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अब तक वो एक अधूरा विवाह निभा रही थी…

"अनुपमा कितना रो ही रही थी। और तुझे पता है अनुपमा को पति का सानिध्‍य जरा भी नहीं मिल पाया उसे, क्‍योंकि उनकी नौकरी ही ऐसी थी।"

“अनुपमा कितना रो ही रही थी। और तुझे पता है अनुपमा को पति का सानिध्‍य जरा भी नहीं मिल पाया उसे, क्‍योंकि उनकी नौकरी ही ऐसी थी।”

अनुपमा भाग 1 में अब तक आपने पढ़ा :

और अनुपमा के जाते ही प्रकाश सबके बीच में जोर से बोल पड़ा, “ये कौन आया अनुपमा को लेने? ये तो विधवा हैं ना? कौन है ये दोस्त जिसके पीछे बैठकर चली गई? भाई तो नहीं लग रहा!”

सुनते ही वत्‍सला ने प्रकाश को पैनी दृष्टि से देखा और करारा जवाब दिया, “क्‍यों प्रकाश हमारे समाज में किसी भी विधवा का किसी के भी पिछे बैठकर जाना मना है क्‍या? और यही स्थिति यदि किसी पुरूष की हो तो? उसे सौ गल्तियां माफ है, है न? यही कहती है न आपकी डिक्‍शनरी?”

अब आगे : 

वत्सला ऑफिस की राजी के साथ बस में गुमसुम बैठी थी। इतने में राजी बोली, “क्या हुआ वत्‍सला? ऐसी चुप्‍पी साधे हुए बैठी है? अभी तो हम बस में हैं, ऑफिस मे थोड़े ही हैं!”

वत्‍सला ने फिर प्रकाश ने जो अनुपमा पर छींटा-कसी की, उसके बारे में राजी को बताया और कहा, “तब से किसी भी काम में दिल नहीं लग रहा है। पता नहीं राजी, बचपन से अभी तक यही विश्‍लेषण नहीं कर पाती हूँ कि समाज किसी भी महिला पर पूरी स्थिति जाने बिना ही क्‍यों उंगली उठाता आया है…”

फिर राजी ने बताया, “बड़ी दु:ख भरी कहानी है अनुपमा की। उस दिन जब मैं अनुपमा के साथ हॉस्पिटल गई थी न, उसके बच्‍चे कंवल को लेकर, तभी उसकी सास का बुरा व्‍यवहार देखा मैंने उसके साथ। बताती नहीं है वो किसी को। उस दिन हम कंवल को समय पर इलाज के लिए नहीं लेकर जाते तो उसकी जान जोखिम में पड़ जाती। लेने के देने पड़ जाते…

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मालूम है तुझे, बहुत ही शरारती है कंवल। वो छत की सीढ़ी से इतनी जोर से फिसला कि सिर पर अधिक चोट लगने से काफी खून बहा, साथ ही दाहिने पैर की घुटने में फ्रैक्चर हुआ सो अलग। और अनुपमा कितना रो ही रही थी। और तुझे पता है अनुपमा को पति का सानिध्‍य जरा भी नहीं मिल पाया उसे, क्‍योंकि उनकी नौकरी ही ऐसी थी।”

सुनकर वत्‍सला हतप्रभ रह गई और सोचने लगी कि इतनी परेशानियों से जूझने के बाद भी वह नौकरी करने का दमखम रख रही है।

मन ही मन सोचते हुए वह राजी से पूछ ही बैठी, “अनुपमा के पति तो फौज में कर्नल थे न? तो फिर उन्‍हें मासिक पेंशन तो मिलती ही होगी?”

राजी बोली, “मिलती तो है, पर सभी जगह पर भारतीय सरकार के अलग-अलग नियम और कानून जो निर्धारित हैं, उन नियमों के अनुसार उतने वर्षो की उनकी नौकरी की उम्र हुई नहीं थीं न।”

इतने में कंडेक्‍टर ने कहा, “आपका स्टैंड आ गया।”

दोनों उतर गईं बस से।

ऑथर नोट : जी हॉं साथियों, भाग-3 का इंतजार करिएगा! इंतजार में जो मजा है, वो किसी में नहीं।

कहानी के सब भाग पढ़ें यहां –

अनुपमा भाग 1

अनुपमा भाग 2

अनुपमा भाग 3

अनुपमा भाग  4

मूल चित्र: Still from Batla House, YouTube 

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