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सासू मां, तारीफ नहीं तो झूठी बुराई भी नहीं…

दूसरी बार सास बेटे-बहू के पास खुद आईं, आने के पहले अंकुश को फोन करके बोली, तबीयत भी अच्छी नहीं है, और तुम लोगों से मिलने का भी मन हो रहा है।

दूसरी बार सास बेटे-बहू के पास खुद आईं, आने के पहले अंकुश को फोन करके बोली, तबीयत भी अच्छी नहीं है, और तुम लोगों से मिलने का भी मन हो रहा है।

जब सीमा की सास पहली बार उसके पास रहने आ रही थी, तब सीमा जहां उनके आने से खुश थी, वहीं थोड़ी घबराई हुई भी थी। लगभग छ: महीने पहले जब सीमा और अंकुश की शादी हुई थी, तब सीमा कुछ दिन ससुराल में रहकर अंकुश के साथ शहर आ गई थी। उसके बाद एक बार दो-तीन दिन के लिए गई थी। इसलिए सास की पसंद और नापसंद के बारे में उसे बहुत ज्यादा पता नहीं था।

पर कुछ दिनों से सीमा की सास की तबीयत थोड़ी खराब चल रही थी, घर पर इलाज कराने पर भी बहुत ज्यादा फायदा नहीं हो रहा था। अंकुश और सीमा ने उन्हें अपने पास शहर बुला लिया था, जिससे यहां पर उनका अच्छे से इलाज भी हो जाएगा और देखभाल भी हो जाएगी। साथ ही जगह बदलने से थोड़ा मन भी बदल जायेगा, इसलिए सास देवर के साथ आ रही थी।

सीमा को जब ज्यादा घबराहट होने लगी, तब उसने अपनी मम्मी को फोन करके सब बताया। तब मम्मी ने कहा, “बेटा इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है, जब अपनी सास के साथ रहोगी, तब उनकी पसंद नापसंद के बारे में धीरे-धीरे जान जाओगी। उनकी तबीयत खराब है, इसलिए उनका ख्याल खूब रखना, खाने-पीने का समय समय से ध्यान रखना और फल, दूध जरूर देना।”

मम्मी की बात सीमा को सही लगी,और वह खुशी-खुशी सास के आने की तैयारी करने लगी। जिस दिन सास और देवर को आना था, सीमा ने सास के लिए एक कमरा साफ-सुथरा करके तैयार कर लिया था।

सास और देवर के आने पर सीमा उनके खाने-पीने का पूरा ध्यान रखती थी। वह रोज कोशिश करती थी कि सुबह के नाश्ते से लेकर रात का खाना तक बदल बदल कर बनाये और उनके पसंद का भी पूछ कर  बनाती थी।

अंकुश कहते भी थे, कि बहुत गर्मी है, कभी-कभी कुछ नया बना लिया करो,पर रोज कुछ सिंपल ही बनाया करो। पर सीमा को जितना भी कुछ बनाना आता था, वह सब बनाकर खिला रही थी, और साथ में सास को दोनों समय फल भी देती। सोने के पहले पीने के लिए दूध जरूर देती थी।

जब कुछ दिन बाद सीमा के देवर घर वापस चले गये, तब ज्यादातर सीमा और उसकी सास ही घर पर रहते। अंकुश सुबह ही ऑफिस चले जाते थे और रात में वापस आते थे।

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सीमा दिन भर सास के साथ ही रहती कि उनको अकेला ना महसूस हो। उनके खाने-पीने का समय समय से पूरा ध्यान देती थी। अगर वह कुछ खाने से मना भी कर देती, तब भी उनको जबरजस्ती खिलाती थी। वह बोर ना हो इसलिए अक्सर शाम को मंदिर या पार्क भी लेकर जाती थी। जिस दिन अंकुश के पास समय नहीं रहता था, उस दिन उन्हें डॉक्टर के पास भी लेकर जाती थी।

कुछ महीने बाद जब सास पूरी तरह से स्वस्थ हो गई थी, तब वह वापस चली गई थी। उनके जाने के कुछ समय बाद ही अंकुश के चचेरे भाई की शादी में जब सीमा और अंकुश घर गये।

एक दिन जब सीमा और उसकी ननंद नीता दोनों खाना खा रही थीं तो नीता ने कहा, “भाभी आप इतना कम खाना हमेशा ही खाती हैं कि हम लोगों के सामने ही इतना कम खाती हैं?”

सीमा को बहुत अजीब लगा। उसने कहा, “तुम ऐसे क्यों पूछ रही हो, मैं तो हमेशा इतना ही खाती हूं, चाहे अकेले खाऊं या सबके साथ। दिखाने के चक्कर में कितने दिन कम खाऊंगी, भूखी नहीं मर जाएंगी? और तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?” यह बात सीमा थोड़ा गुस्से में बोली।

तब ननंद बोली, “मैं तो इसलिए कह रही थी कि जब मम्मी आप लोग के पास से वापस आई थी तब एक दिन कह रही थी कि भैया तो घर पर रहते नहीं थे। आपके साथ वह बोर हो गई और आप खाना भी इतना कम खाती थी कि आपके सामने मेरी मम्मी संकोच में पेट भर कर खाना भी नहीं खा पाती थी।”

सीमा को यह सुनकर बहुत बुरा लगा। उसने कहा, “मैं जबरजस्ती मम्मी को खाना खिलाती थी। दोनों समय नाश्ता दोनों समय का खाना साथ में फल और दूध भी देती थी। बाहर से भी खाने की चीजें मंगाकर खिलाई और मम्मी कितनी स्वस्थ होकर आई थी, यह तुम्हें नहीं दिखा? ठीक है मैं मम्मी से अभी पूछती हूं कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा, और अपने घर में भी कोई संकोच करता है?”

तब ननंद ने कहा, “भाभी, मम्मी से मत पूछिये। मम्मी मुझ पर बहुत गुस्सा करेंगी।”

पर सीमा को इस बात से बहुत दु:ख हुआ था, सास ने उसके किये धरे पर पूरी तरीके से पानी फेर दिया था। बाद में सीमा ने अपने पति को बताया, तो उन्होंने कहा, “छोड़ो जाने दो, तुम परेशान ना हो, तुमने तो दिल से उनकी सेवा की थी, अब उन्हें समझ में नहीं आया, तो क्या कर सकते हैं। कुछ कहने पूछने से बात बढ़ेगी और कुछ नहीं।”

सीमा ने अपनी सास से तो कुछ नहीं कहा, पर यह बात वह कभी भूल नहीं। उसे जब भी यह बात याद आती थी, उसे अपनी सास पर बड़ा गुस्सा आता था। दूसरी बार सास बेटे-बहू के पास खुद ही आई थी। आने के पहले अंकुश को फोन करके बोली थी कि उनकी तबीयत भी अच्छी नहीं है, और तुम लोगों से मिलने का भी मन हो रहा है।

इस बार भी सीमा की सास और देवर ही आये थे। तीन दिन बाद होली का त्योहार था। सीमा ने त्योहार के हिसाब से पूरा खाना बनाया था।

दोपहर में जब सास, देवर और अंकुश खाना खा रहे थे, और सीमा सब को खाना परोस रही थी। तब देवर ने कहा, “भाभी आप रोज इतना अच्छा-अच्छा खाना बनाती हो कि मैं रोज ज्यादा खाना खा लेता हूं, और जब बाद में पेट में दिक्कत होती है, तो सोचता हूं कि कल कम खाऊंगा, पर फिर खाना देखकर मन नहीं मानता और ज्यादा खा लेता हूं।” यह सुनकर सब हंसने लगे।

तभी सीमा ने अपनी सास से कहा, “मम्मी जी आप भी भरपेट खाना खाना, नहीं संकोच में कम खाएं।”

सास ने कहा, “कम क्यों खाएंगे? और अपने ही घर में कैसा संकोच?”

तब सीमा ने कहा, “नहीं मैं तो इसलिए कह रही थी, क्योंकि नीता कह रही थी कि पिछली बार जब आप आई थीं, तब आप संकोच में भरपेट खाना नहीं खाती थीं। मैं तो पूरा खाना आपके सामने डाइनिंग टेबल पर लाकर रख देती थी और आप को जबरदस्ती खाना निकाल कर देती थी। फिर भी आप घर जाकर ऐसा बोली, मुझे यह सुनकर बहुत दु:ख हुआ था।”

सास ने कहा, “मुझे तो नहीं याद, मैंने नीता से ऐसा कुछ भी कहा है, हो सकता है कहीं और के बारे में बताया होगा, वह समझ ना पाई हो।”

सीमा ने कहा, “मम्मी जी नीता इतनी छोटी बच्ची नहीं है कि वह आपकी बात ना समझ पाई हो, बिना आपके कुछ कहे, उसे इतना सब कुछ कैसे पता चल गया?”

तब सास ने कहा, “पता नहीं हमें तो नहीं याद है कि मैंने ऐसा कुछ कहा है।”

तभी अंकुश ने कहा, “अच्छा चलो बात खत्म करो, सब लोग खाना खाओ और सीमा तुम भी बैठो और खाना खाओ।”

सीमा ने कहा, “मैंने तो इसलिए बात कही कि मम्मी जी इस बार ढंग से खायें-पिऐं, संकोच ना करें। और मम्मी जी आपसे एक बात और कहनी है कि आप मेरी तारीफ नहीं कर सकती हैं,तो झूठी बुराई भी नहीं किया करें। मुझे बहुत दुख होता है।”

मूल चित्र : Still from Short Film Sanskaari Bahu, YouTube  

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