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वो मुलाकात एक अजनबी परिवार के साथ

Posted: फ़रवरी 28, 2020

हर माता-पिता को चाहिए कि वे इस तरह से अपने बच्‍चों को सकारात्‍मकता के साथ समझाएँ कि सब अजनबी बुरे नहीं होते, सिर्फ उन्‍हें सही परखने की ज़रूरत है।

जी हाँ! साथियों कभी-कभी हम लोग सोचते भी नहीं है, पर हमारे जीवन में ऐसा ही कुछ घटित होता है। फिर वह चाहे किसी अजनबी से मुलाकात ही क्‍यों न हो। वैसे तो हमारे जीवन के इस सफर में जाने-अनजाने ही सही बहुत लोगों से मुलाकातें होती हैं, पर कुछ मुलाकातें याद रह जाती है, वह भी किसी अजनबी से।

कुछ ऐसा ही घटा सुरभि के साथ, जिसकी कहानी मैं आपको सुनाने जा रही हूँ।

सुरभी 14-15 साल की लड़की, अभी 9वीं कक्षा में पढ़ रही थी। बहुत खुश थी, बहुत दिनों बाद उसे और छोटी बहन शालु को मम्‍मी के साथ किसी शादी में जाने को मिल रहा था मुंबई, वह भी मौसी की।

इसके पहले कहीं ऐसे घूमने या शादी में उसे जाने का अवसर ही नहीं मिला। एक तो पढ़ाई का बोझ और पिताजी अकेले कमाने वाले थे घर में। मम्मी का मायका जो था मुंबई, तो सारे रिश्‍तेदार उधर ही बसे। वैसे कई शादियों के और अन्‍य फंक्‍शन के लिए बुलावे तो आते रहे, परंतु कभी सुरभि की वार्षिक परीक्षा होने या फिर कभी पिताजी की छुट्टी नहीं मिलने के कारण कही जाने का मौका कम ही आता।

इस बार मौसी की शादी मम्‍मी के बड़े मामाजी द्वारा खासतौर पर गर्मी की छुट्टियों में तय की गई ताकि सभी मेहमान शादी में शामिल हों सकें, सबसे छोटी बेटी की शादी जो थी। उस ज़माने में मोबाइल तो थे ही नहीं और फ़ोन थे तो भी उनका उपयोग घरों में कम ही होता था। ज्‍यादातर तो पत्र द्वारा ही संदेश एक-दूसरे तक पहुँचते थें।

इस बार तो पिताजी ने पहले से ही सबके जाने के रिजर्वेशन के साथ सारी तैयारियाँ भी कर ली थी।
शालु, छोटी होने के कारण उसे इतनी समझ नहीं थी, पर सुरभी इस शादी में जाने के लिए काफी उत्‍सुक थी। वैसे भी छोटे बच्‍चों के लिए शादी मतलब बैंड-बाजा, नाच-गाना, खाना-पीना, मजा करना और क्‍या? बस यहीं तक सीमित है, वे क्‍या जाने शादी के बंधन और रीति-रिवाजों को, उनको तो घूमने-फिरने को मिले तो बस खुश।

पहले के ज़माने में बच्‍चों का सपरिवार ऐसे जाने का मौका कम ही मिल पाता था, इसलिये भैय्या रेल में बैठते साथ ही दोनों बहने बेहद खुश थीं, इस बार मम्‍मी-पापा साथ में जो जा रहे थे। परिवार के साथ जाने का आनंद ही कुछ और है साथियों।

सुबह-सुबह मुंबई आ गया और मामाजी आ गए स्‍टेशन पर लेने। कुछ सहमे हुए सी सुरभि सब जगह एक साथ टकटकी लगाकर निहार रही थी। माता-पिता को खासतौर से अपनी बेटियों को उचित सलाह देते हुए सब जगह जाने की अनुमति देनी चाहिए ताकि वे बेझिझक और निडर होकर किसी भी परिस्थिति या किसी भी इंसान का सामना कर सकें। इन माता-पिता ने कभी ऐसा नहीं किया।

अब सभी पहुँच गए शादी वाले घर में और सभी रिश्‍तेदारों से मेल-मुलाकात होने लगी। सुरभि के पिताजी की तो प्रमुख रूप से आव-भगत हाने लगी, दामाद जो थे। मम्‍मी ने सुरभि और शालु को सबसे मिलवाया। शालु तो नासमझ थी पर सुरभी तो थोड़े बहुत रिश्‍तेदारों से ही पहचान कर पाई थी, बहुत दिनों बाद सबसे मुलाकात होने के कारण उसके लिये तो मानों सभी अजनबी ही थे।

इतने में मामाजी ने सुरभि का परिचय अपने पुस्‍तकालय से कराया और तरह-तरह के कवियों की पुस्‍तकों से वाकिफ कराया। पर सुरभि की नज़र तो मुंबई दर्शन पुस्‍तक पर पड़ी,  बच्‍चों की वैसे भी होती है बहुत पैनी नज़र।

शादी वाला घर कहीं कुछ रस्‍में चल रही और फिर तरह-तरह का स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजनों की गजब की खुशबु चारों तरफ फैल रही थी। सभी को भोजन करने के लिये बुलाया गया, लेकिन सुरभि को तो बहुत दिनों के बाद ऐसी पुस्‍तक क्‍या हाथ लगी थी। बस फिर क्या? अब लगी पुस्‍तक में ही मुबंई के दर्शनीय स्‍थल निहारने। मामाजी ने कहा, “बेटी तुम्‍हें पुस्‍तक में दर्शनीय स्‍थल इतने भा गए तो तुम शायद वहाँ घूमने जाना अवश्‍य ही पसंद करोगी, ठीक है देखते हैं मौका मिलेगा तो मुंबई दर्शन जरूर कराएँगे, पर अभी तो चलो खाना खाने।”

अगले दिन शादी का मुहुर्त था और अब तो मेहमानों की अच्‍छी-खासी भीड़ हो गई, साथ ही शादी हाल में जाने की तैयारियाँ शुरू हो गई। पर सुरभि मन ही मन सोच रही क्‍या? यह सब भीड़-भाड़ में हो रहा है, कहीं घूमने जाने को मिले तो अच्‍छा और वैसे भी बच्‍चों को शादी की रस्‍मों से क्‍या लेना-देना? उन्‍हें तो बस दुल्‍हा-दुल्‍हन ने एक-दूसरे के गले में माला डाली,  बैन्‍ड में डांस कर लिया, हो गई शादी।

ऐसे में कुछ रिश्‍तेदार तो आते ही इसलिये हैं कि इधर वरमाला का कार्यक्रम संपन्‍न हो और वे घूमने निकल जाएँ। मामाजी के दूर के रिश्‍तेदार स्‍वयं की कार से इसी उद्देश्‍य से आए थे, उसमें विलास नामक युवक, उसकी दोनों बहने तथा माता-पिता थे।

फिर क्‍या हुआ कि जैसे ही शादी की महत्‍वपूर्ण रस्‍म वरमाला हुई तो वे निकल पड़े घूमने मस्‍त। सुरभि भी इसी इंतज़ार में थी कि उसे कहीं बाहर घूमने जाने को मिले। मामाजी ने भी सोचा कि अब तो दिन भर शादी की रस्‍में ही चलेंगी तो बच्‍चों का वैसे भी क्‍या काम? फटाफट सुरभि को पूछा, “तुम जाओगी मुंबई दर्शन के लिये इनके साथ?”

एकदम से सकपकाते हुए सुरभि ने जवाब दिया, “शालु भी आएगी न मेरे साथ?” मन में डर तो था ही कि अनेक सवाल उठ रहें, ऐसे कैसे चले जाएँ? किसी भी अनजान रिश्‍तेदारों के साथ में! पहले कभी गए नहीं किसी के साथ न।

इतने में मामाजी ने बताया, “अरे घबराने की कोई जरूरत नहीं बेटी, अपने ही लोग हैं। साथ में जाने से जान-पहचान हो जाएगी, घूमने की इच्‍छा थी न तुम्‍हारी? फिर बेफिक्र होकर जाओ दोनों बहनें और किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो विलास भैय्या को बताना।”

अब सुरभि को मन ही मन डर भी लगने लगा, एक तरफ तो एक मन कह रहा कि चलो इसी बहाने मुबंई तो घूमने मिलेगा, काफी दिन से तमन्‍ना थी। पर एक मन कह रहा कि बिना जान-पहचान के कैसे इनके संग घूमेंगे भला? इसी असमंजस थी कि विलास भैय्या जो उसके लिये अभी तक तो अजनबी की भूमिका निभा रहे थे, उन्‍होंने नमक लगी ककड़ी दी हाथ में, जो सभी के लिये ली गई थी खाने के लिये।

सुरभि ने सोचा ऐसे ही तो हिम्‍मत खुलेगी और मुझे देखकर ही तो शालु भी सीखेगी ही न? हम लोग अपने माता-पिता के कारण एक जगह पर रहकर एक जैसी विचारधारा में ही सोचते हैं, जबकि बाहरी दुनिया वैसी नहीं होती। ऐसे तो मुझे भविष्‍य में कितने अजनबियों से मुलाकात करनी पड़ेगी? फिर ये तो रिश्‍तेदार ही हैं, भरोसा तो रखना होगा।

बस इसी भरोसे के साथ शुरू हुआ मुंबई दर्शन और सबसे पहले गेट वे ऑफ इंडिया, जहाँ उसने देखा समुद्र और होटल ताज जो समीप ही है। यहीं पर सुरभि और शालु के साथ जहाज में बैठी पहली बार, पर एक पल भी उस परिवार के साथ घूमने में अपरिचित सा बिल्‍कुल भी नहीं लगा और बहुत जल्‍दी उनके साथ घुल-मिल गईं।

विलास भैय्या जिन्‍हें वह शुरू से ही अजनबी समझ रही थी, पर वे तो अपनों सा ही व्‍यवहार कर रहे थे। जहाज में बैठते समय भी हाथ पकड़ा दोनों बहनों का, साथ ही पानी पीने, नाश्‍ते, खाने इत्‍यादि का भी बराबरी से ध्‍यान रख रहे थे। उन लोगों को ऐसा लग ही नहीं रहा था कि किसी अनजान परिवार के साथ घूम रहे हैं। कार में मस्‍त गाने लगे थे जो सुरभि की ही पसंद के थे, तो गाने सुनते-सुनते घूमना उसके मन को बहुत लुभा रहा था।

दोपहर 11 बजे शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। गेट वे ऑफ इंडिया से होते-होते हाज़ी अली की दरगाह, जुहू बीच, मरीन ड्राईव, चौपाटी बीच मस्‍त घूमने में अद्भुत आनंद की अनुभूति हो रही थी| क्‍योंकि वह परिवार भी पहली बार ही मुंबई दर्शन कर रहा था और सुरभि व शालु भी, इसलिये एक अलग ही जोश व उत्‍साह का माहोल बना हुआ था।

फिर भोजन का समय हो चला था, सभी ने एक रेस्‍टॉरेंट में मनपसंद खाना खाया। सुरभि और शालु दोनों ने ही एक चीज़ सीखी उस दिन, मौके की नज़ाकत के साथ इन असीम पलों का लुत्‍फ उठा ही लेना चाहिये और ऐसे अजनबियों से मुलाकात कम ही होती है जो अनजान होते हुए भी अपनेपन सा अहसास देते हैं।

इसके पश्‍चात पहुँचे सिद्धिविनायक मंदिर, मुम्‍बादेवी मंदिर और महालक्ष्‍मी मंदिर भव्‍य दर्शन करने। सुरभि कभी इतना घूमी नहीं न इसलिए आदत नहीं थी, इस तरह दिन भर घूमने की। और धीरे-धीरे सूरज ढल रहा था, शाम होने का थी। महालक्ष्‍मी मंदिर के किनारे भी समुद्र और फिसलन तो इतनी कि पूछो मत, और इसी उत्‍साह में सुरभि का पत्‍थर पर से एकदम फिसला पैर, अब सुरभि को लगा कि मैं चल नहीं सकूँगी। मोच आ गई थी पैर में, फिर एकदम से विलास भैय्या की माताजी ने आयोडेक्‍स मला, जो वे हमेशा साथ ही रखती थी कि न जाने कब ज़रूरत पड़ जाए और देखिएगा सुरभि को जरूरत पड़ ही गई आखिर।

सुरभि और शालु दोनों को ही डर सता रहा अब मम्मी-पापा डांटेंगे, कभी नहीं गए घूमने पहले और अभी गए तो ऐसा हो गया। इतने में विलास भैय्या ने हाथ पकड़ा और सभी जगहों पर हाथ पकड़कर ही चले साथ में। घूमते-घूमते शाम हो चली थी और अंधेरा होने लगा था। बाकी बचे दर्शनीय स्‍थल दूसरे दिन देखने का निश्चित हुआ क्‍योंकि इतने सारे स्‍थल एक दिन में घूम पाना असंभव था।

फिर भी चलती कार में से जो देखा जा सकता था, वह विलास भैय्या ने सबको दिखाया। जो आसानी से दिखे क्‍योंकि अब तो सुरभि को चलने में भी तकलीफ हो रही थी।

सुरभि और शालु आपस में बातचीत करते-करते, आज एक बात तो तय हो गई कि हमारे शरीर के गतिशील विकास के लिये बाकी चीज़ों के साथ-साथ भारत के प्रत्‍येक दर्शनीय स्‍थल का दर्शन करना भी उतना ही महत्‍वपूर्ण है। साथ ही ये स्‍थल ऐतिहासिक होते हुए हमें हर जानकारी से तो अवगत कराते ही है, साथ ही शैक्षणिक विकास में भी उतने ही सहायक हैं।

विलास भैय्या न सिर्फ घूमने के शौकीन अपितु उन्‍होंने हर स्‍थान के महत्‍व को भी सभी को समझाया साथ में और लुत्‍फ भी उठाया। यदि मम्‍मी-पापा हमें पहले से ही सब जगह घूमने ले जाते तो ऐसी झिझक और डर मन में पैदा ही नहीं होता।

घर पहुँची दोनों रात हो गई थी, सुरभि सोच रही थी, पैर की चोट तो चलो ठीक हो जाएगी, पर आज इस अजनबी परिवार के साथ इस पहली मुलाकात से हम दोनों बहनों की झिझक तो दूर हुई, जो हमारे विकास हेतु अति-आवश्‍यक साबित होगी।

हर माता-पिता को चाहिए कि वे इस तरह से अपने बच्‍चों में किसी भी तरह की डर या झिझक को दूर करने का प्रयास करें और सकारात्‍मकता के साथ समझाएँ कि हर अजनबी बुरे नहीं होते, सिर्फ उन्‍हें सही परखने की जरूरत है।

वर्तमान माहौल में तो बेटियों को निडर रहकर सतर्कता के साथ किसी भी अजनबी को सामना करने के लिए तत्‍पर रहना आवश्‍यक है और एकदम से किसी पर भी भरोसा करना जोखिम भरा साबित हो सकता है, इस बात का भी ध्‍यान रखना चाहिए।

मूल चित्र : Canva 

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