अंशु शर्मा

मेरा नाम अंशु शर्मा है मेरा लिखना डायरी तक सिमित था। अब डायरी से बाहर लिखने की कोशिश है। आपको पसंद आयेगी तो प्लीज़ लाइक करे फालो करे

Voice of अंशु शर्मा

शादी के बाद लड़की के मायके को पराया घर ना कहें!

ना कोई लड़की अपने घर को पराया मान सकती है और ना उसके माँ-पिता अपनी बेटी को दूसरा समझ सकते हैं, वो उनके कलेजे का टुकड़ा थी और रहेगी।

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उफ़्फ़! जब अपने ही लिए गए निर्णय खुद पे भारी पड़ने लगें…

अब गौरी को लगने लगा कि अब तुषार, माला का ध्यान रख रहा है तो कहीं उससे दूर तो नहीं चला जायेगा। तुषार समझाता कि इस समय माला और बच्चे को उसकी ज़्यादा ज़रुरत है। 

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अच्छे स्वस्थ के लिए आज भी अपनी संस्कृति से बहुत कुछ सीखने को मिलता है!

पहले पूरानी बातों को सब नज़र अंदाज़ करते थे, पर अब सबको पता चल चुका है कि पूर्वज जो करते थे, वो शरीर की निरोगी काया के लिए महत्त्वपूर्ण था।

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इस त्यौहार दिखावे के बड़े उपहार नहीं, मिलकर छोटी से छोटी खुशियां बांटें!

तुम ये सब क्या करने लगीं? खुशी की एक प्लेट जब जाती थी तब ये हिरस, स्वार्थ, दिखावा कुछ नहीं था। खुशियों के त्योहार में बुराई-भलाई में लगी हो?

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दिवाली की कहानियां जो घर की सफाई के साथ-साथ मन की सफाई करने की भी प्रेरणा देती हैं

दिवाली की कहानियां इस दिवाली पटाखे और मिठाइयों के साथ अपनों के साथ सुनें और सुनाएं और समझें कि घर और मन को साफ़ रखने की क्या ज़रुरत है! 

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काबिलियत के रंग के सामने कोई और रंग कहाँ टिक पाया है कभी!

दुनिया मेरे रंग पर तरह-तरह की बात करती, दादी सिर पीट रही थी, पर मां और पिता जी की तो मैं ही  राजकुमारी थी, सबसे प्यारी राजकुमारी!

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ये प्यार की हथकड़ियां हैं पूरी ज़िन्दगी प्यार के बंधन में बंधने की सज़ा!

छोटी-छोटी बातें अहम होने से बड़ी हो जाती हैं। समझाने वाले अच्छे दोस्त हों तो टूटे रिश्ते जुड़ जाते हैं, और वहीं भड़काने वाले हों तो रिश्ते टूटते देर नहीं लगती।

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दिखावट के इस नक़ली ज़माने में क्या प्यार का कोई मोल नहीं?

सुबह सबके जाने के बाद धरा रोली का ध्यान रखती और रात को घर जाती। माँ भी रात का खाना धरा के परिवार के लिए बना देती जिससे उसे घर में ना बनाना पड़े।

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‘बड़े हमेशा ये ही कहते हैं’, ज़रुरत है तो बस इस प्यार को समझने की

हमें लगता है, 'बड़े हमेशा ये ही कहते हैं', पर ये ही प्यार है। उन्हें भी बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है। उनका समय बच्चों की बातों ही में बीतता है।

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है रंग बदलती ज़िंदगी – जो सबके लिये हो सही, ऐसे फैसले लेने में क्या बुराई?

आज पता चला कि किसी भी बात को गम्भीर ना लेने वाली ताई जी, अंदर ही अंदर कितनी परिपक्व हैं। ताई जी का एक नया रूप देखने को मिल रहा था।

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सोशल मीडिया स्टेटस अपडेट – अवेलेबल! असल ज़िंदगी में, ना जाने कब से अनअवेलेबल

आज जिसे भी देखो सोशल मीडिया पर दिखावे में फोटो डालता है। वो और ना जाने कितने दुनिया को दिखाने में लगे है कि देखो, हम कितना सुखी जीवन जी रहे हैं।

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एक इस घर की लड़की, एक दुसरे घर से आई! फिर शादी के बाद फर्क क्यों?

क्यों शादी के बाद भी रोली में बचपना दिखता था और राधा में सुशील बहु, जिससे पूरा घर संभालने की उम्मीद रहती? शादी के छः महिने तक राधा ससुराल ही रही, कुछ रस्में चल रही थीं, कुछ तीज, त्यौहार भी थे। वैसे तो राधा ने अपने घर में ज़्यादा काम नहीं किया था, पर ससुराल […]

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यह सही था या गलत पता नहीं, पर थीं ख्वाइशें अपनी-अपनी

हम वापस आ गए, पर समझ नहीं आ रहा था, यह सही था या गलत। हाँ, यह ज़रूर समझ आ रहा था कि दोनों की ख्वाइशें पूरी हो गई थीं।

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अंतर्मन की आँखें – निर्भर नहीं आत्मनिर्भर

नैना ने कहा वो नेत्रहीन है, पर सोचने के लिये दिमाग है। सारी ग्रन्थियाँ, और स्वाद, आवाज़, स्पर्श, सब अच्छे से महसूस कर सकती है वह।

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प्यार और अपनेपन से, दिल की डोर दिल तक

उम्मीद नहीं थी कि नील फोन पर अपनी पसंद की लड़की को चुनकर, उसके सामने रिश्ते का प्रस्ताव ले आएगा। सुजाता के लिये ये एक बहुत बड़ा धक्का था।

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बचपन में ही बहुत कुछ छूट गया

बचपन में मुझे कभी भी पिताजी ने महंगी आइसक्रीम नहीं दी। कभी भी इतने रूपये नहीं थे। और जब थे, तब भी नहीं दिलायी। 

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