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आखिर कब तक तुम ऊँचे और नीची रहूंगी मैं?

इस दौर में कहते हैं सब, हम लिखेंगे नई कहानियां, जन्म लूं मैं किसी भी सदी में, क्यों लगता है बिकती हैं बस मेरी जवानियां?

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आज गांव तक महिला सशक्तिकरण को मज़बूत करने की ज़रूरत है!

देश में महिला सशक्तिकरण योजनाएं भले ही महिलाओं के स्वाभिमान में सहायक हों, लेकिन लिंगानुपात आंकड़े इन योजनाओं पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं।

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मैं आत्मसम्मान से जीना चाहती हूँ!

माँ को देखा हर बात में सर झुका कर, ग़लत को भी सही बताते, यही शिक्षा पाई उनसे, ‘आत्मसम्मान चाहे ना रहे, पर परिवार को तुम बचाना...'

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सदियों बाद आज फिर ज़िंदा हो रही हूँ मैं…

एक सदियों पहले ही मर चुकी थी, एक अचानक से नई उगी थी। एक ने पहन लिया था सन्नाटा, एक आंदोलन चला रही थी...

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अब बेटे की शादी कर देते हैं ताकि बहु आकर घर संभाल ले…

घर संभालने के लिए केवल लड़की को ही क्यों सामने परोस दिया जाता है? लड़के के माता-पिता क्या लड़कों की जिम्मेदारी नहीं होते?

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अपना हक़ मांगने से मैं ‘रिबेल’ या विद्रोही कैसे बन जाती हूँ?

मुझे कपड़े पहनने की इजाज़त भी आपसे लेनी पड़ती है और काम के लिए देर रात बाहर रहना हो तो आस-पास का माहौल देखना पड़ता है, तो मैं रिबेल ना करूं?

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