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“बस थोड़ा एडजस्ट कर लो!” अपनी ख़ुशी और शांति को भूल कर?

Posted: February 19, 2019

मैं समझती हूँ, गलती करने वाला और गलती को सहने वाला दोनों ही ज़िम्मेदार होते हैं, और सिर्फ एक आवाज़ चाहिए इसको शांत करने के लिए। 

रात के ११ बज रहे थे, रीना भी सारे काम निबटा कर सोने जाने की तैयारी कर रही थी। दिन भर काफी काम रहता था इसलिए रात में शान्ति की नींद उसको बहुत प्यारी थी। वह अक्सर 11 बजे का इंतज़ार करती थी कि कब आराम करने को मिले। रीना एक साधारण महिला थी, जो गृहस्थी और एक स्कूल में टीचर का काम बखूबी संभालती थी। हाल ही में उसके पति की ट्रांसफर एक नयी जगह हुआ तो उनको घर बदलना पड़ा। वैसे नए माहौल में वह ढल गए थे पर कुछ दिनों से उसकी रात की नींद में एक अजीब खालीपन था। जो चैन की नींद वह लेना चाहती थी वह नहीं ले पा रही थी। समझ में नहीं आ रहा था किसको बताए या पूछे? सिर्फ दो महीने ही हुए थे उनको एक नए अपार्टमेंट में आये हुए। क्या बात थी? वह तो एक खुश रहने वाली महिला थी जिसका परिवार उसको हर काम में मदद करता था।

दरअसल, पिछले कुछ हफ्तों से जब भी वह सोने जाती, उसको एक अलग तरह की आवाजें आती थीं। लगता था, जैसे एक महिला सिसकियाँ ले रही हो, या कभी कुछ कांच के ज़ोर से टूटने की आवाज़, या कभी एक महिला की कुछ सेकंड्स की चीख जो कुछ कहना चाह रही हो। रात के 11 बजे वह किसको पूछे? वह इतने लोगों को भी नहीं जानती थी। उसको एक बेबसी सी लगती थी। क्या करे? किस से पूछे? कैसे पता करे कि आखिर कौन से फ्लैट से यह आवाज़ आ रही है? क्या सिक्योरिटी गार्ड को बुलाना ठीक रहेगा? पर कैसे? वह आवाजें कुछ पल की ही होती थीं। कैसे पता करेंगे किस घर से आ रही थीं? इतने घर आसपास हैं।

यह कश्मकश उसको रोज़ रात को उलझा देती। उसको किसी भी महिला का दर्द बर्दाश्त नहीं होता था और वह अक्सर लोगों की मदद किया करती थी। पर, यहाँ तो उसको ही समझ नहीं आ रहा था क्या बात है। उसको लगता था क्यों एक स्त्री इतने हफ्तों से रात को अत्याचार सहती है। क्यों वह अपने लिए खड़ी नहीं होती। ऐसी कौन सी मज़बूरी है जो उसको बांधे हुए है। रोज़ एक इंसान से मार खाना और अपनी आवाज़ को बाहर ना निकलने की तकलीफ सहते रहना।

आखिर, एक दिन यह बात खुल ही गयी। रीना की बिल्डिंग के ५वे माले पर एक परिवार  कुछ दिन पहले ही शिफ्ट हुआ था। पति, अक्सर अपनी बीवी को पीटा करता था। उनका एक छोटा सा ३ साल का बच्चा भी था। उस दिन शायद रात की बजाये उसने शाम को ही अपनी बीवी को मारना शुरू कर दिया। आवाज़ें सुन कर, पड़ोसी उनके घर चले गए। पत्नी का बुरा हाल देख सब दंग रह गए, चेहरे पर निशान, बाल उलझे हुई, हाथ पर निशान, इतना बुरा हाल और वह मुँह से एक शब्द नहीं निकाल पाई।

सबने कहा कि पुलिस कंप्लेंट करो या अपने घरवालों को फ़ोन करो। पर, उस लड़की ने सबके आगे हाथ जोड़ लिए, बोली यह मेरे घर का मामला है और इसमें किसी को बोलने का अधिकार नहीं है। यह कहकर उसने दरवाजा बंद कर दिआ। वहां खड़े लोग दंग रह गए और अपने घर चले गए। रीना भी मायूस हो कर अपने घर आ गयी। पर, जब अत्याचार सहने वाला ही अपने लिए नहीं खड़ा होना चाहता था, तो वह कर भी क्या सकती थी? आखिर, क्या था उसका कारण?

वह सोचने लगी, क्या अत्याचार करने वाला और सहने वाला दोनों ही ज़िम्मेदार नहीं? क्यों एक पत्नी, ऐसे इंसान को बचा रही थी, जो उसकी आत्मा को छन्नी करता था?  कुछ दिन बाद उसको पता चला कि, वह नहीं चाहती थी उसके माँ-बाप को पता चले कि उनकी लड़की शादी के बाद खुश नहीं। उन्होंने उसको पढ़ाया-लिखाया और धूमधाम से शादी करी। एक पुलिस केस उनकी इज़्ज़त पर दाग लगा सकता था। क्या करती वह? और, एक बच्चे की माँ के लिए इस समाज में अकेले जीवन व्यापन करना आसान नहीं था। उस पर, शादी नहीं निभाने का कलंक, ज़िन्दगी भर उसको कुरेदता रहता। शायद यही सोच कर वह चुप थी। रीना के पास कुछ नहीं था और करने या समझने को। उसने बहुत कोशिश करी कि उस लड़की से बात करे, पर वो हमेशा उसको नज़र अंदाज़ कर देती।

ऐसे बहुत से घर हैं जिसमें लड़की इसलिए चुप रहती है कि शान्ति बनी रहे, उनके माँ-बाप पर कोई आंच नहीं आए, या, यह कहिये की बदनामी का डर, जिसमें  अत्याचार सहने वाला ही दोषी माना जाता है। कुछ लोग अपने बच्चों के लिए चुप रहते हैं, कुछ अपने अलग होने के डर से, या कुछ समाज के बनाए नियमों को तोड़ने के डर से। पर, यह नियम क्या किसी की ख़ुशी और शांति से बढ़कर हैं? कुछ महिलाओं पर घर का बोझ इतना होता है कि वह किसी को कुछ समझा नहीं पाती। कुछ को वह इज्ज़त नहीं मिलती, जो मिलनी चाहिए। कुछ अपने अरमानों का गला घोट कर रह जाती हैं। कुछ को, कुछ भी खरीदने के लिए परमिशन लेनी पड़ती है और कुछ को नौकरी करते हुई भी सारे काम अकेले करने पड़ते हैं। ऐसे कितने ही उतार-चड़ाव जिससे एक महिला गुज़रती है, उसको और ज़्यादा तनाव देते हैं। यह भी एक असंतुलन है जो समाज में बढ़ता ही जा रहा है।

मैं समझती हूँ, गलती करने वाला और गलती को सहने वाला दोनों ही ज़िम्मेदार हैं, और सिर्फ एक आवाज़ चाहिए इसको शांत करने के लिए। लेकिन वह आवाज़ या तो समाज के भय से कहीं दब जाती है या ज़िन्दगी भर का निशान छोड़ जाती है। यह कहानी कुछ नयी नहीं, हर जगह एक या दूसरे तरीके से किसी ना किसी घर में मिलेगी। इस बात की पुष्टि करता यह मॉस्प्रेस्सो का सर्वे-३ में से 1 माँ नाखुश या स्ट्रेस्ड है-कुछ गलत नहीं। पर, आप खुद क्या करते हैं, यह सोचने का समय अब है। अगर आप खुश हैं तो क्या आप जानती हैं उसके कारण? क्या आप दूसरे को खुश रहने का रास्ता दिखाएंगी? या, यह सोच कर चुप रहेंगी की हमको कुछ मतलब नहीं। और, यदि आप खुश नहीं हैं, तो क्या आप उसका रास्ता निकालने की कोशिश करेंगी?

सोचिये और बताइये क्या आप भी कभी ऐसे हालात से गुज़री हैं? या किसी को देखा है? कैसे बदलेगा यह सर्वे? कैसे माएँ खुश रहेंगी?

खुश रहना एक लक्ज़री बन गया है और हम ही इसको आम बात बना सकते हैं। बस एक सोच ही चाहिए जो इसको परिणाम दे सके।

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