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तो क्या हुआ अगर घर की बहू सबके जागने के बाद जगी?

Posted: September 1, 2020

शादी के बाद ज्यादातर परिवारों में बहुओं को हमेशा छोटी-छोटी बातों में गिल्टी फील करवाया जाता है। क्या हुआ अगर घर की बहू सबके जागने के बाद जगी?

सूरज की रोशनी पर्दे से पार होती हुई उसकी बंद आंखों पर पड़ी थी कि तभी खुली खिड़की से हवा का एक मधुर झोंका उसके बालों को सहलाता हुआ गया। उसके काले घुंघराले बाल, गालों में अठखेलियां करने लगे और उनकी गुदगुदी से उसके शरीर में झुरझुराहट सी दौड़ गई। उसने अह्लाद से अपने बालों को कान के पीछे समेटा, और थोड़ा कसमसाकर तकिए में धंस गई। सूरज की रोशनी अब ठीक उसके गालों को छू रही थी। मध्यम तपिश को वो महसूस कर ही रही थी कि मां की आवाज़ सुनाई दी, “सुनयना उठ! देख तो कितनी देर हो गई। सूरज सर पर चढ़ आया। तेरे पापा गुस्सा करेंगे।”

अभी वो मां की आवाज़ को नजरंदाज कर थोड़ा और तकिए में धंसना चाहती थी कि वो हड़बड़ा कर उठ बैठी। मोबाइल फ़ोन को ढूंढकर समय देखना चाहा। फ़ोन की काली स्क्रीन बता रही थी कि फ़ोन स्वीच ऑफ था। उसने दीवार घड़ी देखा; दोनों सुई सात और आठ के आस पास थी। उसने आंखें मली साढ़े छः या साढ़े सात भ्रम हो रहा था, कुछ एक सेंकेड में ही पता चला कि सात बजकर पैंतीस मिनट हो गए हैं।

घबड़ाहट में उसकी सांसें तेज हो गई। आज वो पूरे डेढ़ घंटे ज्यादा सोई है। मोबाइल फ़ोन को चार्जर पर रखना भूल कैसे गई! खुद को कोसते हुए उसने जल्दी से चद्दर के किनारे किया और वाशरूम की ओर भागी। कुल जमा दस मिनट में जैसे तैसे उसने अपने काम निपटाए। साड़ी बदलकर बाहर निकली तो देखा सासू मां पूजा के बर्तन धोकर तुलसी के चौबारे में रख रहीं थीं, पूजा के फूल भी तोड़े जा चुके थे।

‘ओह! बहुत देर हो गई!’ सुनयना मन ही मन बुदबुदाई। उसके हिस्से का काम कर चुकी सास ने उसे हिकारत से देखा और चुपचाप अपने काम में लगी रही।

सुनयना रसोई में खटपट की आवाज़ सुनकर अंदर गई। समीर उसका पति रसोई में कुछ करने की कोशिश कर रहा था। गैस स्टोव पर जला हुआ चाय का बर्तन उस पर हुए अत्याचार की कहानी बता रहा था। समीर ने बेहद रूखी आवाज़ में कहा, “पापा ने आज खुद चाय बनाकर पी!”

सुनयना शर्म के मारे आधा इंच और जमीन में धंस गई। सुनयना ने जल्दी-जल्दी चाय का बर्तन धोकर फिर से सबके लिए चाय बनाई साथ ही गैस स्टोव में लगी कालिख भी उतारती गई। घर में सन्नाटा पसरा था, ठीक वैसा ही जैसा तूफान के आने से पहले होता है।

छुट्टी के दिन चहल-पहल वाला घर, आज जैसे मातम मना रहा था। सुनयना ने अपनी तरफ से कोशिश की; नाश्ते में आलू दम, पूरी के साथ सेवई भी बना दी। सुनयना को पूरी उम्मीद थी कि घर का गंभीर माहौल नाश्ते के बाद ज़रा हल्का होगा। जब पूरियां पूरी की पूरी खत्म हो गई तो सुनयना को पता चला कि चुपचाप खाना खाते लोगों को नाश्ता पसंद आया है। सुनयना का फिर से आटा गूंथ कर खुद के लिए पूरी तलने का मन न हुआ, उसने सिर्फ सेवई खा ली। उसके मन को ज़रा तसल्ली हुई।

घर की साफ-सफाई और कपड़े धोने के बाद दोपहर के खाने की तैयारी करते हुए भी उसने सबकी पसंद का खास ख्याल रखा। सासू मां ने अपनी दो साड़ियां फॉल लगाने के लिए रखी थी, सुनयना ने आज दोपहर आराम न करके साड़ियों में फॉल लगा दी।

शाम हो चली थी सुनयना को याद आया छत में कपड़े फैले हैं, जल्दी उतार दूं। सासू मां छत पर पास वाली ताई जी से अपना दुखड़ा रो रही थी, “घुटनों में दर्द हैं, जी घबराता है, कुछ खाने पीने का मन नहीं करता।”

सुनयना को देखते ही प्रसंग बदल गया। सासू मां अब बतला रहीं थीं, अपने जवानी के दिनों में वो कितना काम करती थीं, ताजे मसालें रोज ओखली में कूट-कूट कर बनाएं जाते थे, साल भर के ‘मन मन भर’ बड़ियां और पापड़ बनाएं जाते थे। और सबसे जरूरी बात जो बार बार कही जा रही थी सुबह चार बजे उठ जाया करते थे। मजाल की कभी हम दिन चढ़े तक सोएं हो और घर में किसी ने हमें बिस्तर पर देखा हो। और “आजकल की बहुएं! सारा घर जग जाता है तब भी सोई रहती हैं।”

सुनयना कपड़े तह लगाकर सबकी अलमारी में रख आई। सुबह से किसी ने उससे बात नहीं की थी, उसकी आंखें भर आईं। दोपहर में उसने दाल पीसकर रखा था, देवर जी को दही वड़े बहुत पसंद हैं। उसने दही वड़े बनाएं फिर रात का खाना। रात के खाने तक सुनयना को घर कुछ कुछ सामान्य लगने लगा था। घर वाले आपस में हंसी-मजाक कर रहे थे।

अगले दिन की तैयारी और रसोई की साफ-सफाई के बाद सुनयना अपने कमरे में आई। समीर उसका इंतज़ार कर रहा था। सुबह से मुंह फुलाया बैठा समीर अपना प्यार लुटाने को आतुर था। सुबह से थकी सुनयना आत्मग्लानि के बोझ तले ना-नुकुर भी ना कर सकी।

समीर अब गहरी नींद में सो चुका था। सुनयना अपने पूरे दिन को भूलाकर वापस सुबह के बारे में सोचने लगी।

सुबह के वो पांच मिनट! कितनी सुखद अनुभूति थी। जैसे वो बच्ची बन गई थी जहां उसे कोई चिंता, किसी की परवाह नहीं थी। यह सोचकर उसका मन प्रफुल्लित हो गया। बोझ कम हो रहा था। सुनयना का शरीर एकदम हल्का हो गया।  उसने सात बजे का अलार्म लगाया और गहरी नींद में सो गई। अब वो गुनहगार नहीं थी।

दोस्तों, बेटियां बचपन से अपनी मांओं को इसी आत्मग्लानि के बोझ तले दबी हुई देखती आतीं हैं। शादी के बाद ज्यादातर परिवारों में बहुओं को हमेशा छोटी-छोटी बातों में गिल्ट का फील करवाया जाता है। एक छोटी सी बात है! क्या हुआ अगर घर की बहू सबके जागने के बाद जगी? या क्या हो गया कि अगर घर के पुरुष ने अपने ही घर का कोई काम कर लिया? या क्या हो गया कि किसी भूखे पुरुष अपनी रोटी खुद सेंक ली?

इसके लिए औरतों को कटघरे में खड़ा करना कहां की नैतिकता है? औरतों के मन में अपराध बोध की जड़ें इतनी गहरी खुद जाती है कि चाह कर भी वो स्वयं ही ग्लानि से निकल नहीं पाती जबकि उनकी कोई गलती नहीं।

मूल चित्र : Canva Pro 

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