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मैं आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ!

माँ को देखा हर बात में सर झुका कर, ग़लत को भी सही बताते, यही शिक्षा पाई उनसे, ‘आत्मसम्मान चाहे ना रहे, पर परिवार को तुम बचाना...'

माँ को देखा हर बात में सर झुका कर, ग़लत को भी सही बताते, यही शिक्षा पाई उनसे, ‘आत्मसम्मान चाहे ना रहे, पर परिवार को तुम बचाना…’

क्या ऊँचाइयों पर मैं चढ़ने के लिए,
हाँ में हाँ मिलाना सीख जाती?
मैं आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ,
तभी समझौता करना नहीं सीखना चाहती हूँ।

माँ को देखा हर बात में सर झुका कर,
सही को सही और ग़लत को भी सही बताते।
यही शिक्षा पाई उनसे ‘कभी पति की बात मत काटना,
आत्मसम्मान चाहे ना रहे, पर परिवार को तुम बचाना।’

पर मैं सीता नहीं द्रौपदी सी बनना चाहती हूँ,
रानी लक्ष्मी बाई सी लड़ना चाहती हूँ,
बस आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ।
हाथ फैलाना नहीं है मंज़ूर मुझको,
इसलिए आत्मनिर्भर बनना चाहती हूँ।

अपने निर्णय स्वयं लेना चाहती हूँ,
कभी अपने भी मन का करना चाहती हूँ,
स्त्री हूँ पर आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ।

समाज में सबका अधिकार है,
पत्नी माँ और बेटी से अलग भी,
मेरी पहचान है,
अपनी पहचान को,
पूरे जग को बताना चाहती हूँ,
स्त्री हूँ पर आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ।

बोलने का अधिकार चाहती हूँ,
पहनावे पर, अकेले सफ़र करने पर,
कोई कटाक्ष नहीं चाहती हूँ,
स्त्री हूँ पर आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ।

मूल चित्र : Anil via pexels 

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About the Author

shalini verma

I am Shalini Verma ,first of all My identity is that I am a strong woman ,by profession I am a teacher and by hobbies I am a fashion designer,blogger ,poetess and Writer . मैं सोचती बहुत हूँ , विचारों का एक बवंडर सा मेरे दिमाग में हर समय चलता है और जैसे बादल पूरे भर जाते हैं तो फिर बरस जाते हैं मेरे साथ भी बिलकुल वैसा ही होता है ।अपने विचारों को ,उस अंतर्द्वंद्व को अपनी लेखनी से काग़ज़ पर उकेरने लगती हूँ । समाज के हर दबे तबके के बारे में लिखना चाहती हूँ ,फिर वह चाहे सदियों से दबे कुचले कोई भी वर्ग हों मेरी लेखनी के माध्यम से विचारधारा में परिवर्तन लाना चाहती हूँ l दिखाई देते या अनदेखे भेदभाव हों ,महिलाओं के साथ होते अन्याय न कहीं मेरे मन में एक क्षुब्ध भाव भर देते हैं | read more...

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