Saumya Jyotsna

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Young Writer

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प्रथा के नाम पर लड़कियों के स्तनों को जला डालना,ताकि कोई उन्हे रेप न करे

ब्रेस्ट आयरनिंग - लड़कियों की 'सुरक्षा' के नाम पर उनके स्तनों को जला डालना! हाँ, यह भयंकर रिवाज आज भी कायम है| जानिए प्रथा के नाम पर होने वाले एक और शोषण के बारे में| 

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‘मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट’ बेहद सराहनीय है, पर इसकी ग्राउंड रियलिटी अभी थोड़ी अलग है

'मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट’ बेहद सराहनीय है, पर, इसकी ग्राउंड रियलिटी अभी थोड़ी अलग है। इसका कुछ व्यापक असर हो, यह बहुत ज़रूरी है |

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जीवन का संगीत – कभी उतार, तो कभी, चढ़ाव

जीने के लिए, पलक की ही तरह, आइये, यही नजरिया अपनाएं-'जिंदगी प्यार का गीत है'-जहाँ, कभी उतार है, तो कभी, चढ़ाव। संगीत के सुरों के भांति। 

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मैं ऐसे लोगों को राह का कांटा या चाय में पड़ी मक्खी समझती हूँ

क्या करते है, कहां जाते हैं, किससे मिलते हैं, इन सब चीजों के बारे में लड़कियों से ही क्यों, लड़कों से भी सवाल होने चाहिए।

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स्तन कैंसर के प्रति जागरूक होना बहुत ज़रूरी है

स्तन कैंसर और उसके लक्षण के प्रति जागरूक रहें। यदि शुरुआती दिनों में ही ब्रेस्ट कैंसर का पता लग जाए तो यह पूरी तरह से ठीक हो सकता है।

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#MeToo के साथ अब अपनी आवाज़ मुखर करने का वक़्त आ गया है

जो आरोप अब निकले हैं #MeToo की वजह से, उनकी जाँच तो होनी हीं चाहिए ताकि हर उस इंसान का वह चेहरा सामने आए, जो उसने अपने प्रत्यक्ष चेहरे के पीछे छुपाकर रखा है|

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लड़कियां वस्तु नहीं जो उनका कन्यादान हो

लड़कियां भी इंसान होती हैं, कोई वस्तु नहीं, जिनका दान हो। पुरानी परंपराएं और कुछ पुराने शब्द भी अब हमें बदलने होंगे।

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नाख़ून टूट गए

"माँ सोचने लगी अगर ये नाख़ून आज नहीं होते तो?" किसी भी माँ ने सपने में नहीं सोचा होगा कि उसकी बेटी के नाख़ून इस काम आ सकते हैं। 

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एक समान: बेटियां किसी से कम थोड़े न होती हैं!

 बेटा हो या बेटी, दोनों एक सामान हैं, "ये कहना गलत है कि हम बेटियों को बेटों की तरह रखते हैं"- दोनों जैसे चाहें वैसे रहें।     

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इतना गुस्सा क्यों जब महिला अधिकारों की जीत के साथ 800 वर्ष पुरानी प्रथा का अंत हुआ है?

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। जिसके साथ ही 800 वर्ष पुरानी प्रथा खत्म हो गई है, जिसमें 10 वर्ष की बच्चियों से लेकर 50 वर्ष तक की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की सख्त मनाही थी अब तक।

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धारा 377: इस बदलाव को स्वीकारना होगा

धारा 377- जिस समाज में लोग आज भी इस विषय पर बात करने से हिचकिचाते हैं, क्या इसे वहाँ सामाजिक स्वीकृति मिलेगी? मन में उठते हैं ऐसे कई सवाल। 

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मैं सुंदर हूँ और मैं खुद की फेवरेट हूँ।

एक तरफ तो हम सांवले रूप वाले श्री कृष्ण और काली माँ की भक्ति करते हैं, दूसरी ओर हमें ही अपने सांवले या काले रंग से दिक्कत होती है? ऐसा क्यों?

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