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बहू, मुझे तेरी वाली साड़ी चाहिए…

"अगली बार मैं आपके लिए बिल्कुल अपनी तरह ही साड़ी लाऊंगी। मम्मी जी, तब तो आपको पसंद आएगी ना?" यह बात शिप्रा ने मुस्कुराते हुए कही।

“अगली बार मैं आपके लिए बिल्कुल अपनी तरह ही साड़ी लाऊंगी। मम्मी जी, तब तो आपको पसंद आएगी ना?” यह बात शिप्रा ने मुस्कुराते हुए कही।

आज सुबह ही शिप्रा अपने पति राजवीर के साथ ससुराल आई थी। तीन दिन बाद उसके देवर की शादी थी। शाम को शिप्रा ने सबके लिए चाय बनाई और खुद भी राजवीर की मम्मी और शादी में आई महिलाओं के साथ बैठकर चाय पी रही थी।

तभी राजवीर की मम्मी ने शिप्रा से कहा, “तुमने इस बार मेरे लिए जो साड़ी भेजी थी, वह मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगी। उसका कपड़ा और रंग दोनों मुझे पसंद नहीं है।”

सबके सामने सास के ऐसा बोलने पर शिप्रा को बहुत बेइज़्ज़ति महसूस हुई। उसे लगा कि कहीं सब यह ना सोच रहे हो कि मैं अपनी सास के लिए ढंग के कपड़े नहीं लाती हूं। बल्कि मैं हमेशा इनकी पसंद की ही साड़ी लाने की कोशिश करती हूं। उस समय शिप्रा ने चुप रहना ठीक समझा।

बाद में शिप्रा ने अपनी सास से कहा, “मम्मी जी आपने ही तो इनसे फोन पर अपने लिए महंगी और भारी साड़ी खरीदने के लिए कहा था। और मैंने तो भारी और महंगी के साथ सुंदर साड़ी खरीदी है फिर भी आपको पसंद नहीं आई? और मम्मी जी सारे कपड़े मैंने, राजवीर और अमित भैया (देवर) ने साथ पसंद करके खरीदे थे। मम्मी जी आपकी पसंद मेरे समझ में नहीं आती है।” यह कहकर शिप्रा दुखी मन से अपने कमरे में चली आई थी। साड़ी तो सचमुच बहुत सुंदर थी।

सास की बात से शिप्रा का मन बहुत दुखी था। वैसे ये पहली बार नहीं हुआ था, कि शिप्रा की लाई हुई साड़ी उन्हें पसंद नहीं आई थी। जब भी शिप्रा कपड़े या कोई भी सामान लाती है, सास कोई ना कोई कमी निकाल ही देती है।

पिछली बार जब शिप्रा आई थी। तब उसने अपनी मम्मी और सास के लिए बिल्कुल एक जैसी ही सुंदर साड़ी खरीद कर लाई थी। दोनों साड़ियां नीले रंग की थी, बस रंग में थोड़ा उन्नीस,बीस का फर्क था। शिप्रा पहले अपनी मम्मी के घर गई गई थी, उसकी मम्मी को दोनों साड़ियां बहुत अच्छी लगी थी। बल्कि उन्हें सास वाली साड़ी का रंग ज्यादा पसंद था। पर जब सास को वह साड़ी दी तो उन्हें उसका रंग और कपड़े की क्वालिटी पसंद नहीं आई थी। तब शिप्रा को बहुत गुस्सा आया था। इस बात पर उसकी राजवीर से बहस भी हो गई थी।

फिर जब देवर की शादी पड़ी, तभी शिप्रा ने राजवीर से कहा था, “घर पैसे भेज दो सब अपनी पसंद के कपड़े और जो भी जरूरत का सामान होगा खरीद लेंगे। वैसे भी मम्मी जी को मेरी ले गई साड़ी या कोई भी सामान पसंद नहीं आता है। पैसे भी लगाओ और पसंद भी ना आये। तो हमारे खरीदने का कोई मतलब नहीं निकलता। और मम्मी जी की बातों से मेरा मन ऊपर से दुखी हो जाता है।”

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पर राजवीर ने कहा, “पैसे भेजेंगे तो किसी और काम में खर्च हो जाएंगे। और मम्मी गांव से कपड़े खरीदने के लिए बाजार बिल्कुल नहीं जाएंगी। तुम अपनी पसंद से अच्छा से अच्छा खरीदती हो,अब उन्हें नहीं पसंद आता तो वह जाने। मम्मी जो कहती है, उनकी बात पर ज्यादा ध्यान ना दिया करो।”

शिप्रा ने कहा, “मैं इंसान हूं मुझे बुरा लगता है। मैं हर बार अच्छे से अच्छा खरीद कर ले जाती हूं, और वह चार कमी गिना देती है।” और वैसा ही हुआ था।

दूसरे दिन सुबह शिप्रा ने नहाकर फ्लावर प्रिंट की पीले रंग की साड़ी पहनी थी। वैसे शिप्रा साड़ी बहुत कम पहनती है, पर ससुराल में केवल साड़ी ही पहननी पड़ती है। इसलिए वह जब भी आती है, हल्के कपड़े की प्रिंटेड साड़ियां पहनने को लाती है, जिससे उसको साड़ी पहन के चलने में और काम करने में कोई दिक्कत ना हो।

जब शिप्रा कुछ महिलाओं के साथ रसोई में बैठकर सब्जी काट रही थी। तभी उसकी सास आकर शिप्रा से बोली, “तुम जैसी साड़ी पहनी हो, ऐसी ही साड़ी मेरे लिए भी लाया करो।”

शिप्रा को अपनी सास की बात पर विश्वास नहीं हुआ था। उसने कहा, “मम्मी जी आपको यह साड़ी सच में पसंद है? आप तो हमेशा महंगी और भारी साड़ी लाने के लिए कहती हैं। और यह साड़ी तो बहुत हल्की और सस्ती है।”

सास ने कहा, “तुम मुझसे झूठ बोल रही हो ना, तुम सस्ती साड़ी कभी नहीं पहनोगी। तुम पैसे बचाने के लिए केवल मेरे लिए सस्ती साड़ी खरीद कर लाती हो। इसीलिए मैं राजवीर से अपने लिए अच्छी साड़ी लाने के लिए बोलती हूं।”

सास की बात सुनकर शिप्रा को गुस्सा आया। वह बोली, “ओह अब समझ में आया। मतलब आपको लग रहा था कि मैं आपके लिए सस्ती और अपने लिए महंगी साड़ी खरीदती हूं। आपको पता है मेरी साड़ी कितने की है?”

सास ने कहा, “होगी दो ढाई हजार की!”

तब शिप्रा ने कहा, “मम्मी जी यह साड़ी केवल ₹550 की है। आपकी साड़ी इससे बहुत महंगी है। आपने अपने दिमाग में बिठा लिया है कि मैं आपके लिए सस्ता खरीद कर लाती हूं। क्या आपको साड़ी देख कर भी कुछ समझ में नहीं आता? मुझे लगता है कि आपको साड़ी की सुंदरता से कोई लेना-देना है ही नहीं। आपको तो मेरे ऊपर शक था, इसलिए आप उसमें कमी निकालती हैं। पर मैं हमेशा आपके बेटे के साथ ही खरीदारी करने जाती हूं। आपको अपने बेटे के ऊपर तो विश्वास है ना?

मम्मी जी आप मेरी सच्ची नियत पर शक करती हैं। और जरूरी तो नहीं है ना कि हर बहू या सास एक दूसरे के बारे में बुरा ही सोचे या एक दूसरे के साथ बुरा ही करे?”

शिप्रा की बात सुनकर सास ने अपना सिर शर्म से झुका लिया था और यह कहकर फुर्सत कर ली थी, “हो सकता है मैं गलत सोच रही हूं।”

तब शिप्रा ने कहा, “ठीक है, अगर आपको अभी भी लग रहा है, कि हो सकता है आप गलत सोच रही हैं, तब आपसे और कुछ कहने का मतलब ही नहीं है। और हां, अगली बार मैं आपके लिए बिल्कुल अपनी तरह ही साड़ी लाऊंगी। मम्मी जी, तब तो आपको पसंद आएगी ना?” यह बात उसने मुस्कुराते हुए कहा।

जब थोड़ी देर बाद सास वहां से चली गई तो शिप्रा ने मन में सोचा इनके मन में जो मेरे लिए शक का कीड़ा है, पता नहीं इतनी जल्दी निकलेगा भी कि नहीं। फिर भी चलो इनके मन की बात तो पता चल गई। और फिर उम्मीद पर तो दुनिया कायम है। हो सकता है सुधर जाएं। और आज तो मैं भी अपने दिल की बात कहकर हल्का महसूस कर रही हूं।

मूल चित्र : Still from Cadbury Dairy Milk, Badhti Dosti ke Naam /YouTube(for representational purpose only)

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