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अब बस! मुझे डायन और चुड़ैल कहना बंद कीजिए!

"मैं सबसे कहना चाहती हूँ मुझे डायन और चुड़ैल कहना बंद कीजिए! मैं जिंदा इंसान हैं और किसी भी अप्रत्याशित घटना के लिए मुझे दोषी मत ठहराइए।" 

“मैं सबसे कहना चाहती हूँ मुझे डायन और चुड़ैल कहना बंद कीजिए! मैं जिंदा इंसान हैं और किसी भी अप्रत्याशित घटना के लिए मुझे दोषी मत ठहराइए।” 

विमेंस वेब की महिलाओं के खिलाफ हिंसा की #abbas मुहीम में दूसरा लेख है लेखिका शालिनी वर्मा का! 

डायन, चुड़ैल आपने महिलाओं के लिए ये शब्द बहुत बार सुने होंगे। किसी को डायन या चुड़ैल कहना कितना आसान होता है, पर उसके पूरे वज़ूद को इस एक शब्द से हिलाकर रख दिया जाता है।

आज आपको एक जिंदा डायन की कहानी से रूबरू करवाती हूँ जिसे लोगों ने ही डायन बना दिया।

यह कहानी रमिया की है। पर ऐसी कई रमिया हम सब के घरों के आस पास रहती हैं।

मेरे घर में रमिया काम करने आती थी। घर की साफ सफाई से लेकर सब्जी काटने से लेकर बर्तन धोने का सभी काम बड़ी ईमानदारी से करती थी। पति शराबी था तो घर का खर्च चलाने की उसकी ज़िम्मेदारी थी। आसपास के कई घरों में काम करके अपनी सादा सी जिंदगी बसर कर रही थी।  गरीब थी पर थी बड़ी स्वाभिमानी

एक दिन सुबह-सुबह जब मैं कॉलेज के लिए निकल रही थी तो देखा माँ पिताजी से पूछ रही थीं, “क्या हुआ? रमिया को क्यों नहीं आई आज काम पर?’’

माँ की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि तभी रमिया की सहेली मीना तेज़ी से भागती हुई आई और पिताजी से गुहार लगाने लगी, “बाबूजी, आप तो बड़े वकील हैं। कुछ कोर्ट कचहरी करके रमिया को बचा लीजिए।”

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यह कहके वह जोर जोर से रोने लगी।

“क्या हुआ?” माँ में घबराते हुए पूछा।

“माँजी, गज़ब हो गया है। पूरे मोहल्ले में शोर मचा हुआ है कि रमिया डायन और चुड़ैल है उसके बच्चे नहीं होते तो वह लोगों के बच्चे खा जाती है। हमारे मोहल्ले में इस महीने चार बच्चे पैदा होते ही चल बसे और सब उनके मरने का रमिया पर इलज़ाम लगा रहे हैं।पूरे मोहल्ले के लोगों ने उसके घर पर पथराव कर दिया है। दोनों पति-पत्नी सुबह से घर में बंद हैं।  कुछ कीजिए नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।”

यह सुनते ही मेरे कदम ठिठक गए! इक्कीसवीं सदी में ऐसी अन्धविश्वासी बातें और लोग बेचारी रमिया को शिकार बना रहे हैं? बाकि के लोग इन बातों को मन ही मन स्वीकार भी कर रहे हैं?

मैंने कॉलेज जाने का विचार छोड़ा और सोच लिया अब बस इन सब को किसी को तो रोकना होगा।

मैंने पिताजी, अपनी कुछ कॉलेज फ्रेंड्स और कुछ समाजसेवी को घर बुलाया और सब को साथ लेकर पुलिस के पास जाने का निर्णय लिया।

हम दस-बारह लोग मिलकर पुलिस के पास पहुँचे और उनको सारे वाकये से अवगत करवाया।

एक एस ओ हमारे साथ रमिया के मोहल्ले पहुंचे। लोगों का हुजूम रमिया के घर के पास ज़मा था।  लोग बड़े गुस्से में बड़बड़ाते हुए चिल्ला रहे थे। किसी प्रकार हम सभी ने उन सब को शांत किया और रमिया के घर के बाहर से भीड़ को हटवाया। पुलिस के भय से लोग धीरे-धीरे छँट गए।

रमिया बहुत डरी हुई थी किसी प्रकार उसको समझा बुझाकर और कुछ खाना खिलाकर हम सभी घर आ गए।

उसके कुछ दिन बाद रमिया हमारे घर आई तो मैं उसका चेहरा देखकर हैरान रह गई। उसका चेहरा पीला पड़ा हुआ था और वो महीनों की बीमार लग रही थी। मैंने पूछा, “रमिया क्या हुआ क्या? अभी भी मोहल्ले वाले परेशान करते हैं?”

“दीदी अब बस! बहुत हो गया। लोगों ने मेरा परिचय ही बदल दिया। बच्चे मुझे देखकर भागते हैं। औरतों को लगता है मैं उनके बच्चों को खा जाऊँगी। मैं सबसे कहना चाहती हूँ मुझे डायन और चुड़ैल कहना बंद कीजिए! मैं जिंदा इंसान हैं और किसी भी अप्रत्याशित घटना के लिए मुझे दोषी मत ठहराइए।”

रमिया ने जो कहा उसे सुनकर मुझे लगा इससे बड़ा तमाचा हमारे समाज के मुँह पर हो नहीं सकता।

मैंने कुछ समाजसेवियों के साथ मिलकर उसके मोहल्ले में जाना शुरू किया और वहाँ की औरतों को सबसे पहले समझाना आरम्भ किया। धीरे-धीरे लोगों का व्यवहार बदला और रमिया फिर से पुरानी रमिया बनने लगी।

रमिया के चेहरे की मुस्कान ने मुझे यकीन दिलाया कि जब एक कमज़ोर आवाज़ के साथ कई आवाजें मिलकर अन्याय का विरोध करने की छोटी सी कोशिश करती हैं तो कामयाब जरुर होती हैं।

ये घटनाक्रम मुझे  हिम्मत दे गया कि यदि अन्याय के खिलाफ सभी खड़े हो जाएँ तो अन्याय करने वालों शक्ति कम होती है।

तो अब बस और नहीं! बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाओ और कमजोरों के साथ खड़े हो जाओ!

इमेज सोर्स: Still from The Text, PCVC Online/YouTube

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About the Author

shalini verma

I am Shalini Verma ,first of all My identity is that I am a strong woman ,by profession I am a teacher and by hobbies I am a fashion designer,blogger ,poetess and Writer . मैं सोचती बहुत हूँ , विचारों का एक बवंडर सा मेरे दिमाग में हर समय चलता है और जैसे बादल पूरे भर जाते हैं तो फिर बरस जाते हैं मेरे साथ भी बिलकुल वैसा ही होता है ।अपने विचारों को ,उस अंतर्द्वंद्व को अपनी लेखनी से काग़ज़ पर उकेरने लगती हूँ । समाज के हर दबे तबके के बारे में लिखना चाहती हूँ ,फिर वह चाहे सदियों से दबे कुचले कोई भी वर्ग हों मेरी लेखनी के माध्यम से विचारधारा में परिवर्तन लाना चाहती हूँ l दिखाई देते या अनदेखे भेदभाव हों ,महिलाओं के साथ होते अन्याय न कहीं मेरे मन में एक क्षुब्ध भाव भर देते हैं | read more...

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