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ज़िंदगी
हम चाहें तो इस नए साल में बहुत कुछ बदल सकते हैं, ज़रुरत है वो पहला कदम उठाने की!

तो नए साल से मिली इसी ढांढस की बंधी हुई पोटली खोलिए और निकाल लीजिए पिछले बरस के फटे, पुराने, उधड़े और बेरंग सपने और कीजिए उनकी छंटाई, रंगाई!

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है तुझे भी इजाज़त, कर ले खुद से थोड़ी तू भी मोहब्बत! 

हैं हज़ार राह में बिखरे काँटें, पर रोक सकेगा तुझे कौन, तू बस अपनी धुन में मग्न, काँटों भरी रहा को गुलशन समझ, आगे कदम बढ़ाए जा, जीने का जश्न मनाए जा!

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अभी तो चलना सीखा है और अभी पूरी ज़िंदगी बाकी है!

खड़ा तो मुझे खुद ही होना था, बस थोड़ी देर कर दी, पर अब जब खड़ी हो गई हूँ, तो फिर अब बैठना नहीं है, अभी-अभी तो चलना सीखा है, अभी तो पूरी ज़िंदगी बाकी है!

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तलाश में खुद की – ‘दिल में बेचैनियाँ लेकर चल रहे हो तो ज़िंदा हो तुम!’

तलाश कभी खत्म नहीं होती। कम से कम मेरी तलाश इतनी उम्र बीत जाने के बाद भी वहीं पर है जहां से शुरू की थी, लेकिन ये तलाश ही तो है जो हमें ज़िंदा रखती है।

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देखा है तेरी आँखों में प्यार ही प्यार बेशुमार

सही ही कहा है कि प्यार और सही समय पर थोड़ा सा झुकना, सब बदल देता है। जहां गुस्सा बातें खराब करता है, वहीं दूसरी ओर प्यार सब मनवा भी लेता है। 

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दोस्ती का बंधन – होते हैं एक और एक ग्यारह

आपने सुना तो होगा कि एक और एक ग्यारह होते हैं, जब खुद से काम न बने, तो किसी और के सहयोग से आगे बढ़ा जा सकता है, बस यही प्रस्तुत करती है ये ख़ूबसूरत कहानी। 

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