसी सखी की याद जो सिखा गई ज़िंदगी जीने का जज़्बा

मेरी यादों के बसेरे में एक बात अवश्‍य ही जुड़ गई दोस्‍तों, ज़िंदगी जीने का नाम है, मुर्दादिल क्‍या ख़ाक जिया करते हैं।

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एक ही स्थान पर संवर रही है बच्चों एवं महिलाओं की ज़िंदगी

आज के दौर में ऐसी महिलाएँ भी हैं, जो समाज की भलाई के लिए कुशलतापूर्वक कार्य करने में सक्षम हैं, यह तारीफे काबिल तो है ही, साथ ही आश्चर्यजनक भी। 

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बांझपन के लिए केवल औरत ही दोषी है ?

इस समाज में बांझपन के लिए क्या अकेली औरत ही दोषी है? साथ ही साथ यह भी सोचा जाना चाहिए कि क्या औरत ही औरत की दुश्मन हो सकती है?

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महिलाओं के आपसी सहयोग से बदली गाँव ग्वाडिया की तस्वीर

गांव ग्वाडिया की महिलाओं के आपसी सहयोग से परिस्थितियों में परिवर्तन लाने की कोशिश यूँ कामयाब रही। 

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अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना आवश्यक

अन्याय सहना भी एक घनघोर अपराध है, जिससे हमें ही बाहर निकलना होगा, प्रकाश रूपी इस शक्ति को हमें ही अपनी पूरी ताकत से, सब जगह जगमगाते हुए फैलाना होगा।

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बहुत हुआ धैर्य एवं संयम का बांध,अब और नहीं महोदय!

इतनी तन्मयतापूर्वक कार्य करने के बाद भी आप संतुष्ट नहीं हैं। आपको सिर्फ काम से ही मतलब है और घरवालों को पैसा से।

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प्रीती सुख का स्वागत, भावों के नाद मधुर सुर ताल के साथ

दोनों की समागम भावनाओं से होगी रस बरसात, बुनियादों का कर त्याग हमें करना कुरितियों का हनन, गर तुम निभाओ साथ मेरा सुखद होगा ये नवजीवन

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बहु की अच्छाई कभी भी नहीं दिखाई दी?

सुबह हुई नहीं कि सबकी फरमाइशें शुरू हो गईं। किसी को चाय तो किसी को स्पेशल कुछ। किसी को न दीपू से मतलब और ना ही रागिनी की नौकरी से।

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जिंदगी की प्रताड़ना से बाहर निकलना आवश्यक

हे नारी ज़िंदगी की हर प्रताड़ना को अंदर से निकाल, तू बाहर निकल स्वच्छंद बना अपनी पहचान, एक मिसाल कायम कर बन परिवार व देश की ढाल।

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ये दहेज प्रथा कब तक चलेगी?

हम नवचेतन युग के नवयुवक हैं मां, ये दहेज प्रथा कब तक चलेगी? इस पर अंकुश लगाने के लिए हमें ही कदम बढ़ाना होगा।

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ससुराल में पहला दिन और रस्मों की कुछ खट्टी-मीठी यादें

ससुराल में पहला दिन'-ये शीर्षक पढ़कर मुझे अहसास हुआ कि ये दिन, किसी भी नई बहु के लिए एक परीक्षा से कम नहीं।

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नारी तेरी सदैव ही परीक्षा

इन सबके पश्चात बाबुल, आएगा ज़िंदगी का तीसरा-अंतिम पड़ाव, अंतिम पड़ाव ना समझ, बढ़ाऊंगी आगे कदम, मिलेगी नई दिशा, क्योंकि यह जीवन ही है, सदैव नारी की परीक्षा

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काश ऐसा हो कि हम अपने आप से हमेशा प्यार करें

काश कि हर महिला यह समझ पाती कि वह सिर्फ एक देह नहीं बल्कि बुद्धि‍, बल, विवेक का भंडार भी है। देह समाहित है हम में, हम देह में नहीं। 

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गर्मी की छुट्टियों में अपने बच्चों को देख लेने दो खुला आसमान

अपने बच्‍चों को उनके अरमानों को पूरा करने का एक मौका अवश्‍य दीजिए, तभी वे आत्‍म-निर्भर बनकर जिंदगी की परीक्षा में पूर्ण रूप से पास हो सकेंगे।

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